लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
लेखक – कर्नल देव आनंद लोहामरोर, सुरक्षा एवं अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के जानकार (राष्ट्रीय अध्यक्ष, भूतपूर्व सैनिक विकास समिति)
आज ऑपरेशन सिंदूर को एक वर्ष पूर्ण हो गया है। एक ऐसा सैन्य अभियान, जिसने भारत की रणनीतिक और सुरक्षा नीति को मूल रूप से बदल दिया। 6–7 मई 2025 की रात संचालित यह अभियान भारत के प्रतिक्रियात्मक राष्ट्र से सक्रिय और निर्णायक शक्ति में परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरा। इसकी पृष्ठभूमि 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले में निहित थी, जिसने केवल सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक स्थिरता, सामाजिक विश्वास और पर्यटन-आधारित अर्थव्यवस्था को भी आघात पहुँचाया। अनंतनाग जिले के शांत क्षेत्र में पर्यटकों और निहत्थे नागरिकों को निशाना बनाकर किए गए इस हमले में लगभग 26 लोगों की जान गई।
जांच में इसके तार पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों, विशेष रूप से लश्कर-ए-तैयबा, से जुड़े पाए गए। पहले जहाँ ऐसे हमलों के बाद केवल कूटनीतिक विरोध और सीमित प्रतिक्रिया देखने को मिलती थी, वहीं इस बार भारत का संदेश स्पष्ट था अब केवल “प्रतिक्रिया” नहीं, बल्कि “प्रतिकार” होगा। कूटनीतिक स्तर पर भारत ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने के प्रयास तेज किए और यह स्थापित किया कि भारत की हर कार्रवाई “काउंटर-टेरर ऑपरेशन” के दायरे में होगी। साथ ही नियंत्रण रेखा (LoC) पर निगरानी को सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ड्रोन रिकॉनिसेंस और सिग्नल इंटेलिजेंस के माध्यम से और अधिक मजबूत किया गया, जबकि आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकी नेटवर्क के विरुद्ध तीव्र अभियान चलाए। इन्हीं तैयारियों का परिणाम था “ऑपरेशन सिंदूर”, जिसके अंतर्गत भारतीय सशस्त्र बलों ने मात्र 25 मिनट के भीतर पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थित 9 प्रमुख आतंकी ठिकानों पर सटीक प्रहार किए। ये ठिकाने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण, लॉन्चिंग और हथियार भंडारण केंद्र थे। राफेल जैसे उन्नत लड़ाकू प्लेटफॉर्म, प्रिसिजन गाइडेड म्यूनिशन और आधुनिक आर्टिलरी के समन्वित उपयोग ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब “स्पीड, सरप्राइज़ और सर्जिकल एक्यूरेसी” पर आधारित युद्ध नीति में प्रवेश कर चुका है। इससे भी महत्वपूर्ण यह था कि भारत ने स्थापित कर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए वह कहीं भी निर्णायक कार्रवाई करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और सैन्य क्षमता रखता है। ऑपरेशन सिंदूर का सबसे बड़ा प्रभाव पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे “न्यूक्लियर ब्लैकमेल” नैरेटिव को कमजोर करना था। दशकों तक पाकिस्तान ने परमाणु युद्ध के भय का उपयोग कर प्रॉक्सी आतंकवाद को सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर ने यह सिद्ध कर दिया कि परमाणु सीमा के नीचे रहकर भी नियंत्रित और सटीक सैन्य कार्रवाई संभव है। इससे दक्षिण एशिया की प्रतिरोधक क्षमता में बड़ा बदलाव आया। ऑपरेशन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम इसके बाद सामने आया, जब पाकिस्तान ने पारंपरिक सैन्य जवाब के बजाय ड्रोन, यूएवी, लोइटरिंग म्यूनिशन और क्वाडकॉप्टर के माध्यम से हाइब्रिड युद्ध रणनीति अपनाई। इससे स्पष्ट हो गया कि आधुनिक युद्ध अब केवल टैंक, तोप और लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि साइबर, इलेक्ट्रॉनिक और मानवरहित प्रणालियाँ भविष्य के युद्धक्षेत्र का केंद्र बनेंगी। भारत ने इस चुनौती का सामना राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य कमान के सशक्त समन्वय से किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और सीडीएस जनरल अनिल चौहान के संचालनात्मक समन्वय में भारत ने अपने इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम (IADS) को सक्रिय किया। रडार नेटवर्क, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, RF जैमिंग, GPS स्पूफिंग और त्वरित इंटरसेप्शन क्षमताओं ने दुश्मन के ड्रोन और हवाई खतरों को लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही निष्क्रिय कर दिया। ऑपरेशन सिंदूर ने सीडीएस संरचना और त्रि-सेवा समन्वय (Tri-Service Jointness) के महत्व को भी सिद्ध किया। इस संघर्ष ने स्पष्ट किया कि भविष्य के युद्ध अलग-अलग सेनाओं के स्वतंत्र दृष्टिकोण से नहीं लड़े जा सकते। सेना, वायुसेना, नौसेना, खुफिया एजेंसियों, साइबर यूनिट्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर नेटवर्क के बीच समन्वय अब अनिवार्य हो चुका है। इस ऑपरेशन ने आधुनिक युद्ध में इंटेलिजेंस फ्यूजन के महत्व को भी स्थापित किया। ह्यूमन इंटेलिजेंस (HUMINT), टेक्निकल इंटेलिजेंस (TECHINT), सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन निगरानी, साइबर मॉनिटरिंग और सिग्नल इंटरसेप्शन को एकीकृत कर संयुक्त ऑपरेशनल ढाँचा तैयार किया गया। इससे लक्ष्य चयन सटीक हुआ और कम समय में अधिक प्रभाव उत्पन्न किया जा सका। भविष्य के युद्ध अब केवल संख्या बल पर नहीं, बल्कि सूचना और तकनीकी श्रेष्ठता पर निर्भर होंगे। ऑपरेशन सिंदूर ने “आत्मनिर्भर भारत” की रक्षा नीति की सफलता को भी उजागर किया। ‘अरुधरा’ और ‘अश्विनी’ जैसे स्वदेशी रडार सिस्टम, एंटी-ड्रोन तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर प्रणालियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संघर्ष ने स्पष्ट किया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता की आवश्यकता है। 7 से 10 मई के बीच संघर्ष सीमित लेकिन तीव्र सैन्य टकराव में बदल गया, जिसमें ड्रोन, मिसाइल, आर्टिलरी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का व्यापक उपयोग हुआ। पाकिस्तान ने जवाबी प्रयास किए, लेकिन भारत ने रणनीतिक बढ़त बनाए रखते हुए एस्केलेशन कंट्रोल कायम रखा। इससे स्पष्ट हो गया कि भविष्य के युद्ध तेज, सीमित, तकनीक-आधारित और राजनीतिक रूप से नियंत्रित होंगे।