रवीश कुमार: नरेंद्र मोदी के विरोध में खड़े होकर समर्थन करने की कला!

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

जिस पत्रकार ने वर्षों तक खुद को मोदी सरकार का सबसे मुखर आलोचक बताया — वही रवीश कुमार, आज नरेंद्र मोदी के सबसे मजबूत प्रचारक के रूप में उभर रहे हैं… लेकिन परदे के पीछे।

क्या यह केवल पत्रकारिता है या एक सुविचारित रणनीति?
क्या रवीश कुमार सच में विपक्ष की आवाज़ हैं या भाजपा की एक “छाया रणनीति” का हिस्सा?
इस रिपोर्ट में हम तथ्यों, पैटर्न और बदलते रुख़ों के आधार पर प्रस्तुत करते हैं कैसे रवीश कुमार मोदी-विरोध के मुखौटे के पीछे, मोदी समर्थक का कार्य कर रहे हैं।
1: आलोचना की राजनीतिअसल में प्रचार!
रवीश कुमार का करियर एनडीटीवी पर “प्राइम टाइम” से पहचान बनाकर शुरू हुआ। मोदी सरकार के खिलाफ़ बोलने वाले इस पत्रकार को विपक्ष और लिबरल समाज का नायक माना गया।

परंतु, एक दिलचस्प तथ्य यह है
जिन मुद्दों पर रवीश सरकार की आलोचना करते हैं, वह वही मुद्दे होते हैं जो भाजपा के लिए अप्रासंगिक हो चुके होते हैं।
जब कृषि बिल वापिस हो चुके थे, तभी रवीश ने उस पर लंबी बहसें कीं।
जब नोटबंदी पर भाजपा खुद चुप थी, तभी रवीश ने ज़ोर-शोर से आलोचना शुरू की — जिससे BJP को यह कहने का मौका मिला कि “देखिए, लुटे-पिटे पत्रकार हमारे खिलाफ़ रो रहे हैं।”
यह एक प्रत्यक्ष विपक्ष नहीं, बल्कि “नियंत्रित विपक्ष” की भूमिका है।

2: भारत जोड़ो यात्रा में मौन और दिल्ली चुनाव में चुप्पी क्यों?

2022–2024 के बीच कई ऐसे मौके आए जब राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ मणिपुर हिंसा में केंद्रीय हस्तक्षेप
दिल्ली शराब नीति में घोटाला
रवीश कुमार ने चुप्पी साधी।

ऐसे मुद्दों पर वो शांत रहे, जहाँ मोदी सरकार पर सीधा प्रहार किया जा सकता था। सवाल ये है —
क्या यह चुप्पी पत्रकारिता का हिस्सा थी, या “सौदेबाज़ी का मौन”?

3: अडानी पर हमला = भाजपा को क्लीनचिट?

NDTV को अडानी द्वारा खरीदे जाने के बाद रवीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया और कहा —
“मैं कॉर्पोरेट दबाव से आज़ाद पत्रकारिता करूंगा।”

लेकिन आश्चर्यजनक बात यह रही कि
रवीश ने NDTV छोड़ने के बाद लगभग हर लाइव में “अडानी = मोदी” की धारणा बनाई।

इससे भ्रष्ट कॉर्पोरेट का सारा ठीकरा अडानी पर और सरकार पर से ध्यान हट गया।
सरल भाषा में कहें तो:
“मोदी को सीधे ना घेरो, अडानी पर निशाना साधो — और जनता के दिमाग में मोदी को साफ छवि मिल जाए।”
भाग 4: यूट्यूब चैनल — एक ब्रांड, जो जनता का ध्यान बँटाए

रवीश कुमार का यूट्यूब चैनल अब करोड़ों लोगों तक पहुँच रहा है।
लेकिन वो हर बार सरकार की आलोचना कुछ ऐसे मुद्दों पर करते हैं जो “भावनात्मक” हों, लेकिन “रणनीतिक तौर पर BJP को नुकसान ना पहुँचाएँ।”

जैसे बेरोज़गारी, जो हर सरकार में एक मुद्दा होता है। मीडिया की आज़ादी, लेकिन सिर्फ़ Zee या Republic की आलोचना — DD News या ANI पर चुप्पी।

जातीय राजनीति की आलोचना — लेकिन ओबीसी आरक्षण के दायरे में आने वाली BJP नीतियों पर सावधानीपूर्ण चुप्पी।


जातीय राजनीति की आलोचना — लेकिन ओबीसी आरक्षण के दायरे में आने वाली BJP नीतियों पर सावधानीपूर्ण चुप्पी।

ऐसे में रवीश कुमार एक “सेफ वेंटिलेशन” बन जाते हैं — जनता गुस्सा निकाल ले, लेकिन सरकार असल में प्रभावित न हो।

भाग 5: सूत्रों की मानें तो…

दिल्ली में पत्रकारों की भीतरी चर्चा में ये विषय आम हो चुका है कि “रवीश कुमार विपक्ष की आवाज़ नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा निर्मित विपक्ष का चेहरा हैंताकि जनता को लगे कि विरोध जिंदा है, लेकिन असल में सत्ता की रणनीति चल रही है।”

एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार:

BJP को सबसे ज्यादा फायदा तब होता है जब उसे कोई तीखा विरोध दिखाई देता है — ताकि वह अपने समर्थकों को एक भावनात्मक ताकत दे सके। और रवीश उसी भावना को जिंदा रखते हैं।”

रवीश कुमार का व्यक्तित्व एक मास्टर क्लास इमेज मैनेजमेंट है।मोदी के खिलाफ खड़े होकर विपक्ष के बीच नायक बनकर फिर वही मुद्दे उठाकर
जिनसे मोदी का वास्तविक नुक़सान नहीं होता — रवीश कुमार ने न केवल अपनी ब्रांडिंग मजबूत की, बल्कि भाजपा की छवि भी संवेदनशील, आलोचना-सहिष्णु और विवेकशील सरकार की तरह प्रस्तुत की।

“क्या रवीश कुमार सच में ‘सत्ता विरोधी’ पत्रकार हैं या सत्ता की एक परछाईं?”
या
“क्या यह रणनीति भारत की पत्रकारिता का नया चेहरा है — विरोध के बहाने समर्थन?”

लेखक: हेमराज तिवारी
सीरीज: ‘लोकतंत्र की परछाइयाँ’
“जो दिखता है, वही सच नहीं होता — और जो नहीं दिखता, वही लोकतंत्र की कुंजी है।”

 

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