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शहरी सरकार पर कब्जे की जंग?बीजेपी- कांग्रेस बेताब

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

 निकाय चुनाव के नतीजों से पहले क्यों बढ़ी बीजेपी-कांग्रेस की धड़कनें?

पहले 209 निकायों में बोर्ड बनाने का बीजेपी का आकलन, अब बीकानेर-अजमेर-भरतपुर समेत कई जगहों पर फंसा पेच | पार्षदों की बाड़ेबंदी शुरू, होटल-रिसॉर्ट पर नजर | कांग्रेस को वापसी के संकेतों की तलाश, बीजेपी के सामने सत्ता की साख बचाने की चुनौती

रितु मेहरा संवाददाता

– जयपुर। राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के दोनों चरणों का मतदान पूरा होते ही अब सियासी दलों का पूरा फोकस नतीजों और बोर्ड गठन के गणित पर आ गया है। ईवीएम में प्रत्याशियों की किस्मत बंद है, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस के दफ्तरों में गुणा-भाग का दौर तेज हो गया है। चुनाव से पहले बीजेपी ने प्रदेश की 309 नगरीय निकायों में से करीब 209 में बोर्ड बनाने का आकलन किया था, लेकिन मतदान के बाद मिले फीडबैक ने पार्टी को कई निकायों में दोबारा रणनीति बनाने पर मजबूर किया है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक बीकानेर, अजमेर और भरतपुर में मुकाबला उम्मीद से ज्यादा कड़ा हो सकता है। पाली को लेकर भी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं मानी जा रही। वहीं राजधानी जयपुर में भी शुरुआती अनुमान के मुकाबले बीजेपी की सीटें कुछ कम रहने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि पार्टी अभी भी जयपुर में बोर्ड बनाने को लेकर आश्वस्त बताई जा रही है।

दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी निकायवार फीडबैक जुटाना शुरू कर दिया है। पार्टी फिलहाल बोर्डों की संख्या को लेकर कोई बड़ा दावा नहीं कर रही, लेकिन उसका जोर इस बात पर है कि शहरी क्षेत्रों में उसका वोट शेयर कितना बढ़ा है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव स्थानीय निकाय की सत्ता से कहीं आगे 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी का अहम संकेतक बन गया है।

मतदान खत्म, लेकिन सियासी खेल शुरू

राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में दोनों चरणों का मतदान पूरा होने के बाद अब राजनीतिक दल बूथ स्तर से लेकर निकायवार आंकड़ों तक का विश्लेषण कर रहे हैं। किस वार्ड में कितना मतदान हुआ, किस इलाके में किस प्रत्याशी को बढ़त मिल सकती है, कहां बागियों ने समीकरण बिगाड़े और कहां निर्दलीय प्रत्याशी मजबूत रहे—इन सभी सवालों पर पार्टियों की नजर है।

बीजेपी ने चुनाव से पहले करीब 209 निकायों में बोर्ड बनाने का अनुमान लगाया था, जबकि करीब 70 निकायों को डांवाडोल श्रेणी में रखा गया था। अब मतदान के बाद सामने आए फीडबैक के आधार पर पार्टी कई जगहों पर अपने शुरुआती आकलन की समीक्षा कर रही है।

इसी बीच प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ जयपुर पहुंचे और प्रदेश भाजपा कार्यालय में चुनावी फीडबैक का दौर शुरू हुआ। संगठन के नेताओं और चुनावी जिम्मेदारी संभालने वाले पदाधिकारियों से देर रात तक रिपोर्ट ली गई।

यानी…

मतदान खत्म हो चुका है, लेकिन बीजेपी-कांग्रेस के लिए चुनाव अभी खत्म नहीं हुआ। अब असली चुनाव शुरू हुआ है—नंबरों का।

बीकानेर, अजमेर और भरतपुर में क्यों बढ़ी चिंता?

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता उन नगर निगमों को लेकर बताई जा रही है, जहां पार्टी पहले अपेक्षाकृत आसान स्थिति मानकर चल रही थी।

बीकानेर, अजमेर और भरतपुर में मुकाबला कांटे का रहने का फीडबैक सामने आया है। भरतपुर को लेकर पार्टी ने अपने स्तर पर रणनीति तेज कर दी है। वरिष्ठ नेताओं और संगठन के भरोसेमंद पदाधिकारियों को स्थानीय चुनावी समीकरणों पर नजर रखने को कहा गया है।

बीकानेर और अजमेर में भी पार्टी की नजर हर वार्ड के गणित पर है।

क्योंकि नगर निगम में बोर्ड बनाने के लिए सिर्फ सबसे ज्यादा सीटें जीतना ही पर्याप्त नहीं होता। बहुमत के आंकड़े तक पहुंचना जरूरी है। और अगर बहुमत से कुछ सीटें कम रह गईं, तो फिर शुरू होगा निर्दलीय पार्षदों का खेल।

निर्दलीय बनेंगे किंगमेकर?

निकाय चुनाव के नतीजों में अगर किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अचानक बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।

कौन किसके साथ जाएगा?

किस पार्टी के कितने बागी जीतकर आएंगे?

