“मन, बुद्धि और विवेक – आम इंसान की आंखों पर बंधी सियासत की पट्टी”

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

हेमराज तिवारी

जब इंसान जन्म लेता है, तो उसके पास तीन अद्भुत शक्तियाँ होती हैं – मन, बुद्धि, और विवेक।
मन सोचता है, बुद्धि निर्णय करती है, और विवेक सही-गलत का अंतर समझाता है।

लेकिन आज का भारत ऐसा क्यों है कि इन तीनों शक्तियों पर पर्दा डाल दिया गया है?

राजनीति का खेल – भ्रम की चाल

कांग्रेस कहती है– “बीजेपी वाले चोर हैं!”
बीजेपी कहेगी – “कांग्रेस वाले भ्रष्ट हैं!”
और फिर सोशल मीडिया, न्यूज चैनल और पार्टियों के आईटी सेल इन बातों को हजारों बार दोहराएंगे —
इतना कि आम आदमी को लगे कि यही सच है।

पर सच क्या है?

क्या हर कांग्रेसी गलत है?
क्या हर भाजपाई ईमानदार है?
क्या कोई पार्टी दूध की धुली है?

जब आंखों पर बंध जाती है पट्टी…

राजनीतिक दल जानते हैं कि यदि आम जनता सोचने लगेगी, सवाल पूछने लगेगी — तो उन्हें जवाब देना पड़ेगा।
इसलिए, वे क्या करते हैं?

टीवी डिबेट में शोर मचवाओ,
सोशल मीडिया पर गालियाँ चलवाओ,
धर्म, जाति, राष्ट्रभक्ति जैसे शब्दों को हथियार बनाओ और जनता को “हम बनाम वो” के जाल में उलझाओ ,वो चाहते हैं कि आपकी आंखों पर विचार की पट्टी बंधी रहे ,मन को बहकाओ, बुद्धि को भ्रमित करो, विवेक को सुला दो

जब मन सिर्फ भावनाओं से भरा हो —
जब बुद्धि केवल डर और नफरत से निर्देशित हो —जब विवेक चुपचाप कोने में बैठा हो —तब एक साधारण नागरिक क्या करता है?

वह वोट डालता है भावनाओं में बहकर।
न उसने मुद्दे देखे, न घोषणापत्र पढ़ा, न अपने क्षेत्र का हाल जाना और फिर जब पांच साल तक बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, सुरक्षा में कुछ नहीं बदला — तो वह फिर से अगले चुनाव में वही गलती दोहराता है।

“तो फिर आम आदमी करे क्या?”

यह सवाल हर समझदार नागरिक के मन में आता है और जवाब बहुत सीधा है सुनो सबकी, पर सोचो खुद की। भावनाओं से मत बहो, मुद्दों पर वोट दो। नेता के चेहरे से नहीं, उसके किए गए काम से पहचानो।
वोट सिर्फ अपने धर्म, जाति, पार्टी या नफरत के आधार पर न दो। वोट उस पर दो, जो आपके क्षेत्र के विकास की बात करे।

विवेक की वापसी – सच्चा लोकतंत्र
यहीं से शुरू होता है ,अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश सुधरे, हमें मन को शांत करना होगा,
बुद्धि को खोलना होगा,
और विवेक को फिर से जगाना होगा।

कोई पार्टी, कोई नेता, कोई विचारधारा — देश से बड़ा नहीं हो सकता।
नेता बदलेंगे, सरकारें बदलेंगी —
पर अगर आपकी सोच नहीं बदली,
तो इतिहास खुद को दोहराता रहेगा।

सत्ता की भूखी राजनीति हमें लड़ा सकती है, भ्रमित कर सकती है, पर गुलाम बनाना हमारे विवेक के मरे बिना संभव नहीं।

इसलिए आंखों से पट्टी हटाइए। सवाल पूछिए , लोकतंत्र को सिर्फ एक वोट नहीं, एक विवेकपूर्ण निर्णय है न की किसी तानाशाह की बपौती!!

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