लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
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सदियों की दबाई आवाज अब खुलकर बोल रही है, सवाल सिर्फ महिलाओं से नहीं… पुरुष समाज से भी है
सीमा हिंगोनिया
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजस्थान राज्य महिला आयोग
“एक कचौरी, दो समोसा…
इन मर्दों पर नहीं भरोसा…”
आज ऐसे स्लोगन सुनने और देखने को मिल रहे हैं, जो शायद कई लोगों को चुभ रहे हैं। कुछ को इनमें आक्रोश दिखाई दे रहा है, कुछ को अतिशयोक्ति और कुछ लोग सवाल कर रहे हैं—आखिर सभी पुरुषों को एक ही नजर से क्यों देखा जा रहा है?
लेकिन इन नारों को सिर्फ नारों की तरह सुनकर आगे बढ़ जाने से पहले उस आवाज को सुनना जरूरी है, जो इनके पीछे छिपी है।
क्योंकि यहां तक पहुंचने वाली लड़कियों को यहां तक आने में हजारों साल लगे हैं।
और सवाल यह भी है कि उन्हें यहां तक कौन लेकर आया?
सदियों की चुप्पी का हिसाब
हम अक्सर कहते हैं कि हमारा देश सदियों तक गुलाम रहा। विदेशी शासन का इतिहास गिनाते हैं। लेकिन स्त्री की गुलामी का इतिहास इससे कहीं लंबा है।
रामायण के समय से लेकर आज तक स्त्री के शोषण, नियंत्रण और उसकी स्वतंत्रता पर पहरे के पन्ने इतिहास में दर्ज हैं।
बस उन्हें पढ़ने की जरूरत है।
देश आजाद हुआ, लेकिन क्या स्त्री भी पूरी तरह आजाद हो गई?
आज भी उसके सामने बेड़ियों के रूप बदलते रहे हैं—
बालिका भ्रूण हत्या,
बाल विवाह,
यौन शोषण,
दहेज प्रताड़ना,
घरेलू हिंसा,
ऑनर किलिंग,
एसिड अटैक,
डायन प्रथा…
सूची इतनी लंबी है कि गिनते-गिनते शब्द खत्म हो जाएं, लेकिन महिलाओं के अनुभव खत्म नहीं होते।
पुरुष सत्ता की मानसिकता पर सवाल
सवाल सिर्फ अपराध करने वाले पुरुष का नहीं है।
सवाल उस मानसिकता का है जो स्त्री को बराबरी का इंसान मानने के बजाय उसे अपनी संपत्ति समझती है।
उसने खुलकर हंसना चाहा तो सवाल उठे।
खुलकर जीना चाहा तो सवाल उठे।
अपनी बात कहनी चाही तो उसके चरित्र पर सवाल खड़ा कर दिया गया।
और जब उसने अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई तो सबसे आसान हथियार फिर वही निकला—
“चरित्रहीन।”
स्त्री की आवाज दबाने के लिए उसके चरित्र पर सवाल उठाना आखिर कब तक जारी रहेगा?

घर से सड़क तक… डर का एक ही चेहरा
एक महिला सुबह से शाम तक गालियां सुनती है।
कभी घर की चारदीवारी में हिंसा झेलती है।
कभी सड़क पर घूरती निगाहों से असहज होती है।
कभी अनचाहे स्पर्श से बचने की कोशिश करती है।
और कई बार इन सबके आगे भी उसे चुप रहना पड़ता है।
जब प्रतिरोध की उसकी सारी कोशिशें विफल हो जाती हैं, तो यौन हिंसा जैसी घटनाएं उसके जीवन पर गहरा घाव छोड़ जाती हैं।
और सवाल यह है कि अपराधी हमेशा कोई अनजान व्यक्ति ही क्यों माना जाए?
कई मामलों में अपराधी उसके आसपास का ही कोई व्यक्ति होता है—घर का, रिश्तेदारी का, परिचित का, पड़ोस का, स्कूल-कॉलेज का या काम की जगह का।
यही वजह है कि आज स्त्री सिर्फ अपराधी से नहीं, बल्कि उस पुरुषवादी मानसिकता से भी सवाल कर रही है, जो उसे बराबरी का इंसान मानने से इनकार करती है।
इसलिए निकला—“लड़की अपने आप की, नहीं किसी के बाप की”
“लड़की अपने आप की, नहीं किसी के बाप की…”
यह सिर्फ एक स्लोगन नहीं है।
इसके पीछे उस अधिकार की मांग है, जिसमें लड़की को अपने जीवन, शरीर, शिक्षा, करियर, विवाह और फैसलों पर खुद का अधिकार चाहिए।
वह किसी की संपत्ति नहीं है।
वह किसी के परिवार की “इज्जत” का बोझ उठाने वाली वस्तु नहीं है।
वह खुद एक स्वतंत्र व्यक्ति है।

