लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नीरज मेहरा
यह शब्द किसी आम प्रेमिका के नहीं थे… बल्कि उस महिला के थे जिसे दुनिया ने अपनी खूबसूरती, शालीनता और राजसी व्यक्तित्व के कारण “विश्व की सबसे सुंदर महिलाओं” में शामिल किया।
वह थीं… राजमाता गायत्री देवी।
23 मई 1919 को जन्मी गायत्री देवी केवल जयपुर की महारानी नहीं थीं, बल्कि आधुनिक भारत में शाही गरिमा, महिला सशक्तिकरण, लोकतांत्रिक राजनीति और जनसेवा का अद्भुत संगम थीं। उनका जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। राजमहलों की शानो-शौकत, दुनिया भर में चर्चित सुंदरता, प्रेम कहानी, रिकॉर्ड बनाने वाली चुनावी जीत, इमरजेंसी में जेल और अंत तक जनता के लिए संघर्ष… उनकी जिंदगी हर मोड़ पर इतिहास बनाती रही।
दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में क्यों गिनी गईं?
23 मई 1919 को लंदन में जन्मी गायत्री देवी कूचबिहार के शाही परिवार से थीं। उनके पिता राजकुमार जितेंद्र नारायण और माता इंदिरा राजे बड़ौदा के गायकवाड़ राजवंश से थीं।
उनकी सुंदरता इतनी चर्चित थी कि प्रतिष्ठित Vogue मैगजीन ने उन्हें दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में स्थान दिया। उनकी सादगी, आत्मविश्वास और शाही व्यक्तित्व ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय फैशन आइकन बना दिया।
उन्होंने फ्रेंच शिफॉन की साड़ियों, मोतियों के हार और एलिगेंट ड्रेसिंग स्टाइल को नई पहचान दी। बेल-बॉटम से लेकर शिफॉन साड़ी तक, उनका फैशन उस दौर की हाई सोसाइटी का ट्रेंड बन गया।
जब 12 साल की बच्ची को हो गया था प्यार…
सबसे दिलचस्प कहानी उनकी प्रेम कहानी है।
अपनी आत्मकथा में गायत्री देवी लिखती हैं—
“1931 में जय कोलकाता आए थे। मैं केवल 12 साल की थी और वे लगभग 21 वर्ष के। मैं उन्हें महाराजा ऑफ जयपुर कहती थी। लेकिन मन ही मन चाहती थी कि मैं राजकुमारी नहीं… उनके घोड़े की सईस बन जाऊं… ताकि उनकी छड़ी पकड़ सकूं और उनके हाथ को छू सकूं।”
यही मासूम आकर्षण समय के साथ प्रेम में बदल गया।
महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय पहले से दो विवाह कर चुके थे।
- पहली शादी मरुधर कंवर से
- दूसरी शादी किशोर कंवर से
इसके बाद 1940 में उन्होंने 21 वर्षीय गायत्री देवी से विवाह किया और वे जयपुर की तीसरी महारानी बनीं।
क्या गायत्री देवी राजपूत थीं?
