लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
संविदाकर्मी दीपक की मौत के बाद रातभर चला धरना, पत्नी को नौकरी देने पर बनी सहमति
जयपुर। सवाई मानसिंह अस्पताल में संविदा नर्सिंगकर्मी दीपक खारवाल की मौत के बाद शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन आखिरकार प्रशासन को झुकाने में सफल रहा। शुक्रवार देर रात तक चले धरने और नेताओं के दबाव के बाद प्रशासन ने मृतक दीपक की पत्नी को एसएमएस अस्पताल में संविदा आधार पर नौकरी देने पर सहमति जताई। इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनीवाल की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में रही, जो देर रात तक परिजनों और नर्सिंगकर्मियों के साथ धरने पर डटे रहे।
25 वर्षीय दीपक खारवाल पिछले साढ़े तीन वर्षों से एसएमएस मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पताल में संविदा नर्सिंगकर्मी के रूप में कार्यरत था। महज 7-8 हजार रुपये मासिक वेतन पर आईसीयू में मरीजों की जान बचाने वाला दीपक हाल ही में नौकरी से बाहर कर दिए गए 310 नर्सिंगकर्मियों में शामिल था। नौकरी छूटने के बाद आर्थिक और मानसिक दबाव में आए दीपक ने शुक्रवार को जहरीला पदार्थ खा लिया। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
दीपक की मौत की खबर फैलते ही एसएमएस अस्पताल परिसर में माहौल गरमा गया। बड़ी संख्या में नर्सिंगकर्मी इमरजेंसी के बाहर जुट गए और जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया। हालात ऐसे बने कि कुछ समय के लिए इमरजेंसी सेवाएं भी प्रभावित हुईं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई और अस्पताल प्रशासन को हालात संभालने में काफी मशक्कत करनी पड़ी।
नेताओं की आवाजाही के बीच बेनीवाल धरने पर डटे रहे
घटना की जानकारी मिलते ही पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, कांग्रेस नेता अभिमन्यु पूनिया समेत कई नेता मौके पर पहुंचे और सरकार पर हमला बोला। हालांकि बाद में सभी नेता वहां से चले गए। इसी बीच आरएलपी सांसद हनुमान बेनीवाल अपने समर्थकों के साथ अस्पताल पहुंचे और सीधे परिजनों के बीच जाकर धरने पर बैठ गए।
बेनीवाल ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक मृतक परिवार को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक न तो शव उठाया जाएगा और न ही धरना समाप्त होगा। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि संविदाकर्मियों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
रातभर चली वार्ता, आखिरकार झुका प्रशासन
मुर्दाघर के बाहर हनुमान बेनीवाल, कांग्रेस विधायक अमीन कागजी, विधायक रफीक खान और पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास देर रात तक धरने पर बैठे रहे। जिला कलक्टर संदेश नायक, पुलिस कमिश्नर सचिन मित्तल और मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने कई दौर की वार्ता की, लेकिन लंबे समय तक कोई समाधान नहीं निकल सका।
आखिरकार देर रात हुई वार्ता में प्रशासन और परिजनों के बीच सहमति बनी। निर्णय लिया गया कि दीपक की पत्नी को एसएमएस अस्पताल में संविदा आधार पर नौकरी दी जाएगी। इसके साथ ही दीपक के बेटे को पालनहार योजना के तहत सरकारी सहायता और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। हालांकि आर्थिक मुआवजे को लेकर अंतिम निर्णय अभी बाकी है।
वार्ता के बाद हनुमान बेनीवाल ने जानकारी देते हुए अपनी पार्टी की ओर से मृतक परिवार को 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की।
साढ़े तीन साल सेवा, बदले में बेरोजगारी
दरअसल एसएमएस मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से कार्यरत करीब 400 नर्सिंगकर्मियों में से केवल 90 को नई संविदा भर्ती में जगह मिली, जबकि 310 कर्मचारियों को बाहर कर दिया गया। दीपक भी उन्हीं कर्मचारियों में शामिल था।
दीपक सांगानेरी गेट महिला चिकित्सालय के आईसीयू में कार्यरत था। उसके परिवार में दो महीने की गर्भवती पत्नी, साढ़े तीन साल का बेटा और बुजुर्ग मां हैं। पिता का पहले ही निधन हो चुका था और पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी।
सरकार पर विपक्ष का हमला
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस घटना को भाजपा सरकार की असंवेदनशीलता का परिणाम बताया। वहीं पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने इसे “सरकारी नीतियों से हुई मौत” करार देते हुए मृतक परिवार को 50 लाख रुपये का मुआवजा, पत्नी को सरकारी नौकरी और संविदाकर्मियों की सेवा सुरक्षा की मांग उठाई।
बड़ा सवाल: सेवा का इनाम या बेरोजगारी?
प्रदेश में करीब चार साल पहले हजारों नर्सिंगकर्मियों को प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से बेहद कम वेतन पर नियुक्त किया गया था। अस्पतालों में नियमित पद खाली होने के बावजूद वर्षों तक ठेका व्यवस्था के तहत उनसे सेवाएं ली जाती रहीं। कर्मचारियों को उम्मीद थी कि लंबे अनुभव का लाभ मिलेगा, लेकिन नई भर्तियों के बाद बड़ी संख्या में पुराने संविदाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
दीपक खारवाल की मौत ने एक बार फिर संविदा कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षा, ठेका प्रथा और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं इस पूरे घटनाक्रम में हनुमान बेनीवाल के देर रात तक धरने पर डटे रहने और प्रशासन से समझौता करवाने की भूमिका राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।










































