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भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को मनाई जाएगी ऊब छठ

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

झालावाड़ से विशेष रिपोर्ट

भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को ऊब छठ का पर्व मनाया जाता है। इसे चन्दन षष्ठी, चानन छठ और चंद्र छठ के नाम से भी जाना जाता है। कई राज्यों में इस पर्व को हलषष्ठी के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था और उनका शस्त्र हल था।


ऊब छठ का महत्व

  • विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत करती हैं।

  • कुँवारी लड़कियां अच्छे पति की कामना से उपवास रखती हैं।

  • भगवान बलराम और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है।

  • सूर्यास्त के बाद व्रत का संकल्प लेकर चंद्र उदय तक खड़े रहकर उपासना की जाती है।

  • चांद को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है।


ऊब छठ पूजा विधि

  1. महिलाएं और युवतियां दिनभर उपवास रखती हैं।

  2. शाम को स्नान कर नए वस्त्र पहनती हैं और मंदिर जाती हैं।

  3. वहां भजन-कीर्तन, पूजा और कथा श्रवण करती हैं।

  4. भगवान को कुमकुम, चंदन, फूल, फल, सुपारी और अक्षत अर्पित किए जाते हैं।

  5. दीपक और अगरबत्ती जलाकर चंदन से तिलक किया जाता है।

  6. चंद्रमा के उदय पर अर्घ्य अर्पित कर व्रत खोला जाता है।

  7. परंपरा अनुसार लोग नमक रहित या सामान्य भोजन ग्रहण करते हैं।


ऊब छठ व्रत कथा

ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा बताती हैं कि प्राचीन काल में एक साहूकार और उसकी पत्नी का पुत्र था। उनकी मृत्यु के बाद अगले जन्म में साहूकार बैल और पत्नी कुतिया बनी और पुत्र के घर रहने लगे।

श्राद्ध के दिन पुत्र के घर खीर बनी लेकिन एक चील मरे सांप को खीर में गिरा गई। कुतिया ने खतरे को भांपकर खीर में मुंह डाल दिया ताकि कोई उसे न खा सके। इस पर पुत्रवधू ने गुस्से में कुतिया को मार दिया।

रात को कुतिया ने बैल से दुख साझा किया – न भोजन मिला, न सम्मान। पुत्रवधू ने यह बातें सुन ली और पंडित से उपाय पूछा। पंडित ने बताया कि कुतिया उसकी मां और बैल पिता हैं। मां को यह जन्म इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने रजस्वला अवस्था में भी रसोई का काम किया

पंडित ने उपाय बताया कि उनकी कुंवारी बेटी ऊब छठ व्रत करे और चांद को अर्घ्य देकर वह जल बैल और कुतिया पर डाले। बेटी ने ऐसा किया और उसी समय दोनों को मोक्ष मिल गया।


निष्कर्ष

झालावाड़ और आसपास के क्षेत्रों में ऊब छठ का व्रत आस्था, त्याग और परिवार की मंगलकामना का प्रतीक है। यह पर्व श्रद्धा, संयम और परंपराओं से जुड़ा है, जिसे विवाहित और अविवाहित महिलाएं पूरे उत्साह के साथ मनाती हैं।

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