लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
गणतंत्र के दिन सवालों में घिरा लोकतंत्र
सिरोही। गणतंत्र दिवस—वह दिन जब भारत ने संविधान को अपनाया और हर नागरिक को अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा का भरोसा दिया। लेकिन इसी दिन राजस्थान के सिरोही जिले के भारजा गांव में यह उत्सव सवालों, डर और गहरी पीड़ा में बदल गया। यहां तिरंगा तो फहराया गया, लेकिन जश्न नहीं था। यह दिन आत्ममंथन का बन गया।
स्वरूपगंज और रोहिड़ा थाना क्षेत्रों में 25 जनवरी 2026 को पिंडवाड़ा उपखंड मजिस्ट्रेट द्वारा BNSS की धारा 163 लागू कर दी गई, जो 8 फरवरी तक प्रभावी रहेगी। प्रशासन का तर्क है—कानून एवं शांति व्यवस्था बनाए रखना। लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे अलग तस्वीर पेश करती है।
पिछले चार महीनों से पिंडवाड़ा क्षेत्र के ग्रामीण अरावली पर्वतमाला, जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। धरने, महापंचायतें, रैलियां और प्रशासनिक कार्यालयों का घेराव हुआ, लेकिन अब तक कोई भी हिंसक घटना सामने नहीं आई। इसके बावजूद प्रस्तावित आंदोलन से ठीक पहले धारा 163 लागू कर देना कई सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि यह कदम 28 जनवरी को प्रस्तावित शांतिपूर्ण आंदोलन को रोकने के लिए उठाया गया, ताकि जनता की आवाज़ दबाई जा सके। सवाल यह है—
क्या शांतिपूर्ण विरोध अब कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन गया है?
या फिर यह निर्णय किसी निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से लिया गया?
ग्रामीणों की मुख्य मांग है कि कमलेश मेटाकास्ट प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित चूना पत्थर खनन परियोजना को रद्द किया जाए। उनका कहना है कि इस परियोजना से अरावली पर्वतमाला की संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। जलस्रोत सूखेंगे, जंगल उजड़ेंगे और खेती योग्य भूमि नष्ट हो जाएगी। यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है।
सरकार इसे विकास का नाम दे रही है, लेकिन ग्रामीण पूछ रहे हैं—किसका विकास?
यदि विकास के नाम पर प्रकृति और जनता को कुचला जाए, तो वह विकास नहीं बल्कि विनाश है। अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं हैं, वे राजस्थान की जल-रेखा हैं। बारिश, भूजल और हरियाली इन्हीं से जुड़ी है। इन्हें नुकसान पहुंचाना आने वाली पीढ़ियों से उनका हक छीनने जैसा है।
धारा 163 लागू होने के बाद लोगों में आक्रोश इतना गहरा है कि 26 जनवरी को भारजा गांव में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में एक भी ग्रामीण शामिल नहीं हुआ। केवल स्कूल के बच्चों और स्टाफ ने औपचारिक रूप से ध्वजारोहण किया। यह दृश्य अपने आप में सरकार की नीतियों के खिलाफ एक मौन लेकिन सशक्त विरोध था।
संघर्ष समिति के सूत्रों के अनुसार आंदोलन फिलहाल स्थगित हो सकता है, लेकिन समाप्त नहीं। 8 फरवरी के बाद नई तारीख की घोषणा कर आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। ग्रामीणों का साफ संदेश है—
“हम अरावली को बचाकर ही दम लेंगे। चाहे सरकार कितनी भी दमनकारी नीतियां अपनाए, हम पीछे नहीं हटेंगे।”
आज सिरोही के ये गांव पूरे देश से सवाल कर रहे हैं—
क्या संविधान हमें बोलने का अधिकार देता है या चुप रहने का आदेश?
गणतंत्र का अर्थ केवल तिरंगा फहराना नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ का सम्मान करना भी है।
लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता की होती है।
और जब जनता सवाल पूछने लगती है, तब सत्ता को जवाब देना ही पड़ता है।
