लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
– अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर एक मंथन”
हेमराज तिवारी- वरिष्ठ पत्रकार
हर साल 17 जुलाई को दुनिया भर में “अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस” मनाया जाता है।
यह दिन केवल कानून की किताबों का उत्सव नहीं है — यह उन सभी अनकही कहानियों की याद है जहाँ न्याय आज भी सपना है। यह उन आवाज़ों की पुकार है जो अदालतों के बाहर, जेलों के भीतर और सिस्टम की दीवारों के पीछे गूंज रही हैं।
इस दिन की पृष्ठभूमि:
17 जुलाई 1998 को रोम संधि (Rome Statute) पर हस्ताक्षर हुए थे, जिससे अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (International Criminal Court – ICC) की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य है
युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध और नरसंहार जैसे अपराधों के लिए वैश्विक स्तर पर जवाबदेही तय करना।
यह पहल इस सिद्धांत पर आधारित थी “कोई भी व्यक्ति, कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है।”
परंतु सवाल यह है — क्या सचमुच ऐसा है?
आज जब हम भारत सहित दुनिया के कई देशों में चारों ओर देखें, तो हमें न्याय नहीं, न्याय के नाम पर इंतज़ार और अंतहीन प्रक्रिया दिखाई देती है।
बलात्कार पीड़िता वर्षों तक सिर्फ़ तारीख़ सुनती है।
घोटालों में लिप्त अमीर राजनीतिक चेहरे टीवी डिबेट में मुस्कराते हैं।
आम आदमी, जिसका घर उजड़ता है या जिसकी ज़मीन छिनती है, वह न्याय के लिए पैरवी करता है, गिरता है, उठता है, पर थक जाता है।
न्याय की धारणा अब एक वर्ग विशेष का विशेषाधिकार बनती जा रही है।
कानून की डगर उन लोगों के लिए आसान है जिनके पास वकीलों की फौज है, लेकिन कठिन है उस किसान के लिए जो अदालत में पैर रखने से भी डरता है।
क्या यह वही न्याय है जिसका सपना गांधी, अम्बेडकर और अब्राहम लिंकन ने देखा था?
न्याय का मतलब केवल सज़ा नहीं होता।
न्याय का मतलब है — पीड़ित को आश्वासन देना कि वह अकेला नहीं है।
सत्ता को स्मरण कराना कि वह लोकसेवा है, लोकशक्ति नहीं।
सामान्य नागरिक को वह गरिमा देना, जो लोकतंत्र का मूल है।
अंतर्राष्ट्रीय न्याय का संकट:
जब रूस, अमेरिका, चीन जैसे शक्तिशाली देश ICC को मान्यता नहीं देते, तो यह एक वैश्विक द्वैध (double standard) बन जाता है —
जहाँ कमजोर देशों में न्याय के नाम पर हस्तक्षेप होता है, पर बड़े देश खुद को हर जांच से परे मानते हैं।
भारत की न्याय व्यवस्था – आत्ममंथन की ज़रूरत वर्षों तक चलते मुक़दमे, जमानतों पर राजनीति,
न्यायपालिका की नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी,
मीडिया ट्रायल बनाम न्यायिक चुप्पी।
इन सब सवालों को अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर उठाना अत्यंत आवश्यक है।
न्याय केवल अदालत की दीवारों तक सीमित नहीं होना चाहिए।
हर नागरिक, हर बच्चा, हर स्त्री, हर पीड़ित — वह चाहे किसी भी जाति, धर्म, राष्ट्र या लिंग का हो —
जब वह “सिस्टम” में अपने लिए स्थान पा सके, तभी सच्चा अंतर्राष्ट्रीय न्याय होगा।
17 जुलाई को हमें केवल ICC की स्थापना नहीं, बल्कि मानवता की गरिमा और सच्चे न्याय की विश्व-प्रतिज्ञा को दोहराना चाहिए।
“कानून से ऊपर कोई नहीं — यह तब तक एक आदर्श वाक्य है, जब तक पीड़ित को यह सच न लगे।”










































