लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नीरज मेहरा- विशेष संवाददाता
राजस्थान की राजनीति में कई ऐसे नेता हुए जिन्होंने चुनाव जीते, मंत्री बने और सत्ता का हिस्सा रहे। लेकिन कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिनकी पहचान पद से नहीं बल्कि उनके संघर्षों से बनी। झुंझुनूं जिले के नवलगढ़ से दो बार विधायक रहे नवरंग सिंह जाखड़ ऐसा ही एक नाम हैं। वे सिर्फ विधायक नहीं थे, बल्कि किसान आंदोलन, सामाजिक सुधार और जनहित की राजनीति का चेहरा थे। शराबबंदी आंदोलन हो, दिवराला सती कांड के खिलाफ आवाज उठानी हो या किसानों के अधिकारों की लड़ाई, नवरंग सिंह हर मोर्चे पर सबसे आगे दिखाई दिए।
गांव के स्कूल से शुरू हुआ सफर
7 जून 1942 को झुंझुनूं जिले के धमोरा गांव में गनपत सिंह जाखड़ और घोटी देवी के घर जन्मे नवरंग सिंह का बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता। गांव से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे जयपुर पहुंचे। इतिहास में एमए और बीएड की पढ़ाई की। एलएलबी की पढ़ाई अधूरी रह गई, लेकिन छात्र राजनीति ने उन्हें जननेता बनने की दिशा दे दी। छात्र जीवन में वे नवलगढ़ और जयपुर के छात्र आंदोलनों से जुड़े और जागीरदारी उन्मूलन, सामाजिक न्याय तथा युवाओं के अधिकारों के लिए सक्रिय रहे।
राजनीति में प्रवेश, लेकिन लक्ष्य सत्ता नहीं
नवरंग सिंह जाखड़ ने शिक्षक रहते हुए सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर नवलगढ़ से पहली बार विधायक चुने गए। इसके बाद 1985 में लोकदल के उम्मीदवार के रूप में दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। दोनों चुनावों में उनकी जीत ने यह साबित किया कि उनका आधार किसी जातीय समीकरण से नहीं, बल्कि जनविश्वास से बना था।
विधानसभा में उन्होंने विशेषाधिकार समिति, सरकारी आश्वासन समिति और गृह समिति के अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं। 1979-80 में राजस्थान विधानसभा के मुख्य सचेतक भी रहे। कांग्रेस (संगठन), जनता पार्टी और लोकदल की प्रदेश कार्यसमिति में सक्रिय भूमिका निभाने के बावजूद उनकी प्राथमिकता हमेशा किसान और ग्रामीण समाज रहे।

किसानों की आवाज, सड़क से सदन तक
राजस्थान किसान मंच के अध्यक्ष के रूप में नवरंग सिंह ने किसानों के मुद्दों को लगातार उठाया। सिंचाई, फसल, समर्थन मूल्य और ग्रामीण विकास जैसे विषयों पर उन्होंने अनेक आंदोलन किए। किसानों के हितों के लिए कई बार गिरफ्तार भी हुए, लेकिन अपने रुख से पीछे नहीं हटे।
उनकी राजनीति का सबसे बड़ा आधार यही था कि वे चुनाव के समय ही नहीं, हर संकट में किसानों के बीच मौजूद रहते थे।
शराबबंदी के लिए आमरण अनशन
1979 में नवरंग सिंह जाखड़ ने राजस्थान विधानसभा के सामने आमरण अनशन शुरू किया। उनकी मांग थी कि राज्य में शराबबंदी लागू की जाए और शराब से बर्बाद हो रहे ग्रामीण परिवारों को बचाया जाए। इस आंदोलन ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा और वे शराबबंदी अभियान के प्रमुख नेताओं में गिने जाने लगे।
दिवराला सती कांड के खिलाफ बुलंद आवाज
1987 का दिवराला सती कांड राजस्थान के इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल है। उस समय जब इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से कई लोग बच रहे थे, नवरंग सिंह जाखड़ ने सती प्रथा के खिलाफ स्पष्ट और मुखर आवाज उठाई। उन्होंने इसे सामाजिक कलंक बताते हुए कठोर कानून बनाने की मांग की। सामाजिक सुधार के इस संघर्ष ने उन्हें प्रदेश के प्रगतिशील नेताओं की पंक्ति में खड़ा कर दिया।
दहेज, मृत्युभोज और बाल विवाह के खिलाफ अभियान
नवरंग सिंह का मानना था कि समाज केवल कानून से नहीं, बल्कि जागरूकता से बदलता है। यही कारण था कि उन्होंने दहेज प्रथा, मृत्युभोज और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ लगातार जनजागरण अभियान चलाए। उनके भाषणों और सभाओं में सामाजिक सुधार हमेशा प्रमुख विषय रहता था।
आपदा में सबसे आगे, समाज के लिए जमीन भी दान की
1967-68 की बाढ़ हो या 1979 का अकाल, नवरंग सिंह राहत कार्यों में सक्रिय रहे। उन्होंने नवलगढ़ में किसान छात्रावास की स्थापना के लिए न केवल आंदोलन किया बल्कि अपनी निजी जमीन भी दान कर दी। यह कदम उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
राजनीति से ज्यादा रिश्तों को महत्व
नवरंग सिंह जाखड़ उन नेताओं में थे जो चुनाव हारने या जीतने के बाद भी जनता के बीच बराबर सक्रिय रहे। विधानसभा से बाहर होने के बाद भी वे किसानों, सामाजिक संगठनों और जनआंदोलनों से जुड़े रहे। उनकी सादगी और सहज उपलब्धता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
एक विरासत, जो आज भी जिंदा है
19 सितंबर 2025 को नवरंग सिंह जाखड़ का निधन हो गया। उनके निधन पर शेखावाटी ही नहीं, पूरे राजस्थान के राजनीतिक और सामाजिक जगत ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। लोग उन्हें केवल पूर्व विधायक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे जननेता के रूप में याद करते हैं जिसने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया।
इनसाइड स्टोरी
नवरंग सिंह जाखड़ की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे मुद्दों की राजनीति करते थे, व्यक्तियों की नहीं। वे विधानसभा के भीतर सत्ता से सवाल पूछते थे और बाहर समाज के बीच जाकर आंदोलन करते थे। शराबबंदी से लेकर सती प्रथा के विरोध तक, किसान आंदोलनों से लेकर शिक्षा और छात्रावास निर्माण तक—उन्होंने हर मोर्चे पर अपनी भूमिका निभाई। शायद यही वजह है कि आज भी शेखावाटी में जब जनसंघर्ष की बात होती है तो नवरंग सिंह जाखड़ का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी राजनीति यह संदेश देती है कि जनप्रतिनिधि की असली पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि जनता के बीच छोड़ी गई विरासत से होती है।