लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
कभी न्याय की चौपाल रहा समस तालाब आज अस्तित्व बचाने की लड़ाई में
नागौर। (प्रदीप कुमार डागा) नागौर शहर की पहचान केवल ऐतिहासिक किला ही नहीं है, बल्कि शहर के बीचों-बीच स्थित करीब 700 वर्ष पुराना समस तालाब भी इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कभी यह तालाब जल संस्कृति, प्रशासन और सामाजिक जीवन का प्रमुख केंद्र हुआ करता था, लेकिन आज अतिक्रमण और उपेक्षा के कारण अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
समस तालाब का गौरवशाली इतिहास
समस तालाब लगभग 80 बीघा क्षेत्र में फैला एक विशाल जलाशय रहा है, जो कभी नागौर के जल संरक्षण का प्रमुख केंद्र था। तालाब के किनारे स्थित प्राचीन बारादरी में तत्कालीन शासक बैठकर न्याय करते थे और यहीं कचहरी लगाकर प्रजा की समस्याओं का समाधान किया जाता था। मजबूत चारदीवारी और प्राकृतिक जल प्रवाह व्यवस्था इसकी विशेष पहचान थी।
वर्तमान स्थिति
वर्षों से रखरखाव के अभाव में तालाब के अधिकांश जल मार्ग बंद हो चुके हैं। अंगोर भूमि पर अतिक्रमण के कारण वर्षाजल का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो गया है। परिणामस्वरूप बारिश का पानी पूरी क्षमता से संग्रहित नहीं हो पाता और तालाब गंदे पानी के ठहराव का केंद्र बन गया है। ऐतिहासिक बारादरी भी जर्जर स्थिति में पहुंच चुकी है।
वंदे गंगा अभियान से उम्मीद
राज्य सरकार के वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान के तहत यदि समस तालाब को शामिल किया जाए तो इसे पुनः नागौर के प्रमुख जल स्रोत के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे न केवल जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी भी मजबूत होगी।
आवश्यक सुधार कार्य
- तालाब की सीमाओं का पुनः सर्वेक्षण
- अंगोर क्षेत्र से अतिक्रमण हटाना
- पारंपरिक जल मार्गों की बहाली
- गाद निकालकर गहराई बढ़ाना
- ऐतिहासिक बारादरी का जीर्णोद्धार
- चारदीवारी एवं हरित क्षेत्र का विकास
जल संरक्षण के साथ पर्यटन की संभावना
बारादरी के संरक्षण और सौंदर्यीकरण से समस तालाब को नागौर की विरासत पर्यटन श्रृंखला से जोड़ा जा सकता है, जिससे शहर को एक नया पर्यटन स्थल भी मिल सकता है।
नगर परिषद का पक्ष
नगर परिषद आयुक्त ने बताया कि फिलहाल अन्य तालाबों पर कार्य जारी है। अमृत 2.0 योजना के तहत सरकार को डीपीआर भेजी गई है। नागौर शहर के तीन तालाबों के लिए प्रत्येक पर 2 से 3 करोड़ रुपये का बजट प्रस्तावित किया गया है। स्वीकृति मिलने पर समस तालाब की स्थिति में सुधार संभव होगा।
आज आवश्यकता उस 700 वर्ष पुरानी सोच को पुनर्जीवित करने की है, जिसने मरुस्थल में जल संरक्षण की अनूठी मिसाल कायम की थी।
