Home latest गांवों में किसकी होगी सरकार? BJP-कांग्रेस की बढ़ी टेंशन!

गांवों में किसकी होगी सरकार? BJP-कांग्रेस की बढ़ी टेंशन!

0

लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

पंचायत की पॉलिटिकल बिसात: किसके वोट में किसकी सेंध?

निकाय चुनाव के बाद गांवों पर नजर | कांग्रेस के सामने BJP के साथ AAP-RLP की चुनौती | BJP ने 90 प्रचार रथों के साथ पंचायत चुनाव अभियान का आगाज किया

नीरज मेहरा वरिष्ठ संवाददाता

जयपुर। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव का शोर थमते ही अब सियासत का अगला रण गांवों की चौपाल तक पहुंच गया है। शहरों की सरकार के बाद अब गांवों की सरकार पर कब्जे की लड़ाई शुरू होने जा रही है। पंचायत चुनाव से पहले ही भाजपा और कांग्रेस ने अपनी रणनीति तेज कर दी है, जबकि आम आदमी पार्टी की बड़े पैमाने पर चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी ने मुकाबले को नया कोण दे दिया है।

हालिया निकाय चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन ने पार्टी का उत्साह बढ़ाया है। वहीं कांग्रेस के सामने अब चुनौती सिर्फ भाजपा से मुकाबले की नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में अपने परंपरागत राजनीतिक आधार को बनाए रखने की भी है। इसके बीच AAP, RLP, BSP और स्थानीय राजनीतिक ताकतों की मौजूदगी चुनावी गणित को कई सीटों पर प्रभावित कर सकती है।

शहर के बाद अब गांव की बारी

पंचायत चुनाव सिर्फ सरपंच चुनने का चुनाव नहीं है। यह गांव से लेकर पंचायत समिति और जिला परिषद तक राजनीतिक संगठन की ताकत की परीक्षा भी है।

सरपंच का चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं होता, लेकिन पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव में राजनीतिक दलों की सीधी भूमिका सामने आती है। वार्ड स्तर पर प्रत्याशी पार्टी के बैनर और संगठन के सहारे मैदान में उतरते हैं।

यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए पंचायत चुनाव बेहद अहम हैं।

भाजपा के लिए यह निकाय चुनाव के प्रदर्शन को ग्रामीण राजस्थान तक ले जाने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस के लिए यह अपने ग्रामीण आधार को संभालने की परीक्षा है।

कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती

राजस्थान की राजनीति में गांवों को लंबे समय से कांग्रेस के मजबूत सामाजिक आधार के रूप में देखा जाता रहा है। ऐसे में कांग्रेस नहीं चाहेगी कि निकाय चुनाव के बाद पंचायत चुनाव में भी उसके सामने राजनीतिक नुकसान की स्थिति बने।

हालिया शहरी निकाय चुनाव में भाजपा ने 197 निकायों में बोर्ड बनाए, जबकि कांग्रेस 94 निकायों में बोर्ड बनाने में सफल रही।

अब कांग्रेस की कोशिश ग्रामीण इलाकों में संगठन को सक्रिय करने, स्थानीय चेहरों को मजबूत करने और पंचायत स्तर पर चुनावी नेटवर्क को मजबूत करने की है।

लेकिन पार्टी के सामने एक और चुनौती है—तीसरे दलों की मौजूदगी।

AAP, RLP और BSP ने बढ़ाई चिंता

अगर आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, बहुजन समाज पार्टी या अन्य दल बड़ी संख्या में प्रत्याशी मैदान में उतारते हैं, तो कई सीटों पर मुकाबला बहुकोणीय हो सकता है।

हालांकि इसका असर हर सीट पर एक जैसा होगा, यह कहना जल्दबाजी होगी। स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय मुद्दे और प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।

लेकिन करीबी मुकाबलों में कुछ हजार या कुछ सैकड़ों वोट भी तस्वीर बदल सकते हैं।

यही वजह है कि कांग्रेस की रणनीति में तीसरे दलों की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण हो गई हैं।

बारां ने दिया AAP को बड़ा सियासी संकेत

आम आदमी पार्टी के लिए हालिया निकाय चुनाव का बारां नगर परिषद परिणाम खास तौर पर महत्वपूर्ण रहा।

60 वार्ड वाली बारां नगर परिषद में AAP ने 31 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया। कांग्रेस को 18 और भाजपा को 9 सीटें मिलीं।

बारां का परिणाम पूरे राजस्थान के लिए सामान्य पैटर्न है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस नतीजे ने यह जरूर दिखाया कि कुछ इलाकों में तीसरा दल स्थानीय समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

अब AAP पंचायत चुनाव के जरिए ग्रामीण इलाकों में अपना संगठन और राजनीतिक नेटवर्क बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

यही वह मोर्चा है जहां कांग्रेस को सबसे ज्यादा सतर्क रहना होगा।

नरेश मीणा की एंट्री से भी बढ़ी हलचल

पंचायत चुनाव से पहले नरेश मीणा का चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान भी स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय है।

