लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
उनियारा (दुर्योधन मयंक)। श्री दिगम्बर जैन सुखोदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र सुथड़ा में आयोजित श्री अष्टान्हिका महापर्व के आठवें दिवस पर प्रिंस शास्त्री देवांश ने कहा कि अष्टान्हिका केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मजागरण और आत्मकल्याण का पावन पर्व है।
प्रबंध समिति के अध्यक्ष महावीर प्रसाद पराणा एवं संतू जैन ने बताया कि जैन समाज द्वारा मनाया गया यह महापर्व अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और आध्यात्मिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। आठ दिनों तक प्रतिदिन प्रातःकाल अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं नन्दीश्वर विधान का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
शास्त्रों के अनुसार अष्टान्हिका पर्व का संबंध दिव्य नन्दीश्वर द्वीप से है, जहां देवगण अनादिकाल से जिनेन्द्र भगवान की आराधना करते हैं। मनुष्य वहां प्रत्यक्ष रूप से नहीं जा सकता, इसलिए प्रतीकात्मक रूप से इस पर्व को मनाकर आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग की प्रेरणा प्राप्त करता है। सिद्ध परमेष्ठी वे होते हैं जिन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया है, उनकी आराधना से जीव को वीतरागता एवं आत्मशुद्धि की प्रेरणा मिलती है।
इस अवसर पर शास्त्री प्रिंस जैन देवांश के निर्देशन में मंगलाष्टक के साथ नित्य अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। मूलनायक भगवान की शांतिधारा तेजकंवर, सुनील कुमार (कोटा), वार्षिक शांतिधारा रमेशचंद, रौनक सर्राफ (जयपुर), पांडुशिला पर चन्द्रप्रकाश एवं महावीर प्रसाद खूंट वाले (उनियारा) द्वारा की गई।
इसके पश्चात देव-शास्त्र-गुरु पूजा, चौबीस भगवान की पूजा, मूलनायक भगवान की पूजा एवं नंदीश्वर द्वीप की पूजा के साथ सिद्धों की आराधना कर अष्टान्हिका महापर्व का समापन किया गया।
भक्तामर संयोजक हुकुमचंद शहर वाले एवं नरेंद्र जैन बनेठा ने बताया कि सायं 7 बजे से श्रेष्ठी परिवार पवन कुमार, अमन कुमार, गौरांश कुमार (देई) तथा मंगलवार भक्तामर मंडल ककोड़ के तत्वावधान में भक्तामर दीपार्चना श्रद्धापूर्वक संपन्न हुई।
इससे पूर्व सोमवार को अष्टान्हिका महापर्व का सातवां दिवस भी विधि-विधानपूर्वक मनाया गया।
















































