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तुम्ही कहो के ये अंदाज़ -ए- गुफ़्तगू क्या है ?

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याददाश्त ……………….

याद करते-करते ये याद आया, कि मेरी याददाश्त चली गई,

ये दरबार लबालब भरा हुआ है,क्या मेरी बादशाहत चली गई?

कितनी ही मशक्कतों से, उस याद को याद किया था मैंने,

और वो कम्बख्त, आज के आज ही चली गई |

भूलने का सबसे अच्छा, फायदा बस एक यही है,

के जिस बात पर ठहरे थे, वो बात चली गई |

वो याद हिजाबों में आती है चली जाती है, ये सिलसिले यहाँ तक नहीं,

पर हर बार कई नकाबों की सच्चाईयों की, नक्काशियां चली गईं |

वो बेवफा नहीं मगर, कुछ बेवफा सी है,

बस मुझसे वफ़ा करते-करते उसकी, वफ़ा चली गई |

हा मुझे सब कुछ, याद आ गया है अब,

बस बीती इस जिन्दगी कि हर याद चली गई|

याद करते-करते ये याद आया कि मेरी याददाश्त चली गई….

कोमल अरन अटारिया की कलम से…..

एक शायर के रूप में ये अल्फाज़ मेरे दिल की कुछ यादों से जुड़े हुए हैं कुछ ऐसी यादें जिसे भूलने की इच्छा पर भी दिल कहता है की कभी- कभी ही सही वो यादें आती जाती रहें ताकि बीती जिन्दगी का ख़ुमार बरक़रार तो रहे और आईने की तरह मुझे मेरी जिन्दगी की हर बुराई और अच्छाई,कर्म और कुकर्म मुझे दिखाती भी रहें, मैं ख़ुद से ही सवाल करूँ, मैं खुद ही जवाब दूँ, पर कुछ लोगों का कहना है कि एक शायर एक कवि बस अपने ही पागलपन में ही रहना पसंद करता है।  एक काल्पनिक दुनिया जहाँ सच्चाई से कोई वास्ता नहीं, ऐसे लोगों के लिए मैं बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि शायर और कवि कम से कम अपनी बातों की हक़ीकत को सबके सामने तो रखता है और वक़्त आने पर अपनी बात से मुकरता भी नहीं।

आजकल के लोग तो बड़ी चालाकी से अपने अल्फाज़ों में फेर बदल करते हुए अपनी यादों को भी बेवकूफ़ बनाते हुए अपने स्वार्थ के हिसाब से उनका उपयोग करते हैं, जैसे की हमारे कई राजनेता और समाज के वो गणमान्य व्यक्ति जो अपने आप को आम जनता से उच्च स्तर पर रखते तो हैं, पर उनकी याददाश्त अक्सर चली जाती है । उन्हें खुद ही नहीं पता होता कि किस मंच पर उन्होंने क्या बोला था? जब उन्हें उनका वक्तव्य याद दिलाने की कोशिश की जाती है तो बेचारे बड़ी ही मासूमियत से खामोश हो जाते हैं पर आजकल के देश विरोधी नेताओं को ये समझ आ जाना चाहिए कि आज के दौर के आम नागरिक की याददाश्त को इतनी आसानी से मिटाया नहीं जा सकता है । अभी थोड़े दिन पहले ही मैं सोशल मीडिया पर एक राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री का एक बयान सुन रहा था जो जनता से किये वादों को बड़ी ही आसानी से भूल रहे थे और जब उनकी याददाश्त की परतें खोली जाने लगीं तो उन्हें ये याद आया कि हाँ उन्हें अब ये कहना है कि केंद्र की सरकार उन्हें जनता के हित के लिए काम ही नहीं करने दे रही है।   इन्ही शब्दों के साथ उन्होंने उस याद को याददाश्त के किसी कोने में फिर से दबा दिया ,पर जनता तो जनता ठहरी उन्हें सब कुछ याद था और आगामी चुनाव में उन्हें वोट ना देकर ,ये याद दिला दिया की उनकी याददाश्त कमजोर हो गई है और अब जनता एक भूले बिसरे आदमी को अपना नेता नहीं चुन सकती है।