इस सवाल को लेकर अक्सर भ्रम रहता है।
सच्चाई यह है कि गायत्री देवी जन्म से राजपूत नहीं थीं।
वे कूचबिहार के शाही परिवार से थीं जबकि उनकी मां बड़ौदा के मराठा गायकवाड़ राजवंश की राजकुमारी थीं।
महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय से विवाह के बाद वे जयपुर के कछवाहा राजपूत राजघराने की महारानी बनीं।
महिला शिक्षा की सबसे बड़ी पैरोकार
राजमहलों में रहने वाली गायत्री देवी का सबसे बड़ा सपना था कि लड़कियां पढ़ें।
1943 में उन्होंने महारानी गायत्री देवी गर्ल्स स्कूल (MGD) की स्थापना की।
उस दौर में जब कई परिवार बेटियों को स्कूल भेजने से हिचकते थे, तब उन्होंने जयपुर में महिला शिक्षा की ऐसी नींव रखी जो आज भी देश के प्रतिष्ठित विद्यालयों में गिनी जाती है।
जब राजनीति में उतरकर रच दिया इतिहास
राजघरानों का दौर खत्म हुआ तो अधिकांश शासक सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए।
लेकिन गायत्री देवी ने दूसरा रास्ता चुना।
उन्होंने स्वतंत्र पार्टी का दामन थामा और 1962 में जयपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा।
परिणाम ऐसा आया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया।
उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की।
यह जीत इतनी ऐतिहासिक थी कि उनका नाम Guinness Book of World Records में दर्ज हुआ।
इसके बाद उन्होंने 1967 और 1971 में भी लोकसभा चुनाव जीते।
जब उन्होंने नेताजी के करीबी डॉक्टर को हराया
1967 का चुनाव बेहद चर्चित रहा।
कांग्रेस ने उनके सामने आजाद हिंद फौज से जुड़े और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के निजी चिकित्सक रहे डॉ. राजमल कासलीवाल को उम्मीदवार बनाया।
राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया।
लेकिन जनता ने एक बार फिर गायत्री देवी पर भरोसा जताया और वे लोकसभा पहुंचीं।
इंदिरा गांधी की मुखर आलोचक
भारत की राजनीति में गायत्री देवी हमेशा स्वतंत्र विचारों वाली नेता रहीं।
कहा जाता है कि 1965 में उन्हें कांग्रेस में शामिल होने का प्रस्ताव मिला।
लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
वे स्वतंत्र पार्टी में रहीं और इंदिरा गांधी सरकार की प्रमुख आलोचकों में शामिल रहीं।
इमरजेंसी और तिहाड़ जेल
1975 में देश में आपातकाल लगा।
विपक्ष के कई नेताओं की तरह गायत्री देवी को भी गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा गया।
देश की सबसे चर्चित महारानी का जेल जाना उस दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में शामिल रहा।
घुड़सवारी, पोलो और लग्जरी कारों का शौक
गायत्री देवी केवल खूबसूरत ही नहीं थीं।
वे बेहतरीन घुड़सवार थीं।
पोलो खेलती थीं।
शिकार और निशानेबाजी की शौकीन थीं।
उनके पास कई रोल्स रॉयस कारें थीं।
बताया जाता है कि भारत में शुरुआती मर्सिडीज-बेंज W126 500 SEL आयात कराने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
बहू का रिश्ता थाईलैंड के राजघराने से
उनके बेटे जगत सिंह ने थाईलैंड की राजकुमारी प्रियनंदना रंगसित से विवाह किया।
बाद में दोनों अलग हो गए और राजकुमारी अपने बच्चों के साथ थाईलैंड लौट गईं।
1997 में जगत सिंह का निधन हो गया।
जब राजमाता सड़क पर धरने पर बैठ गईं
यह घटना बताती है कि गायत्री देवी केवल महलों तक सीमित नहीं थीं।
2002 में जयपुर के मोतीडूंगरी क्षेत्र के पीछे बसे लोगों को हटाने की कार्रवाई शुरू हुई।
जैसे ही उन्हें इसकी जानकारी मिली, वे स्वयं मौके पर पहुंचीं।
राजमाता सड़क पर धरने पर बैठ गईं।
उनकी मौजूदगी की सूचना सरकार तक पहुंची और कार्रवाई रोकने के निर्देश दिए गए।
यही कारण था कि जयपुर की जनता उन्हें केवल महारानी नहीं, अपनी संरक्षक मानती थी।
आखिरी सफर
29 जुलाई 2009 को 90 वर्ष की आयु में जयपुर में उनका निधन हो गया।
लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है—
- महिला शिक्षा
- सामाजिक सेवा
- लोकतांत्रिक राजनीति
- शाही गरिमा
- जनहित के लिए संघर्ष
इन सबके कारण राजमाता गायत्री देवी आज भी जयपुर की सबसे लोकप्रिय शख्सियतों में गिनी जाती हैं।
गायत्री देवी केवल एक खूबसूरत महारानी नहीं थीं।
वे उस दौर की ऐसी महिला थीं जिसने राजमहलों की सीमाओं से बाहर निकलकर लोकतंत्र को अपनाया, संसद में जनता की आवाज़ उठाई, बेटियों की शिक्षा को अपना मिशन बनाया, राजनीतिक दबावों के आगे झुकने से इनकार किया और ज़रूरत पड़ने पर आम लोगों के लिए सड़क पर धरने पर बैठने से भी परहेज़ नहीं किया।
इसीलिए आज भी जयपुर उन्हें केवल “महारानी” नहीं, बल्कि “जनता की राजमाता” के रूप में याद करता है।
