लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
जिन्होंने राजभवन के दरवाजे आम आदमी के लिए खोल दिए
लायलपुर से दिल्ली, संघ की शाखा से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले मदनलाल खुराना की सियासी यात्रा संघर्ष, संगठन और जनसेवा की मिसाल रही
नीरज मेहरा | विशेष रिपोर्ट
15 अक्टूबर 1936… लायलपुर, जो आज पाकिस्तान के फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है। इसी धरती पर जन्म हुआ था उस शख्स का, जिसने आगे चलकर दिल्ली की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। नाम था मदनलाल खुराना।
भारत-पाकिस्तान विभाजन ने उनके परिवार से घर-बार छीन लिया। एक संपन्न जीवन अचानक शरणार्थी शिविर तक पहुंच गया। परिवार दिल्ली आया और कीर्ति नगर के शरणार्थी शिविर में रहा। लेकिन परिस्थितियों की इस मार ने खुराना के हौसले को कमजोर नहीं किया। शायद यही संघर्ष आगे चलकर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बना।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ सियासी सफर
मदनलाल खुराना ने दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक की शिक्षा हासिल की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। इलाहाबाद में ही उनके भीतर राजनीति के बीज पड़े।
छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के महामंत्री चुने गए। छात्र जीवन में ही उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हुआ।
1960 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सचिव बने। सक्रिय राजनीति में कदम रखने से पहले उन्होंने पीजीडीएवी कॉलेज में अध्यापन भी किया।
लेकिन उनका लक्ष्य सिर्फ नौकरी करना नहीं था। दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा और केदारनाथ साहनी जैसे नेताओं के साथ मिलकर राजधानी में जनसंघ के संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1965 से 1967 तक वे जनसंघ के महामंत्री रहे। संगठन खड़ा करने की उनकी क्षमता ने उन्हें दिल्ली भाजपा की राजनीति में धीरे-धीरे एक मजबूत स्तंभ बना दिया।

1984 की हार के बाद भाजपा को फिर खड़ा करने में निभाई अहम भूमिका
1984 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए बेहद कठिन दौर लेकर आया था। देश में कांग्रेस की प्रचंड लहर थी और भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा।
ऐसे समय में दिल्ली में भाजपा संगठन को दोबारा खड़ा करने वालों में मदनलाल खुराना का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
खुराना ने कार्यकर्ताओं के बीच जाकर संगठन को मजबूत किया और राजधानी की राजनीति में भाजपा की जमीन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही संगठनात्मक आधार आगे चलकर दिल्ली में भाजपा की बड़ी राजनीतिक ताकत बना।

पार्षद से मुख्यमंत्री तक का सफर
मदनलाल खुराना का राजनीतिक सफर लगातार ऊपर बढ़ता गया।
1977 से 1980 तक वे दिल्ली के कार्यकारी पार्षद रहे। इसके बाद वे दो बार महानगर पार्षद चुने गए।
दिल्ली को 1993 में विधानसभा चुनावों के साथ सरकार का नया राजनीतिक ढांचा मिला। इसी दौर में मदनलाल खुराना दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने।
2 दिसंबर 1993 से 26 फरवरी 1996 तक उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
उनके कार्यकाल को दिल्ली के बुनियादी ढांचे और परिवहन व्यवस्था के विकास की दिशा में किए गए कार्यों के लिए याद किया जाता है।
एक शरणार्थी परिवार का बेटा अब देश की राजधानी की सत्ता के शीर्ष पर था।

केंद्र में मंत्री, फिर राजस्थान के राज्यपाल
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद मदनलाल खुराना को केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली।
1998 से 1999 तक वे संसदीय कार्य और पर्यटन मंत्री रहे।
इसके बाद जनवरी 2004 से नवंबर 2004 तक उन्होंने राजस्थान के राज्यपाल के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई।
लेकिन राजस्थान के राजभवन में उनका अंदाज पारंपरिक राजभवन की सीमाओं से कुछ अलग दिखाई दिया।
जब आम आदमी के लिए खुले राजभवन के दरवाजे
राजस्थान के राज्यपाल रहते हुए मदनलाल खुराना ने राजभवन में जनता दरबार लगाने की पहल की।
गरीब, कमजोर और पीड़ित लोग अपनी समस्याएं लेकर सीधे राज्यपाल तक पहुंच सकें—इसके लिए राजभवन के दरवाजे आम लोगों के लिए खोले गए।
कहा जाता है कि वे जनसुनवाई के दौरान लोगों की समस्याएं सुनने के साथ जरूरतमंदों की मदद भी करते थे। गरीब और असहाय लोगों को नकद आर्थिक सहायता देने की शुरुआत भी उनके इसी मानवीय दृष्टिकोण का हिस्सा बनी।
राजभवन, जो आम तौर पर सत्ता और प्रोटोकॉल का प्रतीक माना जाता है, वहां आम आदमी की फरियाद सुनने की यह शैली खुराना के राजनीतिक व्यक्तित्व की अलग तस्वीर पेश करती है।

दिल्ली भाजपा की कमान भी संभाली
मदनलाल खुराना ने संगठन में भी लगातार जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने 29 मार्च से 19 दिसंबर 2003 तक दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पार्टी की कमान संभाली।
वे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे।
उनकी राजनीति में संगठन सबसे महत्वपूर्ण था। कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद और जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करना उनकी कार्यशैली की खास पहचान मानी जाती रही।
आखिरी दौर में बीमारी ने राजनीति से किया दूर
2013 में उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ। इसके बाद उनकी सक्रिय राजनीतिक गतिविधियां लगभग समाप्त हो गईं।
जिस व्यक्ति ने छात्र राजनीति से लेकर मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल तक का सफर तय किया था, वह जीवन के अंतिम वर्षों में राजनीति की सक्रिय हलचल से दूर हो गया।
27 अक्टूबर 2018 को नई दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वे 82 वर्ष के थे।
इतिहास में दर्ज एक संघर्षशील राजनीतिक यात्रा
मदनलाल खुराना की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री की कहानी नहीं है।
यह कहानी उस पीढ़ी की भी है जिसने विभाजन का दर्द झेला, शरणार्थी शिविरों में जिंदगी शुरू की और फिर अपने संघर्ष के दम पर देश की राजनीति में मुकाम बनाया।
लायलपुर के शरणार्थी से दिल्ली के मुख्यमंत्री तक…
संघ के स्वयंसेवक से जनसंघ के संगठनकर्ता तक…
भाजपा के संकट के दौर में संगठन को संभालने वाले नेता से केंद्रीय मंत्री और राजस्थान के राज्यपाल तक…
मदनलाल खुराना का राजनीतिक सफर कई पड़ावों से होकर गुजरा। उनकी सबसे अलग पहचान शायद यही रही कि सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के बाद भी उन्होंने आम आदमी से संवाद को अपनी राजनीति का अहम हिस्सा बनाए रखा।
राजस्थान के राज्यपाल के रूप में जनता दरबार और जरूरतमंदों के लिए राजभवन के दरवाजे खोलने की पहल उनके इसी जनोन्मुखी राजनीतिक व्यक्तित्व की याद दिलाती है।
एक शरणार्थी परिवार का वह बेटा, जिसने दिल्ली की सत्ता तक पहुंचकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया—मदनलाल खुराना।
















































