Home education भट्टा बैठ रहा है शिक्षा और चिकित्सा का

भट्टा बैठ रहा है शिक्षा और चिकित्सा का

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

सरकार की छूट से चारों ओर मची है लूट

✍️ महेश झालानी

कभी सरकारी स्कूलों और अस्पतालों का जमाना था

एक दौर था जब-कभी जमाना था जब सरकारी स्कूलों में मास्टरजी अपने घर से बुलाकर बच्चों को पढ़ा देते थे। फीस नाम मात्र की होती थी । कभी 5 रुपये, कभी 10 रुपये महीने। सरकारी अस्पतालों में दवाएं मुफ्त मिलती थीं और डॉक्टर को देखकर मरीज़ को भरोसा होता था कि उसका इलाज सही होगा। लेकिन आज हालात पलट गए हैं।

  • सरकारी स्कूलों में मास्टरजी बच्चों को अपने घर बुलाकर पढ़ा देते थे।

  • फीस सिर्फ़ 5-10 रुपये महीना होती थी।

  • अस्पतालों में दवा मुफ्त मिलती थी और डॉक्टर को देखकर भरोसा जागता था।

लेकिन आज हालात बिल्कुल पलट गए हैं।

शिक्षा: सेवा से कारोबार तक

    • सालाना फीस 50 हज़ार से लेकर लाखों तक

      • डोनेशन, एडमिशन फीस, यूनिफॉर्म और किताबों के नाम पर खुली लूट

      • कभी 10 रुपये में मिलने वाली शिक्षा अब लाखों में बिक रही है।

अब सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का नामोनिशान नहीं है। न पढ़ाई है, न अनुशासन, न ही शिक्षक। मजबूरन माता-पिता अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं, जहाँ फीस 50 हजार से लेकर लाखों रुपये सालाना तक वसूली जा रही है। एडमिशन फीस, डोनेशन, यूनिफॉर्म और किताबों के नाम पर खुली लूट चल रही है। कभी 10 रुपये में मिलने वाली शिक्षा आज लाखों में बिक रही है।

स्वास्थ्य सेवाएँ: इलाज से ज़्यादा व्यापार

सरकारी अस्पतालों की हालत इतनी खराब है कि आम जनता वहाँ जाने से डरती है।

  • पहले 2 रुपये में पूरी दवा मिल जाती थी,आज वही दवा 200 रुपये में प्राइवेट मेडिकल स्टोर से

  • लखनऊ के एक अस्पताल ने डेंगू मरीज का ₹1.2 लाख का बिल बनाया।
    जयपुर में बुखार के इलाज पर ₹75 हज़ार का बिल थमा दिया गया
  • साधारण ऑपरेशन पर लाखों का बिल

  • स्वास्थ्य सेवाओं की लूट इससे भी ज्यादा खतरनाक है। लखनऊ के एक बड़े अस्पताल ने साधारण डेंगू मरीज का बिल 1.2 लाख रुपये बना दिया। जयपुर में एक निजी अस्पताल ने बच्चे के बुखार के इलाज पर 75 हजार रुपये का बिल थमा दिया। ये कोई अपवाद नहीं, बल्कि हर शहर का आम किस्सा है। सबसे बड़ा मज़ाक तो यही है कि नेता और अफसर खुद भी सरकारी स्कूल और अस्पतालों को मज़ाक समझते हैं। उनके बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं, उनका इलाज पांच सितारा अस्पतालों में होता हैआम जनता चाहे कर्ज में डूबे या सड़कों पर दम तोड़े, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

ये अपवाद नहीं, बल्कि हर शहर की सच्चाई है।

सरकार की चुप्पी और दोहरा रवैया

न नए सरकारी स्कूल खुल रहे हैं, न अस्पताल। जो पहले से हैं, वहाँ शिक्षक और डॉक्टर नदारद। नेता और अफसर खुद अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं, और इलाज पाँच सितारा अस्पतालों में कराते हैं। जनता के लिए बने स्कूल-अस्पताल बस दिखावा रह गए हैं।

आंकड़ों से समझिए

1990 में सिलेंडर 100 रुपये से भी कमआज 1000 रुपये से ऊपरडॉक्टर की फीस 20-30 रुपये → आज 500 रुपये से कम मिलना मुश्किल।  हर बुनियादी ज़रूरत पर मुनाफाखोरी की मोटी परत चढ़ चुकी है।

सवाल जनता का

क्या शिक्षा और स्वास्थ्य अब अधिकार नहीं, बल्कि अमीरों के लिए लक्ज़री बन गए हैं? क्या गरीब और मिडिल क्लास का बच्चा पढ़ाई और इलाज का सपना देखने की हिम्मत करे? कब तक जनता को लूट की दुकानों का सब्सक्रिप्शन लेना पड़ेगा?तो सवाल सीधा है कि क्या शिक्षा और स्वास्थ्य अब अधिकार नहीं, बल्कि अमीरों के लिए लग्ज़री बन चुके हैं? क्या गरीब और मिडिल क्लास का बच्चा पढ़ाई और इलाज का सपना देखने की भी हिम्मत करे? अगर हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में शिक्षा और स्वास्थ्य आम इंसान के लिए सिर्फ़ सपना और नसीब बनकर रह जाएंगे। कभी कहा जाता था कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा “सेवा” हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अब यह दोनों ही “मुनाफे का धंधा” बन चुके हैं। सवाल है—क्या बच्चा पढ़ाना और बीमारी का इलाज कराना अब सिर्फ अमीरों का हक रह गया है?

निष्कर्ष

जब तक सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य को मिशन नहीं मानेंगी और अच्छे स्कूल-अस्पताल नहीं खोलेंगी, तब तक यह सवाल गूंजता रहेगा—क्या शिक्षा और स्वास्थ्य सचमुच हक हैं, या सिर्फ़ पैसे वालों के लिए बिकाऊ माल? जब तक सरकारें इस बुनियादी ज़रूरत को मिशन नहीं मानतीं और पर्याप्त संख्या में अच्छे स्कूल-अस्पताल नहीं खोलतीं, तब तक यह सवाल गूंजता रहेगा । जनता को पढ़ाई और इलाज चाहिए या लूट की दुकानों का आजीवन सब्सक्रिप्शन?
बच्चा पढ़ाना और बीमारी का इलाज कराना अब सिर्फ़ अमीरों का हक क्यों रह गया है?”

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