काश सभी भारतीय नागरिकों में याददाश्त की क्षमता ऐसे ही सशक्त हो जाये तो कितना अच्छा होगा ऐसे भ्रष्ट नेताओं को भी ये पता चल जायेगा की अब अगर उन्हें सत्ता में रहना है तो जनकल्याण के बादाम ही उन्हें अपने पद पर बरकरार रख सकते हैं।  अब आम नागरिक की जिम्मेदारी है की वो भी अपनी याददाश्त को मांजकर उसे तरोताज़ा रखे, क्योंकि उन्हें इन देश विरोधी नेताओं को ये याद दिलाते रहना होगा कि धर्म के आधार पर विश्व की सबसे पुरातन संस्कृति को दो खंडो में बांट कर ,दो देशों का निर्माण हुआ और कश्मीर को हमेशा के लिए विवादित स्थल बना दिया गया,लाल बहादुर शास्त्री की विसरा रिपोर्ट का आज तक खुलासा नहीं हुआ ,भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु की फांसी रोकी जा सकती थी ,सुभाष चन्द्र बोस को ब्रिटिश सरकार को सौंपने के लिए एक कागज़ पर हस्ताक्षर कर दिए गए थे और सुभाष चन्द्र बोस के जीवित होने या मृत होने का रहस्य आज तक उजागर नहीं हुआ। पंडित दीन दयाल उपध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी इन दोनों की मृत्यु की गुत्थी भी आज तक अनसुलझी है। भारतीय शिक्षा प्रणाली से भारत के सनातन इतिहास को मिटा दिया गया, आखिर क्यों आक्रान्ताओं के नाम पर भारतीय धरोहरों के नाम? हजारों मंदिर और नालंदा खंडित क्यों की गयी? भारतीय  वास्तुकला के स्मारकों पर मुगलों का नाम क्यों? सम्राट अशोक,चन्द्रगुप्त मौर्य, पृथ्वीराज चौहान,छत्रपति शिवाजी,संभाजी महाराज,महाराणा प्रताप ,रानी लक्ष्मीबाई,डॉ राजा राम मोहन राय व अन्यान्य स्वत्रंता सेनानियों और हमारे इन पुरखों के शौर्य और सम्मान में कमी क्यों रही? भारतीय वैज्ञानिकों की हत्याएं क्यों? 1975 में आपातकाल क्यों? सरदार वल्लभभाई पटेल के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह क्यों? वीर सावरकर पर प्रश्नचिन्ह क्यों? जब संविधान में सेक्युलर शब्द की व्याख्या नहीं तो उसका प्रयोग क्यों? कांग्रेस द्वारा सर्वोच्च न्यायलय में श्री राम के काल्पनिक होने का हलफ़नाम क्यों? हर धार्मिक विवाद पर सनातन का अपमान क्यों? इस देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुस्लिमों का है देश के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री द्वारा संसद में ये वक्तव्य क्यों? इस बात पर देश के बुद्दिजीवी मौन क्यों ?राष्ट्रहित की हर कार्यवाही पर विरोध क्यों? आतंकियों के जनाज़े पर भीड़ क्यों? फिर से एक बार भारत को सोने की चिड़िया बनाने पर अवरोध क्यूँ? ये सब क्यों? आखिर क्यों?
हर एक बात पे कहते हो, तुम कि तू क्या है?

तुम्ही कहो के ये अंदाज़ -ए- गुफ़्तगू क्या है ?

मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर को याद रखते हुए अब समय आ गया है कि अपनी बात कहने के लिए इस देश के विकास में बाधक बन रहे लोगों के लिए अब हमें अपना अंदाज़ -ए- गुफ़्तगू बदलना होगा और देश विरोधियों को बताना होगा कि ‘रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,जब आँख से नहीं टपका तो फिर लहू क्या है?’ आज का हर सच्चा हिदुस्तानी देशभक्ति का ज़ज्बा सिर्फ अपने मन में नहीं रखता बल्कि अपनी देश भक्त लहू को अपनी आँखों से टपकाने का माद्दा भी रखता है उसे याद है कि देश के खिलाफ़ जाने वाले लोगों की याददाश्त को कब कहाँ और कैसे क्या-क्या याद दिलाना है|

अब जो लौ लगी है वो बुझेगी नहीं, हम हमवतनों में,

ख़ाक कर लेंगें चाहे ख़ुद को,पर तुझको भी जला देंगें|

याद नहीं आ रहा है,तो याद दिला देंगें,

तू फ़िक्र ना कर,तेरी याददाश्त जगा देंगें ……………………….

जयहिंद

कोमल अरन अटारिया

निर्देशक,लेखक,साहित्यकार

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