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भुवनेश्वर के मुक्तेश्वर-सिद्धेश्वर मंदिर में तोरण द्वार पर बुद्ध आकृतियों से उठते सवाल?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 शिव मंदिर की हजार साल पुरानी कहानी

कलिंग कलिंग शैली में निर्मित मंदिर में दिखती है बुद्ध प्रतिमाएं

भुवनेश्वर से नीरज मेहरा की रिपोर्ट

भुवनेश्वर। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर को मंदिरों का शहर कहा जाता है। इसी शहर में स्थित मुक्तेश्वर महादेव मंदिर अपने आकार से ज्यादा अपनी स्थापत्य कला, बारीक पत्थर की नक्काशी और सबसे अलग पहचान रखने वाले तोरण द्वार के कारण देश-विदेश के पर्यटकों और इतिहास में रुचि रखने वालों का ध्यान खींचता है। लगभग एक हजार वर्ष पुराना यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और कलिंग मंदिर स्थापत्य के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ओडिशा सरकार के प्रकाशन में इसे 10वीं शताब्दी का मंदिर और ओडिशाई वास्तुकला का “रत्न” बताया गया है।

किसने बनवाया था मुक्तेश्वर मंदिर?

मुक्तेश्वर मंदिर के निर्माण को लेकर उपलब्ध सरकारी पर्यटन स्रोत इसे सोमवंशी शासक राजा ययाति प्रथम के शासनकाल से जोड़ता है और निर्माण की अवधि लगभग 875 से 904 ईस्वी बताता है। वहीं ओडिशा के सरकारी ऐतिहासिक संदर्भों में इसे व्यापक रूप से 10वीं शताब्दी का मंदिर बताया गया है। इसलिए वेबसाइट रिपोर्ट में इसे 9वीं-10वीं शताब्दी के संक्रमणकाल में विकसित सोमवंशी काल का मंदिर कहना अधिक सुरक्षित है।

यदि 875-904 ईस्वी की तिथि को आधार माना जाए तो 2026 में इसकी आयु लगभग 1,120 से 1,150 वर्ष बैठती है। हालांकि अलग-अलग स्रोतों में निर्माण की तिथि को लेकर अंतर मिलता है।

मुक्तेश्वर नाम के पीछे क्या मान्यता है?

भगवान शिव यहां मुक्तेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं। ‘मुक्तेश्वर’ नाम का अर्थ ही मुक्ति से जुड़े ईश्वर से है। स्थानीय धार्मिक आस्था में यह स्थान शिव उपासना और आध्यात्मिक मुक्ति की कामना से जुड़ा हुआ है।

मंदिर परिसर में मरिची कुंड भी है, जिसके साथ स्थानीय धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। ऐसी मान्यताओं को धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाना चाहिए।

सबसे बड़ा आकर्षण है मंदिर का तोरण द्वार

मुक्तेश्वर मंदिर की पहचान उसके खूबसूरत मकर तोरण से होती है। मंदिर के सामने बना यह मेहराबदार प्रवेश द्वार सामान्य मंदिरों के प्रवेश द्वार से अलग दिखाई देता है। इसमें अत्यंत बारीक पत्थर की नक्काशी, स्त्री आकृतियां, बेल-बूटे, मोर और बंदरों सहित अनेक अलंकरण दिखाई देते हैं। ओडिशा सरकार के संदर्भ प्रकाशन में भी मंदिर के सामने बने इस मकर तोरण को इसकी प्रमुख स्थापत्य विशेषता बताया गया है। इसमें भगवान बुद्ध की तीन मूर्तियां भी नजर आती है.

क्या तोरण पर भगवान बुद्ध की मूर्तियां हैं?

यही मुक्तेश्वर मंदिर से जुड़ा सबसे दिलचस्प सवाल है।

मंदिर के तोरण और आसपास की नक्काशी को ध्यान से देखने पर कुछ आकृतियां ऐसी दिखाई देती हैं, जिन्हें स्थानीय लोग या पर्यटक बुद्ध की आकृतियों से जोड़कर देखते हैं। इसी कारण यह धारणा भी सुनने को मिलती है कि शायद यहां पहले कोई बौद्ध धार्मिक स्थल रहा होगा और बाद में इसे शिव मंदिर का रूप दिया गया।

लेकिन उपलब्ध आधिकारिक पर्यटन विवरण मंदिर को भगवान शिव का मंदिर बताते हैं और तोरण की प्रमुख मूर्तिकला में महिला आकृतियों, मोर, बंदर तथा सजावटी अलंकरणों का उल्लेख करते हैं। इसलिए यह कहना कि “यह पहले निश्चित रूप से बुद्ध मंदिर था और बाद में इसे मुक्तेश्वर मंदिर बनाया गया”, उपलब्ध प्रमाणों से स्थापित तथ्य नहीं है।

दूसरी ओर, भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर मुक्तेश्वर के आसपास के 10वीं शताब्दी के मंदिरों के संदर्भ में यह उल्लेख मिलता है कि उस दौर की भुवनेश्वर मंदिर कला में हिंदू, बौद्ध और जैन स्थापत्य परंपराओं का मिश्रित प्रभाव दिखाई देता है। इसलिए बौद्ध प्रभाव की चर्चा पूरी तरह निराधार नहीं है, लेकिन इसे मंदिर के मूल रूप से बौद्ध मंदिर होने का प्रमाण मानना अलग बात है।

आखिर लोगों को बुद्ध मंदिर होने का भ्रम क्यों होता है?

