लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
“गिव अप अभियान”
राजस्थान में सामाजिक आत्मजागृति का प्रतीक
राजस्थान सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘गिव अप अभियान’ आज राज्यभर में नीति-नैतिकता और जन-उत्तरदायित्व के अद्वितीय उदाहरण के रूप में उभर रहा है। खाद्य सुरक्षा योजना जैसी जीवनरेखा मानी जाने वाली सार्वजनिक योजनाओं में स्वेच्छा से नाम हटाने का यह कदम एक ऐसे दौर में लिया गया है, जब देश में मुफ्त लाभ लेने की होड़ अक्सर वास्तविक ज़रूरतमंदों के अधिकारों को पीछे धकेल देती है।
नीति का उद्देश्य और सामाजिक विकृति
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत प्रदेश के करोड़ों नागरिकों को रियायती दर पर राशन उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन समय के साथ इस योजना का लाभ अनेक ऐसे परिवार भी लेने लगे, जो अब आर्थिक रूप से सक्षम हैं — जिनके पास पक्के मकान हैं, चारपहिया वाहन हैं, लाखों की सालाना आय है — और इसके बावजूद वह खाद्य सुरक्षा सूची में शामिल बने रहे।
इस संदर्भ में ‘गिव अप अभियान’ एक नैतिक क्रांति है। यह महज़ एक सरकारी आदेश नहीं, बल्कि नागरिकों से अपील है कि वे स्वयं अपनी स्थिति का मूल्यांकन करें और अगर वो योजना के लिए अर्ह नहीं हैं, तो अपना नाम स्वेच्छा से हटवा लें।
आंकड़ों की ज़बानी: जागरूकता की लहर
दौसा जैसे ज़िलों से शुरू हुई यह मुहिम अब राजस्थान के हर जिले में फैलती जा रही है। अब तक राज्य भर में हजारों आपात्र परिवारों ने स्वेच्छा से अपना नाम हटवाया है, जिससे सरकारी सिस्टम पर बोझ कम हुआ है और वास्तविक जरूरतमंदों के लिए जगह बनी है। उदाहरण के लिए:
दौसा ज़िले में ही 2751 परिवारों के 13213 सदस्यों ने स्वेच्छा से नाम हटाया।
अन्य ज़िलों में भी जिला कलेक्टरों के निर्देश पर विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं।
राजस्व व खाद्य विभाग की टीमें ग्राम पंचायतों में घर-घर जाकर सत्यापन कर रही हैं।
यह आंकड़े न केवल जन-जागरूकता का परिचायक हैं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता की ओर भी संकेत करते हैं।
अभियान का नैतिक पक्ष: अधिकार बनाम जिम्मेदारी
आज के समय में जब लोग योजनाओं को ‘हक’ समझकर जकड़ते हैं, ऐसे में अगर कोई नागरिक कहता है — “मुझे इसकी जरूरत नहीं, किसी और को मिलना चाहिए” — तो वह समाज की आंतरिक नैतिकता की पुनरावृत्ति करता है।
यह अभियान एक गहरी बात कहता है:
“जो सक्षम है, उसे त्याग करना चाहिए; तभी समाज में न्याय का वितरण होगा।”
सरकारी योजनाएं दान नहीं होतीं, वे एक वितरण तंत्र का हिस्सा हैं, और उस तंत्र को संतुलित बनाए रखने के लिए नैतिक नागरिकों की जरूरत होती है।
राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि:
30 जून 2025 तक गिव अप करने का अंतिम अवसर है।
इसके बाद आपात्र लोगों की पहचान कर उनके विरुद्ध सूची से हटाने के आदेश एवं वसूली की कार्यवाही की जाएगी।
इसके लिए समर्पित पोर्टल, आवेदन फॉर्म और पंचायत-स्तरीय प्रचार अभियान चल रहे हैं।
ज़िलाधिकारियों को नोडल अधिकारी नियुक्त कर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि कोई भी अपात्र व्यक्ति योजना में बना न रहे। कई जिलों में मोबाइल वैन के माध्यम से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
सामाजिक भविष्य की ओर विकसित भारत का संकेत है
‘गिव अप अभियान’ की दीर्घकालिक उपयोगिता तब सिद्ध होगी जब इसे केवल एक योजना तक सीमित न रखकर, स्वैच्छिक आत्म-निषेध की संस्कृति के रूप में विकसित किया जाए।

बिजली सब्सिडी,
गैस सब्सिडी,
छात्रवृत्ति,
स्वास्थ्य बीमा,
यहाँ तक कि सरकारी आवास योजनाओं तक में अगर लोग स्वेच्छा से पीछे हटने लगें, तो यह लोकतंत्र की असली परिपक्वता होगी।
बेशक यह पहल प्रशंसनीय है, लेकिन यह सवाल भी रह जाता है — क्या सब लोग स्वेच्छा से अपना नाम हटाएंगे?
संभवतः नहीं।
इसलिए आवश्यक है कि सत्यापन तंत्र मजबूत हो,पंचायत स्तर पर सामाजिक निगरानी हो और जिन लोगों ने योजना का दुरुपयोग किया है, उन्हें दंडात्मक कार्रवाई के ज़रिए नज़ीर बनाया जाए।
गिव अप अभियान कोई सरकारी स्कीम नहीं, यह सामाजिक जागरूकता की परीक्षा है।
जिस राज्य में लोग ‘अपात्र लाभ’ को छोड़ना सीख जाएं — वह राज्य न सिर्फ आर्थिक रूप से समृद्ध होगा, बल्कि नैतिक रूप से भी मज़बूत और आत्मनिर्भर बनेगा।
राजस्थान ने एक मिसाल रखी है, अब ज़रूरत है कि पूरे भारत में यह भाव हमें मनुष्यता की ओर ले जाता है
“हमें नहीं, ज़रूरतमंद को मिलना चाहिए” —
एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले।














































