लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
गांव से दिल्ली और फिर संसद तक का सफर, जनसेवा और बेबाक राजनीति की बनी मिसाल
टोंक। राजस्थान की राजनीति में कुछ ऐसे नेता हुए, जिन्होंने केवल चुनाव नहीं जीते बल्कि जनता के दिलों पर भी स्थायी छाप छोड़ी। टोंक-निवाई क्षेत्र के पूर्व सांसद, पूर्व विधायक और दो बार टोंक जिला प्रमुख रहे स्वर्गीय द्वारका प्रसाद बैरवा ऐसे ही जननेताओं में गिने जाते हैं। बेबाक शैली, निडर व्यक्तित्व, संगठन में मजबूत पकड़ और जनसेवा के प्रति समर्पण ने उन्हें क्षेत्र की राजनीति का एक अलग ही चेहरा बना दिया।

24 दिसंबर 1948 को टोंक जिले के झिलाई गांव में जन्मे द्वारका प्रसाद बैरवा का बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जबकि उनकी शिक्षा दिल्ली में हुई। उनके पिता रोजगार के सिलसिले में दिल्ली चले गए थे, जिसके कारण उन्हें राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक गतिविधियों को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला।

संजय गांधी के साथ शुरू हुआ राजनीतिक सफर
युवावस्था में ही द्वारका प्रसाद बैरवा युवक कांग्रेस से जुड़े और संजय गांधी के साथ सक्रिय राजनीति में काम किया। कांग्रेस संगठन में उनकी सक्रियता और नेतृत्व क्षमता के कारण उनकी पहचान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी तक बनी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यही संपर्क उनके राजनीतिक जीवन की मजबूत नींव साबित हुआ।

1980 में पहली बार बने विधायक
वर्ष 1980 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया ने उन्हें निवाई विधानसभा सीट से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाया। पहली ही बार में उन्होंने जीत दर्ज की और विधायक बने। विधायक रहते हुए उन्होंने क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, पेयजल और ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी, जिससे उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

सामान्य सीट से दो बार बने जिला प्रमुख
द्वारका प्रसाद बैरवा का जिला प्रमुख कार्यकाल आज भी टोंक जिले में विकास के स्वर्णिम दौर के रूप में याद किया जाता है। सामान्य सीट से जिला प्रमुख बनना उस समय अपने आप में बड़ी उपलब्धि माना जाता था।
उनके कार्यकाल में गांव-गांव सड़क निर्माण, नए विद्यालयों की स्थापना, सामाजिक संस्थाओं के लिए भूमि आवंटन तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं का व्यापक विस्तार हुआ। जिला परिषद के माध्यम से शिक्षकों सहित अनेक स्थानीय नियुक्तियों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। क्षेत्र के लोग आज भी उन्हें बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार दिलाने वाले जननेता के रूप में याद करते हैं।
बाद में वे टोंक जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष भी बने। स्थानीय लोगों के अनुसार, किसानों और जरूरतमंदों को अधिक से अधिक ऋण उपलब्ध कराने के कारण उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।

1998 में पहुंचे लोकसभा
जनसेवा और मजबूत जनाधार के आधार पर कांग्रेस ने वर्ष 1998 में उन्हें टोंक लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। वे सांसद निर्वाचित हुए और संसद तक पहुंचे। सांसद बनने के बाद भी उनका जनसंपर्क पहले जैसा ही बना रहा। वे दिल्ली और अपने क्षेत्र—दोनों जगह जनता के लिए सहज रूप से उपलब्ध रहने वाले नेताओं में गिने जाते थे।
हालांकि उन्होंने दो लोकसभा चुनाव भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश मेघवाल के खिलाफ भी लड़े, जिनमें उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद क्षेत्र में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता बनी रही।
बेबाकी और दबंग शैली थी पहचान
द्वारका प्रसाद बैरवा अपनी स्पष्टवादिता और निडर स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर बड़े राजनीतिक नेताओं तक वे जनता की समस्याएं बिना किसी संकोच के रखते थे। राजनीतिक विरोधी भी उनके व्यक्तित्व और जनसंपर्क का सम्मान करते थे।
स्थानीय लोगों के बीच आज भी यह प्रसंग चर्चा में रहता है कि प्रधानमंत्री रहते राजीव गांधी का काफिला निवाई में रुकवाकर उन्होंने जनता को संबोधित करवाया था। समर्थक इसे उनकी राजनीतिक साख और प्रभाव का उदाहरण मानते हैं।
दलित उत्थान और सामाजिक समरसता के लिए किया काम
1980 के दशक में जब सामाजिक भेदभाव और छुआछूत ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक थी, तब द्वारका प्रसाद बैरवा ने दलित उत्थान, सामाजिक समरसता और शिक्षा को लेकर व्यापक अभियान चलाए। उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक समाज सहित सभी वर्गों को साथ लेकर सामाजिक भेदभाव कम करने की दिशा में काम किया।
विभिन्न समाजों के छात्रावासों के लिए भूमि आवंटन, शिक्षा के प्रति जागरूकता और सामाजिक सम्मान के लिए उनके प्रयासों को आज भी क्षेत्र में याद किया जाता है।
2013 में हुआ निधन, आज भी जीवंत है विरासत
23 जुलाई 2013 को द्वारका प्रसाद बैरवा का निधन हो गया। लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत और जनसेवा की पहचान आज भी टोंक-निवाई क्षेत्र में जीवंत है। हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर हजारों लोग श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचते हैं।

बेटे प्रशांत बैरवा आगे बढ़ा रहे विरासत
द्वारका प्रसाद बैरवा के निधन के बाद उनके पुत्र प्रशांत बैरवा राजनीति में सक्रिय हुए। छात्र जीवन में एनएसयूआई और युवक कांग्रेस से जुड़े प्रशांत बैरवा बाद में कांग्रेस के टिकट पर दो बार निवाई से विधायक बने।
कोरोना महामारी के दौरान जरूरतमंदों और प्रवासी मजदूरों की सहायता के लिए किए गए उनके कार्यों की क्षेत्र में व्यापक सराहना हुई। समर्थकों का मानना है कि प्रशांत बैरवा में आज भी अपने पिता की जनसंपर्क शैली और सेवा भाव की झलक दिखाई देती है।
जनता के दिलों में आज भी कायम है सम्मान
टोंक-निवाई क्षेत्र में स्वर्गीय द्वारका प्रसाद बैरवा को केवल सांसद, विधायक या जिला प्रमुख के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे जननेता के रूप में याद किया जाता है जिसने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया। यही कारण है कि वर्षों बाद भी उनकी राजनीतिक विरासत, विकास कार्य और सामाजिक समरसता के लिए किए गए प्रयास लोगों के बीच प्रेरणा बने हुए हैं।














