“सब मर्दों को क्यों बोल रही हो?”
अक्सर सवाल आता है—
“सब मर्दों को क्यों बोल रही हो?”
“घर में पिता है, भाई है, पति है। वे भी तो पुरुष हैं। उन पर विश्वास क्यों नहीं?”
यह सवाल अपनी जगह है।
लेकिन दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
जब किसी महिला के साथ हिंसा होती है, तब उसके आसपास मौजूद पुरुषों की आवाज कहां चली जाती है?
जब किसी लड़की को परेशान किया जाता है, तब उसकी सुरक्षा के लिए खड़े होने वाली मर्दानगी कई बार दिखाई क्यों नहीं देती?
अपराधी को रोकने, उसका विरोध करने और पीड़िता का साथ देने के बजाय अगर समाज चुप रहता है, तो यह चुप्पी भी सवालों के घेरे में आती है।
अपराध सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं जो हिंसा करता है।
उसके खिलाफ आवाज न उठाना भी समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
जो बोया है, वही तो काटना पड़ेगा?
सदियों तक स्त्री को क्या मिला?
कहीं शोषण, कहीं गाली, कहीं हिंसा, कहीं घृणा और कहीं उसकी इच्छाओं पर पहरा।
तो जब सदियों से दबाई गई आवाज आज बाहर आ रही है, तो उसे सुनना भी पड़ेगा।
देखना भी पड़ेगा।
और शायद सहना भी पड़ेगा।
क्योंकि यह आवाज अचानक पैदा नहीं हुई है।
यह उन आवाजों की गूंज है जिन्हें लंबे समय तक दबाया गया।
संस्कार का ठेका सिर्फ स्त्री के माथे क्यों?
हमारी सामाजिक व्यवस्था में लड़की को बचपन से संस्कार सिखाए जाते हैं।
कैसे बैठना है।
कैसे बोलना है।
कहां जाना है।
किससे बात करनी है।
कपड़े कैसे पहनने हैं।
कितनी देर बाहर रहना है।
हर कदम पर संस्कार का पाठ।
लेकिन सवाल है—
पुरुष को संस्कारवान बनाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्यों लड़की को ही हर बार समझाया जाए कि उसे कैसे रहना है?
क्यों पुरुष से यह नहीं कहा जाए कि वह महिला की इच्छा, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करे?
अगर पुरुष समाज भी वास्तव में संस्कारवान हो जाए, तो शायद स्त्री को संस्कारों के नाम पर इतने पहरे की जरूरत ही न पड़े।
यह जेन-जी है… यह पीढ़ी सवाल करेगी
आज की पीढ़ी पुरानी पीढ़ियों जैसी नहीं है।
यह Gen Z है।
यह वह पीढ़ी नहीं है जो सिर्फ इसलिए सब कुछ स्वीकार कर लेगी क्योंकि पिछली पीढ़ी ने उसे स्वीकार किया था।
“हमने सहा, इसलिए तुम भी सहो”—यह तर्क अब नहीं चलेगा।
आज की लड़कियां सवाल करेंगी।
अपने अधिकारों की बात करेंगी।
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगी।
और अगर उन्हें संस्कार की सीख दी जाएगी, तो वे सवाल करेंगी—
संस्कार सिर्फ हमारे लिए क्यों?

बदलाव सिर्फ महिलाओं से नहीं आएगा
समाज को बदलने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की नहीं है।
जरूरत पुरुषों को भी बदलने की है और उन महिलाओं को भी, जो अनजाने में पुरुषसत्तात्मक सोच को आगे बढ़ाती हैं।
बेटी को “चुप रहो” कहने के बजाय बेटे को “सम्मान करना सीखो” कहना होगा।
लड़की के कपड़ों पर सवाल उठाने से पहले लड़के को उसकी सहमति का अर्थ समझाना होगा।
बेटी को डरने की सीख देने से पहले बेटे को किसी को डराने से रोकना होगा।
क्योंकि बराबरी सिर्फ कानून की किताब में लिख देने से नहीं आएगी।
बराबरी व्यवहार में उतारनी होगी।
आखिर में सवाल वही है…
आज उठ रहे तीखे स्लोगन शायद हर पुरुष को अपने ऊपर लागू न लगें।
लेकिन उन्हें सुनकर सिर्फ नाराज हो जाना शायद उस बड़े सवाल को अनसुना करना होगा, जो उनके पीछे खड़ा है।
सवाल यह है कि क्या हमारी बेटियां बिना डर के जी पा रही हैं?
क्या वे अपनी बात बिना चरित्र के डर के कह पा रही हैं?
क्या घर, स्कूल, कॉलेज, सड़क और कार्यस्थल उनके लिए समान रूप से सुरक्षित हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—

क्या पुरुष समाज स्त्री को संरक्षण की जरूरत रखने वाली कमजोर इकाई के बजाय बराबरी का इंसान मानने के लिए तैयार है?
क्योंकि जिस दिन यह स्वीकार कर लिया गया, उस दिन शायद ऐसे स्लोगन लिखने की जरूरत भी कम हो जाएगी।
लेकिन तब तक…
जो आवाजें सदियों से दबाई गई हैं, वे निकलेंगी भी और सुनाई भी देंगी।
यह लेख राजस्थान राज्य महिला आयोग, जयपुर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सीमा हिंगोनिया द्वारा व्यक्त विचारों पर आधारित है।


















































