Home education पिंक सिटी प्रेस क्लब में गूंजा साहित्य और रंगमंच का संगम

पिंक सिटी प्रेस क्लब में गूंजा साहित्य और रंगमंच का संगम

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
पिंक सिटी नेशनल लिटरेचर ड्रामा फेस्टिवल का भव्य आयोजन

(ऋषिकेश राजोरिया की कलम से)

जयपुर। कई वर्षों के बाद पिंक सिटी प्रेस क्लब में साहित्य और रंगमंच का सजीव और सार्थक उत्सव देखने को मिला, जब पिंक सिटी नेशनल लिटरेचर ड्रामा फेस्टिवल का आयोजन किया गया। इस फेस्टिवल की परिकल्पना लेखक एवं रंगकर्मी अशोक राही ने की, जिसे पिंक सिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष मुकेश मीणा की दृढ़ इच्छाशक्ति ने साकार रूप दिया। आयोजन में महासचिव मुकेश चौधरी उपाध्यक्ष डॉ मोनिका शर्मा परमेश्वर शर्मा और प्रसाद अध्यक्ष विकास शर्मा सहित कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों का भी सक्रिय सहयोग रहा।
फेस्टिवल का उद्घाटन फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के सीईओ पवन अरोड़ा ने किया। उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, कवि-नाटककार नन्दलाल आचार्य, प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना प्रेरणा श्रीमाली और वरिष्ठ छायाकार सुधीर कासलीवाल ने अपने विचार रखे। इस दौरान नन्दलाल आचार्य और प्रेरणा श्रीमाली ने विशेष रूप से भाषा में हो रहे समकालीन बदलावों और उनके सांस्कृतिक प्रभाव पर सारगर्भित चर्चा की।
फेस्टिवल का पहला विशेष सत्र दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार ईश मधु तलवार की स्मृति को समर्पित रहा। इस संगोष्ठी में दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, यशवंत व्यास, त्रिभुवन और प्रदीप गोविल ने नई पीढ़ी की पढ़ने की रुचियों और बदलते पाठकीय रुझानों पर विचार साझा किए। सत्र का कुशल संचालन आस्था सक्सेना ने किया।
दूसरे विचार सत्र में लोकतंत्र और समकालीन पत्रकारिता विषय पर गंभीर विमर्श हुआ। इसमें हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति नंदकिशोर पांडे, दैनिक भास्कर के संपादक तरुण शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त नारायण बारेठ तथा पत्रकार अंकिता शर्मा ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इस सत्र का संचालन गरिमा श्रीवास्तव ने किया।
दिनभर चले विचार-विमर्श के बाद शाम का समापन रंगीन मुशायरे से हुआ। मुशायरे में बकुल देव, आदिल राजा आदिल, फारूक इंजीनियर, मलका नसीम सहित अन्य शायरों ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
पिंक सिटी नेशनल लिटरेचर ड्रामा फेस्टिवल ने जयपुर के सांस्कृतिक और साहित्यिक परिदृश्य को नई ऊर्जा दी और यह साबित किया कि साहित्य, पत्रकारिता और रंगमंच आज भी समाज के बौद्धिक संवाद का सशक्त माध्यम हैं।

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