जगन गुर्जर की जेल में हत्या पर आखिर गुर्जर नेताओं की जुबान क्यों बंद ?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

जब वोट चाहिए तो ‘समाज’, लेकिन न्याय की बात आए तो सन्नाटा!

राजस्थान ही नहीं, पूरे देश की राजनीति में जाति का असर किसी से छिपा नहीं है। टिकट वितरण से लेकर मतदान तक जातीय समीकरणों की खुलकर चर्चा होती है। चुनाव आते ही समाज याद आता है, समाज के नाम पर सभाएं होती हैं, समाज के नाम पर वोट मांगे जाते हैं। लेकिन जब उसी समाज के किसी व्यक्ति की जेल के भीतर हत्या हो जाए, तब क्या नेताओं की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती?

कुख्यात डकैत जगन गुर्जर का आपराधिक रिकॉर्ड बेहद गंभीर

कुख्यात डकैत जगन गुर्जर का आपराधिक रिकॉर्ड बेहद गंभीर था। उस पर हत्या, अपहरण, फिरौती सहित सौ से अधिक मामले दर्ज थे। कानून के मुताबिक वह जेल में था और उसके अपराधों का फैसला अदालत को करना था। लेकिन जेल के भीतर उसकी हत्या हो जाना अपने आप में कानून-व्यवस्था और जेल प्रशासन पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। किसी भी कैदी का अपराध कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे संविधान के तहत जीवन और सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है।

मंत्री गिर्राज सिंह मलिंगा को दे दी थी जान से मारने की धमकी

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जगन गुर्जर ने डकैत रहते हुए तत्कालीन बाड़ी विधायक और पूर्व मंत्री गिर्राज सिंह मलिंगा को धमकी दी थी और गिरफ्तारी के बाद कथित रूप से कहा था कि मलिंगा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ज्यादा करीबी हैं और सचिन पायलट के रास्ते का रोड़ा बन रहे थे, उसी जगन की जेल में हत्या के बाद सचिन पायलट की ओर से आज तक दो लाइन का ट्वीट तक सामने नहीं आया।

अभी राज्य में  बीजेपी की  सरकार है । विपक्ष के वरिष्ठ नेता होने के नाते क्या जेल के भीतर हुई हत्या की निष्पक्ष जांच की मांग करना भी जरूरी नहीं समझा गया?

बेनीवाल की प्रतिक्रिया आई सामने

विडंबना देखिए कि जिन सांसद हनुमान बेनीवाल ने कभी संसद में जगन गुर्जर के एनकाउंटर की मांग की थी, वही जेल में हत्या के बाद सबसे पहले सामने आए। उन्होंने इस घटना की निंदा की, जेल प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए और यहां तक कहा कि जिस कैदी पर हत्या का आरोप लगाया जा रहा है, वह अकेले यह वारदात कर ही नहीं सकता। यानी जिसने कभी सख्त कार्रवाई की मांग की थी, उसने भी जेल के भीतर हुई हत्या को कानून-व्यवस्था की विफलता माना।

अशोक गहलोत ने सबसे पहले की जांच की मांग

दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जिन्हें जगन अपना राजनीतिक विरोधी मानता था, उन्होंने भी घटना वाले दिन इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और उच्च स्तरीय जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि जेल के अंदर हत्या होना गंभीर मामला है और यदि किसी की मिलीभगत है तो दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।

लेकिन सवाल उन नेताओं पर है जो चुनाव के समय खुद को गुर्जर समाज का सबसे बड़ा प्रतिनिधि बताते हैं।

राज्य के गृह राज्यमंत्री जवाहर सिंह बेढ़म, टोंक से कांग्रेस नेता सचिन पायलट, हिण्डोली से कांग्रेस विधायक अशोक चांदना, खेतड़ी से भाजपा विधायक धर्मपाल गुर्जर, बाड़ी से बसपा विधायक जसवंत सिंह गुर्जर, देवली-उनियारा से भाजपा विधायक राजेंद्र गुर्जर, करौली से भाजपा विधायक दर्शन सिंह गुर्जर, राज्यसभा सांसद अलका गुर्जर, गुर्जर नेता विजय सिंह बैंसला और अन्य कई नेताओं की ओर से इस मामले पर कोई मुखर सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

सवाल यह नहीं है कि कोई नेता जगन गुर्जर के अपराधों का समर्थन करे। सवाल यह है कि क्या जेल में हुई हत्या की निष्पक्ष जांच की मांग करना भी अपराधियों का समर्थन माना जाएगा?

क्या संविधान केवल अच्छे लोगों के लिए है? क्या जेल प्रशासन की जवाबदेही केवल तब तय होगी जब मरने वाला व्यक्ति बेदाग होगा?

सोशल मीडिया पर युवा गुर्जरों का गुस्सा 

आज सोशल मीडिया पर गुर्जर समाज के युवाओं के बीच यही सवाल सबसे ज्यादा उठ रहा है। उनका कहना है कि जब चुनाव आता है तो समाज सबसे पहले याद आता है, लेकिन जब समाज का कोई व्यक्ति जेल के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मारा जाता है तो न्याय की आवाज उठाने से भी नेता पीछे हट जाते हैं।

कई लोगों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह जगन गुर्जर की आपराधिक छवि थी। नेताओं को डर था कि यदि उन्होंने निष्पक्ष जांच की मांग भी की तो उन पर अपराधी का समर्थन करने या जातिवाद की राजनीति करने का आरोप लग सकता है। इसलिए अधिकांश नेताओं ने चुप्पी साध लेना ही बेहतर समझा।

लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है।

सवाल यह है कि यदि जेल की चारदीवारी के भीतर भी कोई सुरक्षित नहीं है, तो फिर जेल व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन तय करेगा? यदि कोई अपराधी है, तो उसे अदालत सजा देगी। लेकिन यदि उसकी हत्या जेल में हो जाती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच की मांग करना कानून के राज की मांग है, किसी अपराधी का महिमामंडन नहीं।

आज मुद्दा जगन गुर्जर नहीं, बल्कि जेल सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के शासन का है। और इसी सवाल का जवाब जनता अपने जनप्रतिनिधियों से मांग रही है।

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