कितने निर्दलीय पार्षद सत्ता के करीब जाएंगे?

और बोर्ड बनाने के लिए कौन सा दल जरूरी संख्या जुटा पाएगा?

यही सवाल बीजेपी और कांग्रेस दोनों को परेशान कर रहे हैं।

इसी वजह से चुनाव परिणाम से पहले ही संभावित विजयी पार्षदों को लेकर बाड़ेबंदी की चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में कहीं होटल तो कहीं रिसॉर्ट बुक किए जाने की खबरें हैं। मकसद साफ है—नतीजे आने के बाद बहुमत का गणित किसी दूसरे खेमे के पक्ष में न बिगड़े।

यानी…

ईवीएम में वोट बंद हैं, लेकिन सत्ता का गणित अभी खुला हुआ है।

जयपुर में भी बदल सकता है गणित

राजधानी जयपुर पर बीजेपी की खास नजर है। जयपुर को बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन मतदान के बाद पार्टी के शुरुआती अनुमान में कुछ बदलाव की चर्चा है।

पार्टी को शुरुआती आकलन के मुकाबले सीटों की संख्या कुछ कम रहने की आशंका है। हालांकि बीजेपी अब भी बोर्ड बनाने को लेकर आश्वस्त बताई जा रही है।

जयपुर में बीजेपी के लिए हर वार्ड का परिणाम इसलिए भी अहम होगा, क्योंकि राजधानी के निकाय चुनाव का राजनीतिक संदेश पूरे प्रदेश में जाता है।

अगर बीजेपी जयपुर में मजबूत बोर्ड बनाने में कामयाब रहती है तो इसे सरकार के पक्ष में शहरी मतदाता के भरोसे के तौर पर पेश किया जाएगा। लेकिन अगर सीटों में बड़ा नुकसान हुआ, तो कांग्रेस इसे सरकार के खिलाफ शहरी नाराजगी के संकेत के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है।

जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अलवर से राहत की उम्मीद

दूसरी ओर जोधपुर, कोटा, उदयपुर और अलवर में बीजेपी की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बताई जा रही है।

अगर इन निकायों में पार्टी अपने अनुमान के मुताबिक प्रदर्शन करने में सफल रहती है तो कमजोर माने जा रहे कुछ निगमों की भरपाई की जा सकती है।

लेकिन निकाय चुनाव का गणित विधानसभा चुनाव से अलग होता है।

यहां पार्टी के साथ-साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय मुद्दे, वार्ड स्तर के समीकरण, बागी उम्मीदवार और निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं।

कांग्रेस भी जुटी गुणा-भाग में

बीजेपी की तरह कांग्रेस ने भी अब निकायवार फीडबैक जुटाना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस फिलहाल यह दावा करने से बच रही है कि उसके कितने बोर्ड बनने जा रहे हैं। लेकिन पार्टी के शुरुआती आकलन में कई जगह अपनी स्थिति बीजेपी के मुकाबले बेहतर बताई जा रही है।

कांग्रेस के लिए इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल बोर्डों की संख्या नहीं, बल्कि वोट शेयर है।

पार्टी यह जानना चाहती है कि शहरी मतदाता के बीच कांग्रेस का आधार कितना मजबूत हुआ है।

कितने वोट कांग्रेस को मिले?

कहां बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगी?

कहां कांग्रेस के पुराने वोट वापस आए?

और सबसे अहम…

क्या शहरी इलाकों में बीजेपी के खिलाफ कोई नया राजनीतिक ट्रेंड बन रहा है?

2028 से पहले निकाय चुनाव क्यों अहम?

कांग्रेस के लिए निकाय चुनाव को 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक तरह का सेमीफाइनल माना जा रहा है।

अगर कांग्रेस शहरी क्षेत्रों में अपना वोट शेयर बढ़ाने में कामयाब रहती है तो पार्टी इसे सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी के संकेत के तौर पर पेश कर सकती है।

वहीं बीजेपी के लिए बड़ी संख्या में निकायों में बोर्ड बनना मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए राजनीतिक ताकत का संदेश होगा।

संदेश यह होगा कि राज्य सरकार के कामकाज को शहरी जनता का समर्थन हासिल है।

यानी…

निकाय चुनाव का परिणाम स्थानीय सरकार से निकलकर सीधे प्रदेश की सियासत में पढ़ा जाएगा।

UGC मुद्दा और सवर्ण समाज की नाराजगी—कितना पड़ा असर?

चुनावी विश्लेषण में कुछ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को भी जोड़कर देखा जा रहा है।

UGC से जुड़े मुद्दों को लेकर पैदा हुई राजनीतिक बहस और कुछ इलाकों में सवर्ण समाज की कथित नाराजगी का मतदान पर कितना असर पड़ा, यह भी राजनीतिक दलों के विश्लेषण का हिस्सा है।

क्या इन मुद्दों की वजह से बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगी?

क्या इसका फायदा कांग्रेस को मिला?

या फिर स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि ने इन बड़े मुद्दों को पीछे छोड़ दिया?

