लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
किसान आंदोलनों का वह कॉमरेड जिसकी आज भी मिसाल दी जाती है
हनुमानगढ़/जयपुर
राजस्थान की किसान राजनीति में कॉमरेड श्योपत सिंह मक्कासर का नाम संघर्ष, जनआंदोलनों और बेबाक नेतृत्व के लिए हमेशा याद किया जाएगा। एक संपन्न किसान परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपना पूरा जीवन किसानों, मजदूरों और कमजोर वर्गों के अधिकारों की लड़ाई में समर्पित कर दिया। चार बार विधायक और एक बार सांसद रहे श्योपत सिंह सबसे ज्यादा चर्चा में तब आए, जब पुलिस हिरासत में दलित युवक की मौत के विरोध में वे करीब 600 किलोमीटर तक शव के साथ जयपुर पहुंचे और विधानसभा परिसर में प्रवेश कर गए।

संपन्न परिवार में जन्म, लेकिन चुना संघर्ष का रास्ता
कॉमरेड श्योपत सिंह गोदारा का जन्म 27 जनवरी 1927 को ननिहाल लाखा हाकम (वर्तमान रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर) में हुआ। उनका पैतृक गांव मक्कासर (हनुमानगढ़) था। उनके पिता चौधरी हरिराम 1977 से 1980 के बीच बीकानेर से सांसद रहे।
छात्र जीवन में वे एक अच्छे एथलीट थे, लेकिन राजनीति में उन्होंने सत्ता नहीं, बल्कि संघर्ष का रास्ता चुना। वामपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को राजस्थान में मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चार बार विधायक, एक बार सांसद
श्योपत सिंह मक्कासर 1957, 1962, 1977 और 1985 में हनुमानगढ़ से विधायक चुने गए। 1962 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राजस्थान में सबसे अधिक मत प्राप्त करने का रिकॉर्ड बनाया। बाद में 1989 में वे बीकानेर लोकसभा सीट से सांसद भी बने।
जब दलित के शव के साथ विधानसभा पहुंच गए
1962 में दलित युवक कुर्दाराम की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। घटना से आक्रोशित श्योपत सिंह शव के साथ गंगानगर से जयपुर तक करीब 600 किलोमीटर का सफर तय करते हुए निकले।
रास्ते में कई जगह पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने पुलिस के घेरों को तोड़ते हुए जयपुर पहुंचकर विधानसभा परिसर में प्रवेश किया। उनके आंदोलन के बाद दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। यह घटना राजस्थान की राजनीति में आज भी जनसंघर्ष के सबसे बड़े प्रतीकों में गिनी जाती है।

भूमि आंदोलन से लेकर नहर संघर्ष तक
श्योपत सिंह ने 1959 में भाखड़ा नहरी क्षेत्र की भूमि नीलामी का विरोध किया और जेल गए। इस आंदोलन के बाद हजारों किसानों को जमीन मिली।
1970 में इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र की भूमि नीलामी के खिलाफ उन्होंने बड़ा आंदोलन खड़ा किया। इस दौरान 20 हजार से अधिक किसानों को गिरफ्तार किया गया। उनके पूरे परिवार को भी जेल भेजा गया और आंदोलन में 15 किसानों ने जान गंवाई। बाद में एक लाख से अधिक किसानों को प्रति परिवार 16 एकड़ जमीन आवंटित की गई।
1968 के भीषण अकाल में उन्होंने हजारों किसानों और लाखों मवेशियों के साथ सूरतगढ़ कृषि फार्म पर कब्जा आंदोलन का नेतृत्व किया। 1988 और 1993 में घग्घर नदी की बाढ़ के बाद किसानों की कर्जमाफी के लिए भी उन्होंने व्यापक आंदोलन किए।
हर बड़े किसान आंदोलन में रहे सबसे आगे
1997 में जयपुर सचिवालय का घेराव, 2000 में एक लाख किसानों के विधानसभा घेराव और 2002 में गंग नहर के पानी की मांग को लेकर चले आंदोलन में उनकी भूमिका निर्णायक रही।
2004-05 में इंदिरा गांधी नहर परियोजना के पहले चरण के किसान आंदोलन और 2005 में बिजली दरों में बढ़ोतरी के खिलाफ जयपुर महापड़ाव में भी उन्होंने अग्रिम पंक्ति में रहकर नेतृत्व किया। अपने जीवनकाल में वे विभिन्न आंदोलनों के दौरान कई बार जेल गए और कुल मिलाकर साढ़े तीन वर्ष से अधिक समय जेल में बिताया।
बीमारी के बावजूद नहीं छोड़ा संघर्ष
जीवन के अंतिम वर्षों में वे उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। इसके बावजूद वे प्रतिदिन लगभग 18 घंटे तक पार्टी और किसान सभा के कार्यों में सक्रिय रहे।
26 मार्च 2006 को पैतृक गांव मक्कासर में हृदयाघात से उनका निधन हो गया। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार अंतिम संस्कार से पहले उनकी आंखें दान की गईं।
आज भी गूंजते हैं उनके नारे
किसान आंदोलनों में आज भी श्योपत सिंह मक्कासर की ये पंक्तियां अक्सर सुनाई देती हैं—
“लख लानत कमजोरा नूं,
दुनिया मनदी जोरा नूं।”
किसानों और मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले इस जननेता को आज भी राजस्थान के किसान आंदोलन का सबसे मजबूत चेहरा माना जाता है।
ग्राफिक्स / इंफो बॉक्स
प्रोफाइल
- जन्म : 27 जनवरी 1927
- जन्मस्थान : लाखा हाकम (वर्तमान रायसिंहनगर)
- पैतृक गांव : मक्कासर, हनुमानगढ़
- पिता : चौधरी हरिराम (पूर्व सांसद, बीकानेर)
- विधायक : 1957, 1962, 1977, 1985
- सांसद : बीकानेर (1989)
- निधन : 26 मार्च 2006
बड़ी उपलब्धियां
- 1962 में राजस्थान में सबसे अधिक मतों से जीतने वाले CPI विधायक
- भाखड़ा भूमि आंदोलन के प्रमुख नेता
- 600 KM शव यात्रा के साथ विधानसभा पहुंचे
- इंदिरा गांधी नहर भूमि आंदोलन का नेतृत्व
- गंग नहर, बिजली और कर्जमाफी आंदोलनों का चेहरा
- किसानों-मजदूरों के संघर्ष का प्रतीक नेता



















































