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भाजपा छोड़ कांग्रेस लौटने को बेचैन नेता !

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
राजस्थान की राजनीति में ‘घर वापसी’ का दौर:
जयपुर। राजस्थान में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान टिकट नहीं मिलने से नाराज़ होकर कांग्रेस के कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हुए थे। इनमें पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक और पूर्व सांसद जैसे चेहरे शामिल थे। भाजपा ने इनमें से एक-दो को टिकट भी दिया, लेकिन वे जीत नहीं सके। अब हालात पलटते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस से भाजपा में गए अधिकांश नेता वहां खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं और एक बार फिर “घर वापसी” की राह देखने लगे हैं।
इसी कड़ी में पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय ने रविवार को औपचारिक रूप से फिर से कांग्रेस का दामन थाम लिया। वे करीब 23 महीने पहले भाजपा में शामिल हुए थे। कांग्रेस में वापसी के बाद मालवीय ने खुलकर कहा कि भाजपा में उनका मन नहीं लग रहा था, वहां घुटन महसूस हो रही थी। उन्होंने कहा—
“मैं कांग्रेस पार्टी से 40 साल से जुड़ा रहा हूं। पांच बार जिला प्रमुख रहा, सरपंच बना, विधायक बना, सांसद बना और दो बार मंत्री बना। कांग्रेस से मेरा पुराना नाता है। भाजपा में मैं बांसवाड़ा के विकास के लिए गया था, लेकिन वहां विकास रुक गया। अब मैं फिर से कांग्रेस का सिपाही हूं।”
कांग्रेस प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की मौजूदगी में मालवीय ने पार्टी जॉइन की।
लेकिन यह सिर्फ मालवीय तक सीमित नहीं है। धौलपुर-करौली के पूर्व सांसद खिलाड़ी लाल बेरवा, जो भाजपा में शामिल हुए थे, उनके भी जल्द कांग्रेस में लौटने की चर्चाएं तेज हैं। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस से भाजपा में गए अधिकांश नेता अब वापस लौटने को तैयार बैठे हैं। कई नेता अपने पुराने वरिष्ठों से संपर्क साध रहे हैं, सम्मानजनक वापसी की संभावना तलाश रहे हैं।
हालांकि कांग्रेस अब पहले जैसी “खुली छूट” देने के मूड में नहीं है। इसी कारण कई नेता सही समय का इंतजार कर रहे हैं। भाजपा में जाकर इन नेताओं को न तो संगठन में उचित स्थान मिला, न सरकार में कोई भागीदारी। अधिकांश लोग टिकट की उम्मीद में गए थे, लेकिन टिकट भी नहीं मिला। कांग्रेस में जहां उनका एक कद था, बड़े पद थे और टिकट लगभग तय रहता था, वहीं भाजपा में वे सामान्य कार्यकर्ता भी नहीं रह पाए।
उधर भाजपा पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि पार्टी में पहला अधिकार कैडर-बेस कार्यकर्ताओं का है। संघ से जुड़े, वर्षों से पार्टी की सेवा कर रहे वफादार कार्यकर्ताओं को ही संगठन और सत्ता में भागीदारी मिलेगी। इस नीति ने बाहरी नेताओं का मोहभंग कर दिया है।
नतीजा यह है कि कांग्रेस से भाजपा में गए कई नेता आज “न घर के, न घाट के” की स्थिति में हैं। भाजपा में पहचान नहीं बन पाई और कांग्रेस में वापसी आसान नहीं रही। लेकिन संकेत साफ हैं—आने वाले समय में राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस में वापसी का सिलसिला तेज हो सकता है।

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