लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
झुंझुनूं। राजस्थान की राजनीति में जब भी किसानों की आवाज बुलंद करने वाले नेताओं का जिक्र होता है, तो सबसे प्रमुख नामों में शीशराम ओला का नाम लिया जाता है। शेखावाटी की राजनीति में चार दशकों तक मजबूत पकड़ रखने वाले ओला ने सरपंच से लेकर केंद्रीय मंत्री तक का लंबा और प्रभावशाली सफर तय किया। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में 15 चुनाव जीतकर एक अनूठा रिकॉर्ड बनाया और किसानों, ग्रामीण विकास तथा बालिका शिक्षा के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ी।
सेना के जवान से जननेता तक का सफर
शीशराम ओला ने युवावस्था में सेना में रहते हुए देश की सेवा की। इसके बाद वर्ष 1948 में अपने पैतृक गांव अरड़ावता के सरपंच चुने गए और यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई। 1957 में वे पहली बार खेतड़ी से विधायक बने। इसके बाद 1957 से 1990 तक लगातार आठ बार राजस्थान विधानसभा पहुंचे। वे दो बार जिला प्रमुख भी रहे और बाद में झुंझुनूं से पांच बार लोकसभा सांसद चुने गए।
राजस्थान सरकार में वे कई महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे। वहीं केंद्र में पी.वी. नरसिम्हा राव, एच.डी. देवेगौड़ा और डॉ. मनमोहन सिंह की सरकारों में केंद्रीय राज्य मंत्री, खान मंत्री तथा केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई।
बगावत कर जीता चुनाव, फिर लगातार बने सांसद
1996 में कांग्रेस में विभाजन के दौरान पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस (तिवारी) के टिकट पर चुनाव लड़कर कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार कैप्टन अयूब खान को हराया। इसके बाद उन्होंने लगातार पांच बार लोकसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की।
बालिका शिक्षा के बड़े पैरोकार
आज जिस शेखावाटी को बालिका शिक्षा के लिए देशभर में पहचान मिलती है, उसकी मजबूत नींव रखने वालों में शीशराम ओला का अहम योगदान रहा। वर्ष 1952 में उन्होंने अपने गांव अरड़ावता में मात्र तीन छात्राओं के साथ ‘इंदिरा गांधी बालिका निकेतन’ की शुरुआत की। उस दौर में ग्रामीण समाज में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता था।
महिला शिक्षा और सामाजिक कार्यों में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1968 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।

1962 के युद्ध में जुटाया सोना और धन
भारत-चीन युद्ध के दौरान वर्ष 1962 में उन्होंने झुंझुनूं और शेखावाटी क्षेत्र के लोगों तथा व्यापारियों से रक्षा कोष के लिए बड़ी मात्रा में सोना और धन एकत्रित कर देश को समर्पित किया। यह उनके राष्ट्रसेवा के भाव का बड़ा उदाहरण माना जाता है।

अद्भुत याददाश्त और जनता से सीधा जुड़ाव
शीशराम ओला की सबसे बड़ी पहचान उनकी असाधारण स्मरण शक्ति थी। कहा जाता है कि वे वर्षों बाद मिलने वाले व्यक्ति का नाम और गांव तक याद रखते थे। दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर झुंझुनूं और शेखावाटी से आने वाले लोगों के लिए किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं होती थी। लोग सीधे उनसे मिलकर अपनी समस्या बताते थे और समाधान होने तक उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था भी वहीं होती थी।
उनका हाजिरजवाब अंदाज भी काफी चर्चित था। उम्र को लेकर सवाल उठने पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, “मैं वो सगला काम कर सकूं हूं, जो 25 साल का छोरो कर है।” उनकी यह बात आज भी लोग याद करते हैं।

खाट पर रहते हुए भी जीता चुनाव
जीवन के अंतिम दौर में गंभीर रूप से बीमार होने के बावजूद शीशराम ओला जनता के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रहे। स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद उन्होंने चुनाव जीता और केंद्रीय मंत्री बने। 15 दिसंबर 2013 को 86 वर्ष की आयु में गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में उनका निधन हो गया।
अधूरा रह गया सबसे बड़ा सपना
शीशराम ओला का सबसे बड़ा सपना था कि झुंझुनूं और पूरे शेखावाटी क्षेत्र तक नहरी पानी पहुंचे, ताकि यहां के किसान भी हरियाणा की तरह समृद्ध हो सकें। उन्होंने इस दिशा में लगातार प्रयास किए, लेकिन उनके जीवनकाल में यह सपना पूरा नहीं हो सका।
आज भी शेखावाटी के लोग उन्हें एक ऐसे किसान नेता, जनसेवक और दूरदर्शी राजनेता के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने राजनीति को सत्ता नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम बनाया।












































