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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
— ईश्वर दत्त माथुर की कलम से
(उनके प्रिय मित्रों में से एक की श्रद्धांजलि)
“मैंने लाख छुपाए दर्द-ओ-ग़म, ग़ालिब…
बयां कर दी सूरत ने सारी।”
भावनाओं को शब्दों में उकेरना हमेशा कठिन होता है—और स्नेह की डोर से बंधे संबंधों को बयां करना उससे भी कठिन। प्रमोद भसीन से मेरा रिश्ता आधी सदी—50 वर्षों से भी अधिक—का रहा। विश्वविद्यालय के लड़कपन से लेकर थिएटर की संस्था ‘त्रिमूर्ति’ के सिद्ध आयोजक तक का उनका साथ, हमारी शादियों में उनकी सक्रियता, राजनीति में उनकी परख, कला-संस्कृति में उनकी पैठ—हर जगह भसीन साहब एक मजबूत उपस्थिति के रूप में थे।
साइकिल से शुरू हुआ उनका सफर चार पहियों तक तो पहुँच गया, पर रफ्तार कभी धीमी नहीं हुई।
विद्यार्थी जीवन, रंगमंच, गायन, लोक-उत्सव… वे हर पड़ाव पर समान ऊर्जा के साथ खड़े दिखे।
भसीन साहब किसी व्यक्ति को परखने की अपनी अनोखी कसौटी रखते थे।
“जिससे है, उसके सौ खून माफ… और जिससे नहीं, वह देहरी पर भी नहीं।”
उनकी यह शैली कई बार चौंकाती थी, पर हमेशा निष्कपट होती थी।
राजनीति में मैंने उन्हें कई बार चाणक्य की भूमिका में देखा। बड़े-बड़े नेता और प्रशासनिक अधिकारी उनसे सलाह लेते। किससे क्या बात हुई—इसकी थाह लगाना मुश्किल था।
कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनका अधिकारिक हस्तक्षेप उन्हें एक ‘परिवार के बड़े’ जैसा रूप दे देता था।
जो कहते, वह पत्थर की लकीर मान लिया जाता।
कई आयोजनों की रूपरेखा उन्होंने बनाई, फैसले खुद लिए। मतभेद होते थे, तर्क-वितर्क भी… और तब वे मुस्कुराकर कहते—
“यार, तू बाँकेलाल है!”
उनकी दूर-दृष्टि उन्हें हमेशा सहज और संतुलित बनाती थी।
मैंने जब घर बनाया, उन्होंने हौसला भी दिया और सहयोग भी। शादी के बाद गृहस्थी शुरू की तो वे लगातार साथ-सहयोग की थपथपाहट देते रहे।
दुर्लभ जी अस्पताल के अवेदना आश्रम में कैंसर पीड़ितों के लिए प्रत्येक महीने के रविवार को गीत-संगीत का आयोजन करते—और उसमें हम सब मिलकर भाग लेते। कथा–आस्था जब उसमें नृत्य करती, तो उनकी प्रसन्नता देखते ही बनती। कथा की सगाई और शादी की व्यवस्थाएँ तो उन्होंने पूरे मन से कराईं। जय क्लब में मेन्यू से लेकर तिलक तक, सब पर उनका व्यक्तिगत स्नेह था। सगाई का पहला तिलक संचित को उन्हें ही लगाना था—और उन्होंने यही किया।
जय क्लब के डिनर—हम सब दोस्तों का परिवार—उनके लिए जीवन का उत्सव था।
वे कहते,
“यह मेरा परिवार है… और ये खुशी के पल मेरी उम्र बढ़ाते हैं।”
वे चारु के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा चिंतित रहते और लगातार हिदायतें देते।
जीवन के उतार-चढ़ावों में एक भी पल वे हमसे ओझल नहीं हुए।
पिछले दिनों जब राजू बीमार हुआ, उनकी चिंता शब्दों में बयान नहीं की जा सकती।
पिछले कुछ वर्षों में वे नकारात्मकता से कोसों दूर हो गए थे। कहते—
“यार, क्षमा करो और आगे बढ़ो… पिछली बातों से कब तक आज खराब करोगे?”
काश, हम भी उनके इस उपदेश को जीवन में उतार पाते।
पिछले महीने ‘मुस्कान’ की ओर से वर्ल्ड रिमेंबरेंस डे मनाया। उन्होंने कहा,
“ईश्वर… यह दिन मेरे दिल के करीब है, इसे करते रहना। मुस्कान दूर्वा की याद बनी रहनी चाहिए।”
कभी-कभी सोचता हूँ—सबको खुश रखना कितना कठिन है। पर भसीन साहब यह सहजता से कर लेते थे।
वे गलत बातों में भी समन्वय बैठाकर अच्छे परिणाम निकाल लेते, लेकिन रिश्तों की पवित्रता कभी आंच नहीं आने देते।
कला और संस्कृति में अपनी पैठ, और उससे भी अधिक—एक ऐसा परिवार गढ़ना, जिसमें न स्वार्थ, न लाभ की इच्छा… बस प्रेम, सहयोग और मानवीयता—यह उनके जीवन का सार था।
और जाते-जाते अपनी देह तक दान कर जाना… यही उनकी महानता की पराकाष्ठा है।
नमन है ऐसी विभूति को।
प्रमोद भसीन—एक युग, एक व्यक्तित्व, एक मार्गदर्शक।
शत-शत नमन्…
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