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राजेंद्र सिंह गुढ़ा कैसे बने उदयपुरवाटी के ‘किंग’ ?

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

राजस्थान की राजनीति में कुछ नेता पद से बड़े होते हैं और कुछ अपने प्रभाव से। राजेंद्र सिंह गुढ़ा उन्हीं नेताओं में शामिल हैं, जिनके पास आज भले कोई सरकारी पद नहीं है, लेकिन उदयपुरवाटी की राजनीति में उनकी चर्चा आज भी सत्ता के गलियारों तक सुनाई देती है।

एक ऐसा नेता, जिसे राजनीति विरासत में नहीं मिली… जिसके परिवार का कभी सत्ता के केंद्रों से सीधा रिश्ता नहीं रहा… जिसका जन्म श्रीगंगानगर जिले के पीलीबंगा में हुआ, लेकिन जिसने अपनी राजनीतिक कर्मभूमि झुंझुनूं जिले की उदयपुरवाटी विधानसभा को बनाया। एक ऐसा नेता जिसने बसपा के टिकट पर चुनाव जीता, कांग्रेस सरकार में मंत्री बना, फिर उसी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी और सत्ता के सबसे ताकतवर नेताओं को खुली चुनौती दे डाली।

जी हां, हम बात कर रहे हैं पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा की।

आज इनसाइड स्टोरी में जानेंगे कि आखिर कैसे एक साधारण राजनीतिक कार्यकर्ता उदयपुरवाटी का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन गया? कैसे गुढ़ा ने बिना किसी राजनीतिक विरासत के ऐसा जनाधार तैयार किया कि हारने के बाद भी उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर नहीं हुई? और क्यों समर्थक उन्हें आज भी उदयपुरवाटी का “किंग” मानते हैं?

भाई की राजनीति से शुरू हुआ सफर

राजेंद्र सिंह गुढ़ा पहली बार तब चर्चा में आए जब उनके छोटे भाई रणवीर सिंह गुढ़ा राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष बने। पर्दे के पीछे चुनावी रणनीति बनाने और संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी राजेंद्र सिंह गुढ़ा संभाल रहे थे। यहीं से उन्होंने राजनीति के मैदान को करीब से समझना शुरू किया।

साल 2003 में रणवीर सिंह गुढ़ा ने लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर उदयपुरवाटी से चुनाव लड़ा और विधायक बने। इस जीत के पीछे भी चुनावी प्रबंधन की कमान राजेंद्र सिंह गुढ़ा के हाथों में थी।

2008: जब सबको चौंका दिया

साल 2008 में पहली बार राजेंद्र सिंह गुढ़ा खुद चुनावी मैदान में उतरे। टिकट था बहुजन समाज पार्टी का। उस समय शायद ही किसी राजनीतिक विश्लेषक ने सोचा होगा कि गुढ़ा जीत जाएंगे।

लेकिन परिणाम आया तो पूरा राजनीतिक गणित बदल गया। कांग्रेस और भाजपा के दिग्गज उम्मीदवारों को पीछे छोड़ते हुए गुढ़ा विधायक बन गए। बसपा के परंपरागत वोट, राजपूत समाज का समर्थन और स्थानीय स्तर पर बनाई गई व्यक्तिगत पकड़ ने उन्हें पहली ही लड़ाई में विजेता बना दिया।

बसपा से विधायक, कांग्रेस में मंत्री

राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी तो राजनीति ने करवट ली। गुढ़ा ने पांच अन्य बसपा विधायकों के साथ कांग्रेस का समर्थन कर दिया। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उन्हें पर्यटन राज्य मंत्री बना दिया।

यहीं से गुढ़ा सिर्फ विधायक नहीं रहे, बल्कि सत्ता के केंद्र तक पहुंच गए।

हार गए लेकिन मैदान नहीं छोड़ा

2013 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा उम्मीदवार शुभकरण चौधरी से हार गए।

आमतौर पर हार के बाद नेताओं की राजनीतिक जमीन खिसक जाती है, लेकिन गुढ़ा का मामला अलग था। वे लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे। गरीबों, किसानों और स्थानीय मुद्दों को लेकर संघर्ष करते रहे। यही वजह रही कि हार के बावजूद उनका जनाधार कायम रहा।

2018: फिर वापसी, फिर मंत्री

2018 में कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो गुढ़ा फिर बसपा में लौट गए। उन्होंने चुनाव लड़ा और पहले से भी ज्यादा वोटों के साथ जीत दर्ज कर दी।

इसके बाद इतिहास दोहराया गया। बसपा से जीतने के बाद वे फिर कांग्रेस में शामिल हुए और गहलोत सरकार में सैनिक कल्याण, होमगार्ड एवं नागरिक सुरक्षा, पंचायती राज और ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री बने।

एक बयान और खत्म हो गई मंत्री की कुर्सी

22 जुलाई 2023 को विधानसभा में राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने ऐसा बयान दिया जिसने राजस्थान की राजनीति में भूचाल ला दिया।

उन्होंने कहा कि मणिपुर की घटनाओं पर बोलने से पहले राजस्थान में महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति पर भी नजर डालनी चाहिए। यह बयान सीधे अपनी ही सरकार पर हमला माना गया।

कुछ ही घंटों में गुढ़ा को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया।

लेकिन यहीं से शुरू हुई गुढ़ा की सबसे बड़ी राजनीतिक बगावत।

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लाल डायरी और गहलोत से सीधी टक्कर

मंत्री पद जाने के बाद गुढ़ा ने तथाकथित “लाल डायरी” को लेकर अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

राजस्थान की राजनीति में कई महीनों तक सिर्फ एक नाम चर्चा में रहा—राजेंद्र सिंह गुढ़ा।

इसके बाद कांग्रेस से भी उनका रास्ता अलग हो गया।

क्यों कहा जाता है उदयपुरवाटी का किंग?

गुढ़ा की सबसे बड़ी ताकत कोई पार्टी नहीं रही। उनकी ताकत रहा उनका व्यक्तिगत जनाधार।

चाहे गरीबों के मुद्दे हों, किसानों की लड़ाई हो, किसी पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने का मामला हो या फिर राजपूत समाज के सम्मान का प्रश्न—गुढ़ा अक्सर सबसे आगे दिखाई देते हैं।

यही कारण है कि चुनाव हारने के बावजूद उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता बनी रहती है। समर्थकों का मानना है कि उदयपुरवाटी में आज भी ऐसा कोई बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं है, जिसमें राजेंद्र सिंह गुढ़ा की चर्चा न हो।

आगे क्या?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगला विधानसभा चुनाव राजेंद्र सिंह गुढ़ा किस पार्टी से लड़ेंगे?

क्या वे फिर बसपा का दामन थामेंगे? क्या शिवसेना में बने रहेंगे? क्या किसी नए राजनीतिक मंच से मैदान में उतरेंगे? या फिर निर्दलीय चुनाव लड़कर नया समीकरण बनाएंगे?

इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है।

लेकिन इतना तय है कि राजस्थान की राजनीति में राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने जो मुकाम हासिल किया है, वह किसी राजनीतिक विरासत या किसी नेता की मेहरबानी से नहीं, बल्कि अपने संघर्ष, संगठन और जनाधार के दम पर हासिल किया है। यही वजह है कि समर्थक उन्हें आज भी उदयपुरवाटी का “किंग” कहते हैं।

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