जेल से बाहर आने के बाद उनके पंचायत चुनाव लड़ने की घोषणा ने कई इलाकों में नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा शुरू कर दी है।

पंचायत की राजनीति में बड़े नेताओं से ज्यादा कई बार स्थानीय चेहरा, व्यक्तिगत संपर्क और गांव का नेटवर्क चुनाव का रुख प्रभावित करते हैं।

इसलिए नरेश मीणा जैसे स्थानीय प्रभाव रखने वाले नेताओं की सक्रियता का असर किन क्षेत्रों में दिखाई देता है, यह भी चुनावी तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

BJP के सामने निकाय की जीत दोहराने की चुनौती

भाजपा के लिए पंचायत चुनाव इसलिए भी अहम हैं क्योंकि पार्टी सत्ता में है और हालिया निकाय चुनाव में उसे बढ़त मिली है।

लेकिन पंचायत का मैदान शहरों से अलग है।

यहां सरकार की योजनाओं के साथ-साथ संगठन की गांव तक पहुंच, बूथ प्रबंधन, प्रत्याशी की स्थानीय पकड़ और जातीय-सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होंगे।

भाजपा की रणनीति इसलिए दो मोर्चों पर दिखाई दे रही है।

सरकार की उपलब्धियों को गांव तक पहुंचाना और संगठन को पंचायत स्तर तक सक्रिय करना।

पार्टी नहीं चाहेगी कि निकाय चुनाव की सफलता सिर्फ शहरों तक सीमित रहे।

नितिन नबीन ने संभाली चुनावी कमान

भाजपा ने पंचायत चुनाव के अभियान को बड़े स्तर पर शुरू करने का फैसला किया है।

जयपुर के दादिया से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन पंचायत चुनाव अभियान की शुरुआत कर रहे हैं। इस दौरान 90 प्रचार रथों को रवाना किया जा रहा है, जो प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में पार्टी का संदेश लेकर जाएंगे।

यह कदम संकेत देता है कि भाजपा पंचायत चुनाव को संगठन के लिए गंभीर राजनीतिक परीक्षा मान रही है।

अब सवाल यह है कि क्या निकाय चुनाव का सियासी माहौल गांवों में भी भाजपा के पक्ष में उसी तरह काम करेगा?

पंचायत चुनाव सिर्फ सरपंच का चुनाव नहीं

पंचायत चुनावों को सिर्फ सरपंच की कुर्सी तक सीमित करके देखना बड़ी तस्वीर को छोटा करना होगा।

गांव का पंच…

ग्राम पंचायत…

पंचायत समिति…

और जिला परिषद…

यह पूरा ढांचा राजनीतिक दलों के लिए ग्रासरूट संगठन की रीढ़ है।

जिस पार्टी का पंचायत स्तर पर मजबूत नेटवर्क होता है, उसे विधानसभा चुनाव में भी स्थानीय संगठन खड़ा करने में मदद मिलती है।

इसीलिए 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले पंचायत चुनावों का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।

असली लड़ाई सिर्फ BJP बनाम कांग्रेस नहीं?

राजस्थान की राजनीति का मुख्य मुकाबला लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच रहा है।

तीसरे विकल्प के रूप में कई दलों ने अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभाव दिखाया, लेकिन पूरे प्रदेश में स्थायी तीसरी राजनीतिक ताकत बनना आसान नहीं रहा।

अब पंचायत चुनाव इस दावे की फिर परीक्षा लेंगे।

क्या मुकाबला फिर वही रहेगा—

BJP बनाम कांग्रेस?

या फिर AAP, RLP, BSP और स्थानीय राजनीतिक ताकतें कई सीटों पर नया समीकरण बनाएंगी?

यही पंचायत चुनाव का सबसे बड़ा सियासी सवाल है।

तीनों प्रमुख दावेदारों के सामने क्या चुनौती?

भाजपा के सामने चुनौती:
निकाय चुनाव के प्रदर्शन को गांवों तक ले जाना और सत्ता के साथ संगठन की ताकत को चुनावी जीत में बदलना।

कांग्रेस के सामने चुनौती:
ग्रामीण आधार को बनाए रखना, स्थानीय नेताओं को एकजुट रखना और तीसरे दलों की मौजूदगी से बनने वाले बहुकोणीय मुकाबलों का सामना करना।

AAP के सामने चुनौती:
बारां जैसे प्रदर्शन को दूसरे इलाकों तक ले जाना और चुनावी मौजूदगी को स्थायी ग्रामीण संगठन में बदलना।

RLP-BSP और स्थानीय ताकतों के सामने चुनौती:
क्षेत्रीय प्रभाव को वास्तविक चुनावी सीटों में बदलना।

गांव की चौपाल पर तय होगा सियासी भविष्य

अब राजस्थान की चुनावी राजनीति शहरों से निकलकर गांवों की चौपाल तक पहुंच रही है।

यहां बड़े नेताओं की रैलियों से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा—

कौन सा प्रत्याशी गांव में कितना मजबूत है?

किसके पास बूथ स्तर का नेटवर्क है?

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version