इसका स्पष्ट जवाब 14 सितंबर को आने वाले नतीजों के बाद ही मिल पाएगा।

हालांकि राजनीतिक दल अब वोट के ट्रेंड को सिर्फ वार्डवार नहीं, बल्कि सामाजिक, क्षेत्रीय और वोट शेयर के हिसाब से भी पढ़ रहे हैं।

कई बूथों पर NOTA ने भी बढ़ाई चिंता

चुनावी विश्लेषण में NOTA के आंकड़ों पर भी नजर रखी जा रही है।

कई बूथों पर NOTA को मिले वोटों को राजनीतिक दल अलग-अलग तरीके से पढ़ रहे हैं। अगर किसी वार्ड में जीत-हार का अंतर बेहद कम रहा और NOTA का आंकड़ा उससे बड़ा या उसके आसपास रहा, तो उम्मीदवारों और पार्टियों के लिए यह भी आत्ममंथन का विषय बन सकता है।

हालांकि NOTA का वास्तविक राजनीतिक अर्थ नतीजों के बाद वार्डवार आंकड़ों के विश्लेषण से ही स्पष्ट होगा।

बीजेपी के सामने सत्ता की साख बचाने की चुनौती

बीजेपी के सामने इस चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ज्यादा बोर्ड बनाना नहीं है।

चुनौती है—सत्ता की हनक कायम रखना।

राजस्थान में सत्ता में आने के बाद बीजेपी लगातार यह संदेश देती रही है कि जनता का भरोसा उसके साथ है।

अगर पार्टी बड़ी संख्या में नगर निगमों और निकायों में बोर्ड बनाने में कामयाब रहती है तो इसे सरकार के कामकाज और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व के समर्थन के तौर पर पेश किया जाएगा।

लेकिन अगर कई बड़े नगर निगम बीजेपी के हाथ से निकल गए तो कांग्रेस के हाथ में सरकार पर हमला करने का बड़ा राजनीतिक हथियार आ जाएगा।

विपक्ष का संदेश होगा—

राज्य की सत्ता बीजेपी के पास है, लेकिन शहरों की सरकार जनता ने उसके हाथ से छीन ली।

कांग्रेस के सामने वापसी का मौका

कांग्रेस के लिए तस्वीर बिल्कुल उलट है।

अगर पार्टी बड़े शहरों में बीजेपी को रोकने में कामयाब होती है तो वह इसे शहरी मतदाता के बदलते मूड के रूप में पेश कर सकती है।

कांग्रेस के लिए एक-दो बोर्ड से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा—

क्या बीजेपी के खिलाफ वोटों का कोई व्यापक ट्रेंड दिखाई दे रहा है?

क्या कांग्रेस का वोट शेयर बढ़ा है?

क्या शहरी मतदाता सरकार से नाराज है?

और क्या इस नाराजगी को 2028 के विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक मुद्दे में बदला जा सकता है?

यही कांग्रेस की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती और संभावना दोनों हैं।

होटल-रिसॉर्ट की बाड़ेबंदी क्यों?

नतीजों से पहले होटल और रिसॉर्ट की सियासत भी इसी डर को दिखाती है।

दोनों प्रमुख दलों को आशंका है कि अगर कई निकायों में बहुमत का आंकड़ा स्पष्ट नहीं रहा तो निर्दलीय पार्षद किंगमेकर की भूमिका में आ सकते हैं।

ऐसे में जीतने वाले पार्षदों को अपने खेमे में सुरक्षित रखना पार्टियों के लिए अहम होगा।

यानी चुनाव परिणाम आने के बाद एक और चुनाव शुरू होगा…

बोर्ड बनाने का चुनाव।

और इस चुनाव में हर एक पार्षद की कीमत बढ़ सकती है।

अब 14 सितंबर का इंतजार

फिलहाल ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम में हैं…

पार्टियां अपने-अपने आंकड़ों में उलझी हैं…

नेता फीडबैक ले रहे हैं…

संभावित विजेता पार्षदों पर नजर रखी जा रही है…

और होटल-रिसॉर्ट की बाड़ेबंदी के जरिए सत्ता का गणित सुरक्षित करने की कवायद भी शुरू हो चुकी है।

14 सितंबर को नतीजे आएंगे और इसके साथ ही साफ होगा कि राजस्थान के शहरों की सरकार पर किसका कब्जा होता है।

लेकिन इन नतीजों का असर सिर्फ नगर निगम और नगर पालिका तक सीमित नहीं रहने वाला।

एक तरफ बीजेपी के सामने सरकार की साख और सत्ता की हनक कायम रखने की चुनौती है…

तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने शहरी इलाकों में वापसी और 2028 की लड़ाई के लिए जमीन तैयार करने का मौका।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि…

किस पार्टी का मेयर बनेगा?

किसके चेयरमैन बनेंगे?

किसके बोर्ड बनेंगे?

सबसे बड़ा सवाल है—

क्या जनता ने बीजेपी की सत्ता पर भरोसे की मुहर लगाई है… या शहरी निकाय चुनाव में बदलाव का संदेश दिया है?

फैसला जनता कर चुकी है… अब 14 सितंबर को सिर्फ नतीजों का इंतजार है।

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