लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवाड़ी वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय राजनीति में जब बहस गरमा जाए, तो भाषा की मर्यादा अक्सर पहली casualty बनती है। कांग्रेस प्रवक्ता सुरेन्द्र राजपूत ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर को “पाकिस्तानी मुखबिर” कह डाला। यह बयान न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि देश की कूटनीति और आंतरिक विमर्श पर भी एक गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यह लेख न केवल इस बयान की पड़ताल करता है, बल्कि यह भी देखता है कि इसके पीछे की राजनीतिक मंशा क्या है और इसका असर क्या हो सकता है।
1. जयशंकर कौन हैं – एक परिचय
डॉ. एस. जयशंकर भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं। अमेरिका, चीन, सिंगापुर जैसे महत्वपूर्ण देशों में राजदूत के रूप में कार्य करने के बाद वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र बनकर 2019 में भारत के विदेश मंत्री बने। उन्हें एक तेज-तर्रार, व्यावहारिक और स्पष्टवादी कूटनीतिज्ञ माना जाता है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के पक्ष को दृढ़ता से रखने की शैली की सराहना होती है।
2. सुरेन्द्र राजपूत का बयान – तथ्य या भावावेश?
सुरेन्द्र राजपूत का यह कहना कि जयशंकर “पाकिस्तानी मुखबिर” जैसे हैं, न केवल अतिरेक है, बल्कि यह सीधे-सीधे देश के एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की छवि धूमिल करने का प्रयास है। यदि किसी विदेश मंत्री के शब्दों या नीतियों से असहमति हो, तो उसकी आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन “मुखबिर” जैसे आरोप, बिना किसी ठोस साक्ष्य के, न केवल असंवैधानिक हैं बल्कि राष्ट्रहित के खिलाफ भी।
3. भाजपा पर वार – रणनीति या हताशा?
राजपूत के बयान के पीछे शायद यह भावना रही हो कि बीजेपी की पाकिस्तान को लेकर दोहरी नीति को उजागर किया जाए। एक ओर सरकार पाकिस्तान से कड़ा व्यवहार दिखाती है, दूसरी ओर कई ऐसे तथ्य हैं जहाँ बातचीत और व्यापार के द्वार खुले रखे गए हैं। परंतु यह आलोचना तथ्यात्मक ढंग से भी की जा सकती थी। यह बयान हताशा या लोकप्रियता बटोरने की कोशिश भी हो सकती है।
4. राजनीतिक विमर्श का पतन
यह घटना एक बार फिर यह दिखाती है कि भारत का राजनीतिक विमर्श किस हद तक गिर चुका है। जब व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और राष्ट्रविरोधी शब्दों का उपयोग होने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत होता है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को ही संयम की आवश्यकता है, क्योंकि इससे विदेशों में भारत की छवि भी प्रभावित होती है।
5. जयशंकर की विदेश नीति पर आलोचना – कहाँ तक जायज़?
जयशंकर की विदेश नीति को लेकर विपक्ष की कई वैध चिंताएँ हो सकती हैं:
रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत की स्थिति।
अमेरिका-चीन संतुलन।
पाकिस्तान के साथ संबंधों में स्थिरता या कड़ा रुख।
लेकिन इन सभी बिंदुओं पर आलोचना तथ्यों, तर्कों और नीति विश्लेषण के आधार पर होनी चाहिए – न कि व्यक्तिगत अपमान या देशद्रोह के आरोपों से।
6. क्या यह बयान कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगा?
संभावना कम है। ऐसे बयान अक्सर ‘बैकफायर’ करते हैं। जयशंकर की एक मजबूत राष्ट्रवादी छवि है और उनका व्यक्तिगत रिकॉर्ड भी साफ-सुथरा है। जब कोई विपक्षी नेता ऐसे व्यक्ति पर देशद्रोह का आरोप लगाता है, तो आम जनता इसे ओवररिएक्शन मान सकती है।
सुरेन्द्र राजपूत का यह बयान कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति की परिपक्वता पर प्रश्न खड़े करता है। एस. जयशंकर पर सीधी टिप्पणी करना, वह भी ‘पाकिस्तानी मुखबिर’ जैसे शब्दों में, न केवल गंभीर राजनैतिक असंवेदनशीलता है, बल्कि यह जनता के विश्वास को खोने वाला कदम भी हो सकता है। आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन मर्यादा उसका मस्तक है।












































