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कच्चा मकान बना मौत का मलबा, आखिर गरीबों तक सुरक्षित आवास कब पहुंचेगा?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

रिपोर्ट: तुषार पुरोहित, सिरोही

सिरोही जिले में लगातार हो रही बारिश अब केवल राहत नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के लिए आफत बनती जा रही है। मंगलवार देर रात आबूरोड उपखंड के चंद्रावती गांव में 66 वर्षीय चीनाराम गरासिया अपने कच्चे मकान में सो रहे थे। तेज बारिश के बीच अचानक मकान भरभराकर ढह गया और कुछ ही पलों में पूरा घर मलबे में तब्दील हो गया। जब तक ग्रामीण और प्रशासन की टीम उन्हें बाहर निकालती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि उस दर्दनाक सच्चाई की तस्वीर है, जिसमें आज भी प्रदेश के हजारों गरीब परिवार जर्जर और कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं।

क्या सुरक्षित आवास अभी भी एक सपना है?

हर मानसून में प्रशासन लोगों से अपील करता है कि जर्जर और कच्चे मकानों में न रहें। लेकिन सवाल यह है कि जिनके पास रहने के लिए दूसरा सुरक्षित घर ही नहीं है, वे आखिर जाएं कहां?

सरकार की ओर से गरीब परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य आवास योजनाएं संचालित हैं, जिनका उद्देश्य पक्के घर उपलब्ध कराना है। लेकिन कई ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी ऐसे परिवार हैं जो विभिन्न कारणों—पात्रता, आवेदन, स्वीकृति, दस्तावेजी समस्याओं या अन्य प्रशासनिक कारणों—से पक्के आवास का लाभ नहीं ले पाए हैं।

ऐसे में हर बारिश उनके लिए जीवन और मौत का जोखिम बन जाती है।

बारिश का कहर जारी

पिछले 24 घंटे में सिरोही जिले में अच्छी बारिश दर्ज की गई। देलदर में 72 मिमी, आबूरोड में 67 मिमी, माउंट आबू में 51.6 मिमी और पिण्डवाड़ा में 5 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई। लगातार बारिश से कई निचले इलाकों में जलभराव हो गया है और ग्रामीण क्षेत्रों के कच्चे मकानों पर खतरा बढ़ गया है।

प्रशासन ने दी सावधानी की सलाह

आबूरोड उपखंड अधिकारी रामस्वरूप जौहर ने बताया कि सूचना मिलते ही पुलिस और राजस्व विभाग की टीम मौके पर पहुंची। नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है तथा पीड़ित परिवार को सरकारी प्रावधानों के तहत सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि यदि मकान जर्जर या असुरक्षित है तो सुरक्षित स्थान पर चले जाएं और किसी भी आपात स्थिति की जानकारी तुरंत प्रशासन को दें।

सबसे बड़ा सवाल

चीनाराम गरासिया अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनका ढहा हुआ कच्चा मकान एक बड़ा सवाल छोड़ गया है—

क्या हर मानसून में गरीबों की जान इसी तरह कच्ची दीवारों के नीचे दबती रहेगी?

यदि ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरतमंद परिवारों तक सुरक्षित आवास समय पर पहुंचे और जर्जर मकानों की पहचान कर प्राथमिकता के आधार पर सहायता दी जाए, तो शायद ऐसी कई दर्दनाक घटनाओं को रोका जा सकता है।

बारिश प्राकृतिक आपदा है, लेकिन कच्चे मकान में रहने की मजबूरी सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती भी है। अब जरूरत इस बात की है कि संवेदनशील परिवारों की समय रहते पहचान कर उन्हें सुरक्षित आवास उपलब्ध कराया जाए, ताकि अगली बारिश किसी और परिवार से उसका अपना न छीन ले।

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