लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
जयपुर : पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आज अरावली संरक्षण के समर्थन में #SaveAravalli अभियान से जुड़ते हुए अपनी सोशल मीडिया डीपी बदल दी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ फोटो बदलना नहीं, बल्कि नई परिभाषा के खिलाफ सांकेतिक विरोध है, जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ‘अरावली’ नहीं माना जा रहा।
गहलोत ने चेतावनी दी कि यह बदलाव उत्तर भारत के पर्यावरण और भविष्य के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने तीन प्रमुख चिंताएं साझा कीं:
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मरुस्थलीकरण और लू से सुरक्षा: अरावली थार रेगिस्तान की रेत और गर्म हवाओं को रोकती है। छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए खोलने से तापमान बढ़ सकता है।

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प्रदूषण नियंत्रण: अरावली और इसके जंगल NCR सहित आसपास के शहरों के लिए ‘फेफड़े’ का काम करते हैं। ये धूल भरी आंधियों और प्रदूषण को कम करने में मदद करते हैं।
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जल संरक्षण और इकोलॉजी: अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को भूजल में भेजती हैं। पहाड़ियों के नुकसान से पानी की किल्लत, वन्यजीव लुप्त होने और पारिस्थितिकी खतरे में पड़ सकती है।

गहलोत ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टि से छोटी पहाड़ियाँ भी उतनी ही अहम हैं जितनी बड़ी चोटियाँ। उन्होंने केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए इस परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाए और अरावली का मूल्यांकन ऊंचाई नहीं बल्कि पर्यावरणीय योगदान के आधार पर किया जाए।











