इसका एक कारण उस समय की स्थापत्य कला में दिखाई देने वाले साझा कलात्मक प्रतीक और आकृतियां हो सकती हैं। 10वीं शताब्दी में ओडिशा में मंदिर स्थापत्य तेजी से विकसित हो रहा था। सरकारी शोध प्रकाशनों में इस दौर की मूर्तिकला में हिंदू देवी-देवताओं के साथ नाग, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, चैत्य-आर्च, पुष्प और अन्य धार्मिक-सांस्कृतिक रूपांकनों के प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

यानी किसी आकृति का बौद्ध कला से मिलता-जुलता होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पूरा मंदिर बौद्ध मंदिर था। मुक्तेश्वर की वास्तुकला को उस समय की व्यापक कलिंग कला परंपरा के संदर्भ में देखना अधिक उचित है।

किस शैली में बना है मंदिर?

मुक्तेश्वर मंदिर कलिंग शैली की मंदिर वास्तुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका विमान रेखा देउल परंपरा से जुड़ा है, जबकि जगमोहन में पीढ़ा देउल शैली दिखाई देती है। मंदिर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है और इसकी दीवारों तथा प्रवेश संरचनाओं पर अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी की गई है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार मंदिर की ऊंचाई लगभग 35 फीट है।

ओडिशा सरकार के अनुसार मुक्तेश्वर मंदिर कलिंग वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसकी रेखा शिखर, पीढ़ा देउल वाला जगमोहन और मकर तोरण बाद के ओडिशाई मंदिर स्थापत्य की दिशा को समझने में महत्वपूर्ण हैं।

कलिंग शैली के विकास में क्यों महत्वपूर्ण है मुक्तेश्वर?

मुक्तेश्वर को केवल प्राचीन मंदिर कहना इसके स्थापत्य महत्व को छोटा कर देगा। यह उस दौर का मंदिर है जब ओडिशा की मंदिर वास्तुकला में अनुपात, शिखर, मंडप और सजावटी मूर्तिकला लगातार विकसित हो रही थी।इसके बाद 11वीं शताब्दी में राजारानी और लिंगराज जैसे मंदिरों में कलिंग शैली अधिक विकसित और भव्य रूप में सामने आती है। ओडिशा सरकार के संदर्भ प्रकाशन में सोमवंशी शासकों के संरक्षण में 10वीं और 11वीं शताब्दी के दौरान कलिंग शैली के विकास का उल्लेख मिलता है।

मुक्तेश्वर के साथ सिद्धेश्वर मंदिर की भी अपनी पहचान

मुक्तेश्वर मंदिर के परिसर में स्थित सिद्धेश्वर मंदिर भी लगभग 10वीं शताब्दी का माना जाता है। यह भी भगवान शिव को समर्पित है।

भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार सिद्धेश्वर मंदिर की वास्तुकला पंचरथ शैली से जुड़ी है और इसे शास्त्रीय कलिंग मंदिर वास्तुकला का उदाहरण माना जाता है। इसके शिखर के आसपास छोटे-छोटे उप-शिखर और चारों ओर सिंह आकृतियां इसकी विशेषताओं में शामिल हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव के साथ गणेश की प्रतिमा भी उल्लेखनीय है।

मुक्तेश्वर-सिद्धेश्वर की असली कहानी क्या बताती है?

मुक्तेश्वर और सिद्धेश्वर मंदिरों की कहानी केवल आस्था की कहानी नहीं है। यह उस समय के ओडिशा की कला, धर्म और स्थापत्य विकास की कहानी भी है।मुक्तेश्वर में भगवान शिव की उपासना के साथ अत्यंत विकसित मूर्तिकला दिखाई देती है। तोरण द्वार इसे भुवनेश्वर के दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देता है। वहीं बौद्ध और जैन कला से मिलते-जुलते कुछ कलात्मक प्रभाव उस दौर की व्यापक सांस्कृतिक परिस्थितियों की ओर संकेत करते हैं।

इसलिए “यह पहले बुद्ध मंदिर था और बाद में शिव मंदिर बना” जैसी लोकधारणा को एक रोचक स्थानीय धारणा के रूप में जरूर बताया जा सकता है, लेकिन इसे प्रमाणित इतिहास के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।

करीब 1100 साल बाद भी कायम है पहचान

आज मुक्तेश्वर मंदिर भुवनेश्वर की धार्मिक और स्थापत्य विरासत का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का आकार भले ही लिंगराज की तरह विशाल नहीं है, लेकिन उसकी बारीक नक्काशी और विशिष्ट तोरण उसे अलग पहचान देती है।

 

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