लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
गंगधार, झालावाड़-( सुनील निगम)हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर देवशयनी एकादशी मनाई जाती है। इस बार देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई को रखा जा रहा है। मान्यता है कि, इस दिन भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में जाएंगे और इसी के साथ चातुर्मास का प्रारंभ होगा। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के दौरान सृष्टि के संचालन भगवान शिव संभालते हैं। इसके अलावा चातुर्मास के इन चार महीनों में सभी तरह के मांगलिक कार्य करना वर्जित होता है। ऐसा कहा जाता है कि, देवशयनी एकादशी पर देव सोते हैं और इसलिए इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने तथा कथा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सुख और सौभाग्य का आगमन होता है।
आइए इस कथा को जानते हैं
देवशयनी एकादशी व्रत कथा
देवशयनी एकादशी व्रत कथा को लेकर ऐसा कहा जाता है कि, सतयुग में राजा मांधाता नाम के एक न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। उनके शासनकाल में प्रजा सुखी रहती थी और राज्य में धन-धान्य से लेकर चारों ओर हरियाली-खुशहाली का वातावरण होता था। लेकिन एक समय ऐसा आया जब लगातार तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। वर्षा के न होने के कारण राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। सभी खेत सूख गए और लोगों के सामने भोजन-पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया। अपनी प्रजा की पीड़ा देखकर राजा मांधाता अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने इस संकट का समाधान खोजने का निश्चय किया और महान तपस्वी महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचे। राजा की परेशानी सुनकर महर्षि ने उनसे कहा कि, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का विधि-विधान से व्रत करें और साथ ही भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करें। उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु की कृपा से राज्य का यह संकट दूर हो जाएगा।
एकादशी का उपवास और व्रत
राजा ने महर्षि की आज्ञा का पालन करते हुए एकादशी का उपवास किया और व्रत से जुड़े सभी नियमों का भी पालन किया। ऐसी मान्यता है कि, राज के व्रत और भक्ति के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और अगले ही दिन राज्य में घनघोर वर्षा हुई। बारिश होने के कारण वहां की धरती एक बार फिर से हरी-भरी हो गई और धीरे-धीरे परेशानियों का निवारण होने लगा। तभी से ऐसी मान्यता है कि, देवशयनी एकादशी का सच्चे भाव से उपवास करने से व्यक्ति के बड़े से बड़े दुखों का अंत होता है और जीवन में सुख-समृद्धि वास करती हैं।