लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
कोमल अरन अटारिया
निर्देशक,लेखक,साहित्यकार, मुंबई


शिव की जटाओं से होकर पृथ्वी के तल पर आकर गंगा कहलाने वाली पवित्र नदी के अवतरण दिवस को गंगा दशहरा त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, सनातन धर्म में गंगा को पवित्रता के शीर्ष पर रखा गया है। गंगा जो मनुष्यों को अपने जल से जीवन देती है और उनके मृत शरीर की अस्थियों को भी अपने में समाहित करती है। अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की थी इसलिए पौराणिक काल से लेकर आज तक गंगा सबका ही तर्पण स्वीकार कर रही है। भारत के अध्यात्म की माँ है गंगा, गोमुख से लेकर बंगाल की खाड़ी तक की अपनी यात्रा में अपनी पवित्रता से सबके अपवित्र कर्मों को धोते हुए अपना कर्म करती है। 
गंगा का यही कर्म मनुष्यों को अपने पाप कर्म की क्षमा याचना का अवसर देता अब इस कथन पर कई लोगों का मानना है की गंगा में स्नान करने से पाप नहीं धुला करते हैं पाप के कर्म मनुष्य स्वयं निर्धारित करता है जो की एक तरीके से सत्य भी है पर सत्य ये भी है कि भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल ये पाँचों तत्वों से मिलकर ही हमारा शरीर बना है । जल तत्त्व ही पृथ्वी और शरीर में सबसे अधिक मात्रा में है। अध्यात्म की द्रष्टि से शीतलता ही मन को स्थिर कर पाती है और वही गुण जल में है । इसलिए ही गंगाजल मनुष्यों के मन को उनके अकर्मों की जलन से मुक्त करने का कार्य करता है । हिन्दू मान्यताओं के अनुसार किसी मनुष्य के मृत होने से पहले उसे गंगाजल पिलाया जाता रहा है, ताकि उसकी आत्मा को शांति मिल सके। इस आध्यात्मिक अवधारणा का विरोध हो सकता है, पर मन की इस धारणा का अवलोकन करना अत्यंत ही कठिन है। इसका सम्बन्ध परमात्मा से है और मेरे मन की चेतना गंगा को परम आत्मा के रूम में स्वीकार करती है।

एक अलौकिक शक्ति का, प्रवाह है गंगा,
शक्ति के अग्निकुंड में, अकर्मों का स्वाह है गंगा|
हिमालय की, आभा है गंगा,
वेद पुराणों की, गाथा है गंगा |
जिसने स्वयं को, शिव में साधा है,
कई अनाथों की नाथा है गंगा|
वो आराधना, वो साधना ,
है मोक्षदायनी कामना है गंगा|
भागीरथ है जिसका, सारथी,
एक सूत्र में, सबको बांधती गंगा|
ब्रहमांड की ब्रह्म धारा, है गंगा,
जब तक धरती है, तब तक है गंगा |
ये संसार जब तक जीवित है गंगा का अस्तित्व भी जीवित है ,पर अब हम सभी को ये सोचना होगा की जो गंगा हमारी सामाजिक और आध्यात्मिकता की जरुरत है ,उसकी रक्षा कैसे की जाये ?आज गंगा के तट दूषित हैं उसके अस्तित्व को हम मनुष्यों द्वारा ही दूषित किया जा रहा है । संयोग से यह गंगा दशहरा और पर्यावरण दिवस एक साथ ही है। एक ओर गंगा के सभी तटों पर आस्था की डुबकी लगाई जा रही है तो दूसरी तरफ पर्यावरण को स्वस्थ रखने का अभियान चलाया जा रहा है ।
आज आस्था और पर्यावरण दोनों साथ-साथ उत्सव मना रहे हैं पर कल क्या करना है? ये किसी को भी पता नहीं है, बस अधिकतर लोग अपने-अपने सामाजिक और राजनैतिक उद्देश्यों के लिए सबसे आगे खड़े होकर जागरूकता लाने के लिए अडिग हैं,पर जिस मंच पर आज वो खड़े हैं, वो मंच कल तक उखाड़ दिया जायेगा और सभी अपने-अपने हितों की पूर्ति करते हुए घर को चले जायेंगे। कुछ समय बाद कहीं पर ये कहते हुए सुनाई पड़ेंगें की गंगा का जल अब स्नान करने लायक नहीं रहा और देखो सब तरफ कितना दूषित पर्यावरण है, वो भूल जायेंगे की अभी कुछ समय पहले जब गंगा दशहरा और पर्यावरण दिवस पर उन्होंने कसमें खाईं थीं की वो गंगा और पर्यावरण को बचाने के लिए अपनी जान लगा देंगें। 
अगर सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की तो आमरण अनशन या धरना देकर अपना विरोध जतायेंगें शायद हर वर्ष यही सब होता रहेगा पर गंगा जैसे बहती आई है, वैसे ही बहती रहेगी और पर्यावरण जैसा है वो भी वैसा ही रहेगा ,पर सच में अगर कोई गंगा और पर्यावरण के लिए प्रयास करना चाहता है तो उसे निरंतर इस पर चर्चा करनी होगी लोगों को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है।
साथ ही सरकार को भी इस ओर अधिक से अधिक ध्यान देते हुए जनता को यह विश्वास दिलाना होगा की वो भारत की आध्यत्मिक विरासत को संभालते हुए पर्यावरण को संरक्षित करने के कार्य में प्रयासरत है। गंगा से ही पर्यावरण है और पर्यावरण से ही गंगा इसे समझने की जरुरत है तभी भागीरथ की गंगा अपने आध्यत्मिक पर्यावरण के आवरण में सबको संजो के रख पायेगी। 


















































