लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवाड़ी वरिष्ठ पत्रकार
संन्यास और अध्यात्म दो ऐसे पंख हैं, जिनके सहारे मनुष्य आत्मबोध और मोक्ष जैसी परम उपलब्धियों तक पहुंच सकता है। लेकिन जब यही पंख पाखंड और छल के बोझ से टूटने लगें, तो धर्म की उड़ान नहीं होती, सिर्फ गिरावट होती है — आत्मा की, समाज की और व्यवस्था की।
गुढ़ा कटला (दौसा, राजस्थान) से दिल्ली पुलिस द्वारा पकड़ा गया “डॉक्टर डेथ” यानी देवेंद्र शर्मा इसका सबसे घिनौना उदाहरण है — एक भगवाधारी रावण, जिसने अध्यात्म के वस्त्र में लपेटकर पचास से अधिक हत्याएं कीं और धर्म को एक ढाल बना लिया।
— आत्मा की, समाज की और व्यवस्था की।
गुढ़ा कटला (दौसा, राजस्थान) से दिल्ली पुलिस द्वारा पकड़ा गया “डॉक्टर डेथ” यानी देवेंद्र शर्मा इसका सबसे घिनौना उदाहरण है — एक भगवाधारी रावण, जिसने अध्यात्म के वस्त्र में लपेटकर पचास से अधिक हत्याएं कीं और धर्म को एक ढाल बना लिया।
1. जब संन्यास बन जाए अपराध का शरणस्थल
डॉक्टर डेथ, यानी देवेंद्र शर्मा, एक समय आयुर्वेदाचार्य था। उसके बाद अंग-तस्करी और हत्या की दुनिया में उतर गया। वह न केवल निर्दोषों की हत्या करता रहा, बल्कि आस्था की जमीन पर खुद को बाबा दया दास घोषित कर रामेश्वर धाम जैसे पवित्र स्थल को अपवित्र कर रहा था।
क्या साधु का चोला इतना सस्ता हो गया है कि कोई भी अपराधी उसे पहनकर समाज की आंखों में धूल झोंक सकता है?
2. आस्था का अंधकार – भगवा की लाज किसे है?
भारत एक ऐसा देश है, जहां भगवा वस्त्र देखने मात्र से लोग झुक जाते हैं। यह रंग केवल रंग नहीं, बल्कि त्याग, ज्ञान और तपस्या का प्रतीक माना गया है। पर जब ऐसे चोलों में छुपे होते हैं अपराध के दलाल, तब धर्म का अपमान होता है — न सिर्फ बाहरी रूप से, बल्कि जन-मानस के विश्वास की जड़ों में भी।
डॉक्टर डेथ जैसे लोग न सिर्फ इंसानों की हत्या करते हैं, बल्कि वे उस विश्वास की भी हत्या करते हैं जो समाज को संतों से जोड़ता है।
3. न्याय व्यवस्था के दाग – एक थप्पड़ और पचास हत्याएं
क्या यह देश का दुर्भाग्य नहीं कि
एक युवा नेता नरेश मीणा, जो एक अधिकारी को थप्पड़ मारने पर छह महीने से जेल में है,
वहीं
देवेंद्र शर्मा, पचास हत्याओं का दोषी, पैरोल पर रिहा होकर फरार था?
यह पैरोल नहीं, बल्कि न्याय का मजाक है — और यह उन परिवारों के साथ क्रूरता है जिन्होंने इस अपराधी के हाथों अपनों को खोया।
4. साधु या शैतान? धर्मस्थलों में गुप्त पनाहगाहें
आज भारत के कई धार्मिक स्थल उन भगवाधारी ठगों की सुरक्षित शरणस्थली बन गए हैं जो फरार अपराधी होते हैं।
कुंभ जैसे मेलों में जब लाखों संत एकत्र होते हैं, तो उनमें कितने वास्तविक और कितने छद्मधारी होते हैं — इसका कोई सत्यापन नहीं होता।
धर्म के नाम पर संपत्ति,
चमत्कारों के नाम पर मानसिक शोषण,
और शरण के नाम पर अंधश्रद्धा –
यह सब मिलकर अध्यात्म को गंदा कर रहा है।
5. जनता की जिम्मेदारी – आंखें मूंदने का समय नहीं
हर भगवा वस्त्रधारी पर आंख मूंदकर विश्वास करना अब मूर्खता है।
सत्य यह है कि रावण अब सीता हरने नहीं आता — वह संत बनकर समाज की श्रद्धा हरने आता है।
ऐसे में गांव-गांव, आश्रम-आश्रम, मंदिर-मंदिर में जांच होनी चाहिए कि कौन साधु है और कौन अपराधी।
6. समाधान – साधना नहीं, सत्यापन जरूरी है
सरकारों को चाहिए कि धर्मस्थलों में रहने वाले हर भगवाधारी का पहचान-पत्र और पृष्ठभूमि की जांच सुनिश्चित करें।
आश्रमों का ऑडिट और सामाजिक सत्यापन जरूरी है।
जनता को चाहिए कि वे चमत्कारों से नहीं, चरित्र से पहचानें कि सामने कौन है — साधक या साजिशकर्ता।
संन्यास और अध्यात्म आत्मज्ञान के द्वार हैं, लेकिन जब इन द्वारों की रखवाली करने वाले ही लुटेरे बन जाएं, तब समाज को आंख खोलनी पड़ती है।
भगवा केवल पहनने से नहीं आता — वह तप, त्याग, और सेवा से चमकता है।
डॉक्टर डेथ जैसे अपराधियों ने भगवा को नहीं कलंकित किया, बल्कि हमारे अंधविश्वास और मूर्खतापूर्ण श्रद्धा को उजागर किया है।
अब समय आ गया है कि हम कहें —
“आस्था हमारी है, लेकिन आंखें भी हमारी हैं।
हर भगवाधारी भगवान नहीं होता।”


















































