लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
सरकारी नौकरी मिलते ही दहेज को अधिकार समझने वाले समाज के मुंह पर करारा तमाचा: शिक्षक आशीष बैरवा ने मिसाल पैश की
जयपुर। जब देश में सरकारी नौकरी लगते ही दहेज की बोली लगने लगती है, जब कार, नकद और जमीन को “रिश्ते की शर्त” बना दिया जाता है, तब जयपुर के एक युवा शिक्षक ने पूरे समाज को आईना दिखाने का काम किया है।
दहेज लोभियों को दिखाया आईना
रामनगर सोडाला निवासी आशीष कुमार बैरवा ने यह साबित कर दिया कि बदलाव की शुरुआत भाषणों से नहीं, अपने फैसलों से होती है।
तृतीय श्रेणी शिक्षक पद पर चयन होते ही आशीष के लिए दहेज से लदे रिश्तों की कतार लग गई। किसी ने कार की पेशकश की, किसी ने नकद का लालच दिया, लेकिन आशीष ने पहले ही दिन साफ शब्दों में कह दिया—
“मैं दहेज नहीं लूंगा, एक रुपया भी नहीं। सिर्फ सवा रुपया शगुन के रूप में।”
शिक्षक ने पहले खुद को पढ़ाया
आशीष का कहना है कि वह बच्चों को शिक्षा देता है, लेकिन जब तक वह खुद उस शिक्षा को अपने जीवन में नहीं उतारेगा, तब तक उसकी बातें खोखली हैं। अखबारों में रोज़ दहेज के नाम पर हो रही मौतें, बेटियों पर जुल्म और बापों पर चढ़ता कर्ज उसे भीतर तक कचोटता रहा। तभी उसने ठान लिया कि वह दहेज प्रथा के खिलाफ खड़ा होगा, चाहे कीमत कुछ भी हो।
साधारण परिवार, लेकिन रीढ़ की हड्डी फौलाद की
आशीष के पिता चिरंजी लाल बैरवा इलेक्ट्रीशियन हैं, मां गीता देवी गृहिणी। दादा राजमिस्त्री रहे, दादी गृहिणी। न कोई रसूख, न दौलत—फिर भी पूरा परिवार आशीष के फैसले के साथ मजबूती से खड़ा रहा।
यह वही समाज है, जहाँ माता-पिता बेटे की नौकरी लगते ही दहेज के सपने देखने लगते हैं, लेकिन यहाँ परिवार ने बेटे के सिद्धांत को चुना, सुविधा को नहीं।
“दहेज नहीं लेंगे” सुनकर ससुराल पक्ष भी चौंका
जब आशीष को लड़की पसंद आई, तो ससुराल पक्ष—वाटिका सिमलिया रोड निवासी गोपाल जी बैरवा, किसान और राजमिस्त्री—ने अपनी हैसियत के अनुसार दहेज देने की बात कही।
लेकिन आशीष और उनके परिजनों ने साफ मना कर दिया।
शुरुआत में ससुराल वालों को लगा कि शायद उन्हें गरीब समझा जा रहा है, लेकिन जब उन्हें बताया गया कि यह आशीष का पहले से लिया गया संकल्प है, तो वे भी भावुक हो गए। यह रिश्ता दहेज से नहीं, सम्मान से जुड़ा।
4 फरवरी 2025: जब सवा रुपये में इतिहास बना
4 फरवरी 2025 को आशीष ने आशा के साथ बिना किसी दहेज के विवाह कर दिया।
ना कार, ना नकद, ना दिखावा—सिर्फ संस्कार, सादगी और साहस।
यह शादी नहीं थी, यह उस सोच पर सीधा प्रहार था, जो बेटियों को बोझ और दहेज को हक मानती है।
बहन नहीं, मजबूरी नहीं—फिर भी दहेज से इनकार
आशीष दो भाइयों में से एक हैं, उनकी कोई बहन नहीं है। यानी यह तर्क भी नहीं कि “कल बहन की शादी करनी है।”
फिर भी उन्होंने दहेज को ठुकराया, क्योंकि यह मजबूरी का नहीं, चरित्र का सवाल है।
समाज के लिए सीधा संदेश
दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं, फिर भी समाज आंख मूंदे बैठा है। बेटियों के पिता कर्ज में डूब जाते हैं, मांएं गहने गिरवी रखती हैं और समाज चुप रहता है।
आशीष ने दिखा दिया कि अगर एक शिक्षक चाह ले, तो वह पूरे समाज को पढ़ा सकता है।
आज जब सरकारी नौकरी को दहेज कमाने का लाइसेंस बना लिया गया है, ऐसे समय में सवा रुपये में शादी कर आशीष कुमार बैरवा ने यह साबित कर दिया कि
इंसान बड़ा पद से नहीं, अपने फैसलों से होता है।
इस साहसिक कदम के लिए समाज ने आशीष, उनके माता-पिता और पूरे परिवार को खुले दिल से सम्मान और धन्यवाद दिया है।











































