Home rajasthan जयपुर के प्राचीन शनि मंदिरों के प्रति भी भक्तों की अगाध आस्था

जयपुर के प्राचीन शनि मंदिरों के प्रति भी भक्तों की अगाध आस्था

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

जितेन्द्र सिंह शेखावत वरिष्ठ पत्रकार

ज्योतिष और वास्तु के आधार पर बसे जयपुर में सूर्य पुत्र शनिदेव भगवान के कई पुराने मंदिरों के प्रति भक्तों की गहरी आस्था आज भी कायम है ।
ज्येष्ठ के कृष्ण पक्ष में अमावस को ग्रह देवता भगवान शनि देव का जन्म दिवस भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
गंगापोल दरवाजे के पास जयपुर नगर की नीवं लगाई गई थी। इसी चौकड़ी गंगापोल इलाके से जुड़े चार दरवाजा बाहर सवाई जयसिंह के समय का बनवाया हुआ शनि देव का सबसे पुराना मंदिर आज भी मौजूद है। शनि जयन्ती के अवसर पर इस मंदिर में बरसों पहले से मेला भरता आ रहा है। रियासत काल में राजा महाराजा भी दर्शन करने आते थे। यहां पर शनिदेव की पूजा करने वाले डाकोत समाज का भी मोहल्ला है। 16 जुलाई 1981 की बाढ़ में *बास बद पुरा नाले में कटाव हो गया था।

खेजडों की  जड़ों में माना जाता शनिदेव का वास
बालानंद मठ से जुड़े एडवोकेट देवेन्द्र भगत के मुताबिक जयपुर की स्थापना के समय का शनि की पूजा का दूसरा स्थान चांदपोल बाजार में खेजड़ों का रास्ता के बाहर है। खेजड़े के वृक्ष की जड़ों में भगवान शनिदेव के तेल चढ़ाया जाता है । शास्त्रों में खेजड़ी और खेजड़े के वृक्ष को सुख समृद्धि एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला माना गया है। दशहरा आदि त्योंहारों पर लोग खेजड़े की छाल को लेकर घर में यह कहते हुए प्रवेश करते है कि सोना चांदी लाए हैं। जनानी ड्योढी की महारानियां और राजमाताएं भी पर्दे ढके* रथों में खेजडों के रास्ते के शनिदेव की पूजा करने आती थी।

उनियारों के रास्ते में शनि मंदिर

उनियारा हाऊस के सामने की गली में राजाओं के जमाने में बना हुआ शनिश्चर देव का पुराना मंदिर है । पुराने समय में भृगु जी महाराज की शोभायात्रा इस स्थान से निकलती बताई। जयपुर की स्थापना के बाद बने इस शनि मंदिर की गोलाकार छत में चमकते हुए कांच की सुन्दर जड़ाई की गई है। पहले सोने की पालिश भी दिखती थी जो अब नहीं दिखाई देती । इस शनि मंदिर में रियासत के पुण्य विभाग से दान पुण्य भी आता था।
रामगंज में मेहंदी का चौक स्थित बक्षीजी की धर्मशाला के पास शनि भगवान के खेजड़े पर भक्तगण तेल चढ़ाते है। अब यह खेजड़ा सुख कर ठूंठ बन गया है।

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