शास्त्री कोसलेंद्रदास की नियुक्ति – पारंपरिक दर्शन और श्रमण परंपरा के नवोदय की ओर एक कदम

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लोक टुडे न्यूज नेटवर्क

भारतीय ज्ञान परंपरा में दर्शन केवल बौद्धिक अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला मार्ग है। विशेष रूप से श्रमण परंपरा – जिसमें जैन, बौद्ध और आजीवक जैसे पंथ आते हैं – आत्मसंयम, अहिंसा और गहन वैचारिक विमर्श की गौरवशाली धारा रही है। इस ऐतिहासिक और दार्शनिक परंपरा के संरक्षण, शोध और प्रचार हेतु एक महत्वपूर्ण पहलू की शुरुआत हाल ही में हुई जब शास्त्री कोसलेंद्रदास को जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के श्रमण विद्या संकाय के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया।

कोसलेंद्रदास की नियुक्ति का महत्व:

शास्त्री कोसलेंद्रदास एक प्रतिष्ठित विद्वान हैं जो दर्शन विभाग में अपनी गहरी समझ और अनुसंधान के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि यह संकेत है कि विश्वविद्यालय अब जैन दर्शन और श्रमण परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए गंभीर है।

इस नियुक्ति का आदेश कुलसचिव नरेंद्र कुमार वर्मा द्वारा कुलपति प्रो. रामसेवक दुबे के निर्देशानुसार जारी हुआ है, जो विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है कि वह भारतीय ज्ञान परंपरा के उपेक्षित क्षेत्रों को भी नया मंच देना चाहता है।

श्रमण परंपरा की भूमिका:

श्रमण परंपरा भारतीय बौद्धिक संस्कृति की सबसे पुरानी धाराओं में से एक रही है। यह परंपरा वैदिक परंपरा से भिन्न होकर आत्मनिरीक्षण, तप, संयम और अहिंसा को केंद्र में रखती है। जैन दर्शन इस परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है, जो anekāntavāda, syādvāda और ahimsā जैसे सिद्धांतों के माध्यम से केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक चिंतन पर भी प्रभाव डालता रहा है।

प्राकृतिक भाषा और ग्रंथों का संरक्षण:

श्रमण विद्या संकाय न केवल दर्शन की शिक्षा देता है, बल्कि इससे जुड़ी प्राकृतिक भाषाओं (प्राकृत, पालि आदि) का भी अध्ययन और संरक्षण करता है। यह विशेष कार्य इसलिए आवश्यक है क्योंकि श्रमण परंपरा के मूल ग्रंथ अधिकांशतः प्राकृत में ही हैं – जैसे कि जैन आगम, सूत्रकृतांग, उत्तराध्ययन सूत्र आदि। इनका अनुवाद, व्याख्या और पुनर्प्रकाशन समय की मांग है।

बृहद्द्रव्यसंग्रह’ और जैन दर्शन की गहराई:

अपने वक्तव्य में शास्त्री कोसलेंद्रदास ने बृहद्द्रव्यसंग्रह जैसे ग्रंथों से लेकर आचार्य कुंदकुंद के प्रवचनसार तक के गहन अध्ययन की बात कही है। यह एक बेहद आवश्यक दृष्टिकोण है क्योंकि आज जैन दर्शन को केवल धार्मिक या सांप्रदायिक दृष्टि से देखा जाता है, जबकि यह दर्शन सार्वभौमिक सत्य, बहुलता और आत्मसंयम की नींव पर खड़ा है।

श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं के संतुलन की आवश्यकता:

भारत में जैन धर्म की दो प्रमुख परंपराएं – श्वेतांबर और दिगंबर – हैं। दोनों में दर्शन की दृष्टि से सूक्ष्म अंतर होते हुए भी, दोनों की बौद्धिक धारा समृद्ध है। शास्त्री कोसलेंद्रदास ने दोनों परंपराओं के शिक्षण, शोध, ग्रंथ-प्रकाशन को प्राथमिकता देने की बात कर यह स्पष्ट कर दिया है कि संकाय अब किसी एक संप्रदाय तक सीमित न रहकर समग्र जैन चिंतन का मंच बनेगा।

संभावनाएँ और अपेक्षाएँ:

इस नियुक्ति के बाद कुछ प्रमुख अपेक्षाएँ उभरती हैं:

1. नए पाठ्यक्रम – जो आधुनिक भाषा और पद्धतियों के साथ प्राचीन दर्शन को जोड़ें।

2. ग्रंथों का डिजिटलाइजेशन – जिससे दुर्लभ जैन साहित्य वैश्विक शोधार्थियों तक पहुँचे।

3. अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ और सम्मेलन – जिससे भारतीय श्रमण परंपरा को विश्व समुदाय के साथ जोड़ा जा सके।

4. विद्यार्थियों को शोधवृत्ति और अनुसंधान के अवसर – ताकि नई पीढ़ी को पारंपरिक ज्ञान में करियर और आत्मसंतोष दोनों मिले
शास्त्री कोसलेंद्रदास की नियुक्ति केवल एक शैक्षिक परिवर्तन नहीं, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण की नींव है। जैन दर्शन और श्रमण विद्या की जीवंतता को आधुनिक शिक्षा में प्रतिष्ठित करने का यह प्रयास स्वागतयोग्य है। यह नियुक्ति हमें उस बिंदु तक ले जा सकती है जहाँ भारत का सांस्कृतिक वैभव केवल अतीत की स्मृति न होकर, वर्तमान का बौद्धिक पथ बने।

हेमराज तिवारी
संस्कृति और दर्शन विभाग
“लोकटुडे”, जयपुर

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