लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
एमजीएसयू की डॉ. मेघना शर्मा ने जोधपुर की अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में की तकनीकी सत्र की अध्यक्षता
बीकानेर | विजय कपूर की रिपोर्ट
बीकानेर | स्वामी दयानंद सरस्वती का उदय ऐसे समय में हुआ, जब अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षित वर्ग लोक संस्कृति को पिछड़ा मानकर उसका तिरस्कार कर रहा था। ऐसे दौर में दयानंद सरस्वती ने लोक संस्कृति को सुधारवादी दृष्टिकोण से पुनर्स्थापित करने का कार्य किया। यह विचार महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय (एमजीएसयू) के इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. मेघना शर्मा ने जोधपुर में आयोजित त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए।
जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित “राजस्थान की लोक संस्कृति : विभिन्न आयाम” विषयक इस संगोष्ठी में डॉ. मेघना शर्मा ने कहा कि दयानंद सरस्वती ने ऋषि मेलों, लोक गीतों और लोक परंपराओं के माध्यम से समाज में सुधार की चेतना विकसित की तथा शिक्षित महिलाओं को लोक संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
वैदिक तर्कवाद की कसौटी पर लोक परंपराओं का मूल्यांकन
डॉ. मेघना शर्मा ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने लोक आचरण, लोक आस्थाओं और लोक परंपराओं को बिना विवेचना स्वीकार नहीं किया, बल्कि वैदिक तर्कवाद की कसौटी पर परखकर उनमें सुधार की संभावनाएं तलाशीं।
उन्होंने बताया कि लोक साहित्य, विशेषकर लोक भाषाओं के उत्थान में दयानंद सरस्वती और आर्य समाज का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
तकनीकी सत्र की अध्यक्षता भी की
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन आयोजित प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता भी डॉ. मेघना शर्मा ने की।
इस अवसर पर मंच पर सह-अध्यक्ष के रूप में—
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बनस्थली विद्यापीठ की इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. शिल्पी गुप्ता,
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सोफिया कॉलेज, अजमेर की इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. पर्सिस लतिका दास,
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बेल्जियम की विदुषी मारग्रेट योंकेरी
उपस्थित रहीं।
संगोष्ठी का उद्घाटन व समापन
उल्लेखनीय है कि इस त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन राजस्थान धरोहर प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत द्वारा किया गया।
संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. ललित पंवार ने समापन अवसर पर सभी अतिथियों, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।

















































