लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नीरज मेहरा पत्रकार
किसान आंदोलन से दिल्ली की सत्ता तक…
‘राजस्थान का गांधी’ कहे जाने वाले नाथूराम मिर्धा ने खेत-खलिहान से बनाई राष्ट्रीय राजनीति तक पहचान; बेटे से लेकर पोती तक परिवार ने संभाली सियासी विरासत
नागौर। राजस्थान की राजनीति में किसान नेतृत्व की बात हो और नाथूराम मिर्धा का नाम सामने न आए, ऐसा संभव नहीं। खेत-खलिहान से उठकर प्रदेश की राजनीति और फिर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने वाले मिर्धा ने करीब पांच दशक के सार्वजनिक जीवन में किसान, सहकारिता और ग्रामीण समाज को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा।
उन्हें सिर्फ एक राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि किसान आंदोलन के बड़े चेहरे और ग्रामीण राजस्थान की आवाज के रूप में याद किया जाता है। यही वजह रही कि समर्थकों और किसानों के बीच उन्हें ‘राजस्थान का गांधी’ कहा गया।
लेकिन नाथूराम मिर्धा की कहानी सिर्फ उनके राजनीतिक सफर तक सीमित नहीं है। उनकी असली कहानी उस सियासी विरासत की है, जो उनके बाद भी परिवार की अगली पीढ़ियों के जरिए नागौर की राजनीति में दिखाई देती रही।

कुचेरा से शुरू हुआ सफर, किसान राजनीति तक पहुंचा
नाथूराम मिर्धा का जन्म 20 अक्टूबर 1921 को नागौर जिले के कुचेरा में हुआ। वे किसान नेता बलदेव राम मिर्धा की राजनीतिक और सामाजिक परंपरा से जुड़े परिवार से आते थे।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। जोधपुर के दरबार हाई स्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक करने के बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया और वर्ष 1944 में एलएलबी की डिग्री हासिल की। कुछ समय उन्होंने वकालत भी की, लेकिन जल्द ही उनका जीवन किसानों और सार्वजनिक संघर्षों की ओर मुड़ गया। उन्हें राजनीति की ओर प्रेरित करने का काम किया उनके चचेरे भाई बलदेव मिर्धा ने। जो उस समय पुलिस में बड़े ओहदे पर थे।
आजादी की लड़ाई से किसान आंदोलन तक
स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में नाथूराम मिर्धा किसानों के सवालों को लेकर सक्रिय हुए। वर्ष 1946 में वे मारवाड़ किसान सभा के महासचिव बने।
यहीं से उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनने लगी, जिसकी राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि किसान था।
किसानों को संगठित करने, जागीरदारी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने और भूमि अधिकारों के मुद्दे को मजबूती से सामने रखने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के बाद भी उन्होंने भूमि सुधार और ग्रामीण समाज से जुड़े मुद्दों को अपनी राजनीति का आधार बनाए रखा।
विधानसभा से संसद तक… बढ़ता गया राजनीतिक कद
वर्ष 1952 में नाथूराम मिर्धा ने मेड़ता विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर राजस्थान विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद राजस्थान की राजनीति में उनका कद लगातार बढ़ता गया।
विधानसभा की राजनीति से निकलकर वे राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे और नागौर लोकसभा क्षेत्र से कई बार सांसद निर्वाचित हुए।
संसद में उनकी प्राथमिकताएं भी स्पष्ट थीं—कृषि, सिंचाई, ग्रामीण विकास, सहकारिता और किसानों के अधिकार।
यानी जहां राजस्थान की राजनीति में वे किसान की आवाज थे, वहीं दिल्ली पहुंचकर उन्होंने उसी आवाज को राष्ट्रीय मंच पर उठाया।
दिल्ली में मंत्री, लेकिन मुद्दा किसान ही रहा
नाथूराम मिर्धा को केंद्र सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी मिली। कृषि और ग्रामीण विकास से जुड़े विषयों पर उनकी समझ और अनुभव का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर हुआ।
कृषि क्षेत्र में उनकी भूमिका का एक महत्वपूर्ण अध्याय राष्ट्रीय कृषि मूल्य आयोग से भी जुड़ा रहा, जहां किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने जोर दिया।
उनकी राजनीति का मूल मंत्र साफ था—किसान मजबूत होगा तो गांव मजबूत होगा और गांव मजबूत होगा तो राजस्थान मजबूत होगा।
मिर्धा परिवार: एक नेता की विरासत से कई राजनीतिक चेहरे
नाथूराम मिर्धा के बाद भी परिवार की राजनीतिक सक्रियता खत्म नहीं हुई। बल्कि समय के साथ उनकी अगली पीढ़ी ने इस विरासत को अलग-अलग रूपों में आगे बढ़ाया।
उनके छोटे बेटे भानु प्रकाश मिर्धा भी सक्रिय राजनीति में आए और 1996 में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। यह वह दौर था, जब नाथूराम मिर्धा के निधन के बाद परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अगली पीढ़ी के कंधों पर आई।
इसके बाद परिवार की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति में दिखाई दी।
ज्योति मिर्धा, नाथूराम मिर्धा की पौत्री, नागौर की राजनीति में सक्रिय हुईं और 15वीं लोकसभा में नागौर से सांसद रहीं।
वहीं मनीष मिर्धा भी युवा कांग्रेस की राजनीति से जुड़े और नागौर में परिवार की राजनीतिक पहचान को आगे बढ़ाने वाले चेहरों में शामिल रहे।
यानी नाथूराम मिर्धा के समय जिस किसान राजनीति की नींव मजबूत हुई, उसकी गूंज अगली पीढ़ियों की राजनीति में भी सुनाई देती रही।
30 अगस्त 1996… थम गई किसान नेता की आवाज
लंबे सार्वजनिक जीवन के बाद 30 अगस्त 1996 को नई दिल्ली में 75 वर्ष की आयु में नाथूराम मिर्धा का निधन हो गया।
उनके निधन से राजस्थान, खासकर नागौर की राजनीति में एक बड़ा खालीपन पैदा हुआ। उनके जाने के बाद नागौर की राजनीति में मिर्धा परिवार की भूमिका पर सभी की निगाहें टिक गईं।
निधन के बाद हुए लोकसभा उपचुनाव में उनके पुत्र भानु प्रकाश मिर्धा का निर्वाचित होना इस बात का संकेत था कि नाथूराम मिर्धा की राजनीतिक विरासत कितनी मजबूत थी।
विरासत सिर्फ चुनावी जीत की नहीं
नाथूराम मिर्धा की सबसे बड़ी ताकत उनका चुनावी रिकॉर्ड भर नहीं था।
उनकी पहचान बनी—
किसानों की आवाज के रूप में।
सहकारिता आंदोलन के समर्थक के रूप में।
ग्रामीण विकास के पैरोकार के रूप में।
भूमि सुधार के पक्षधर के रूप में।
और सादगी तथा स्पष्टवादिता वाले जननेता के रूप में।
उन्होंने राजनीति को ग्रामीण समाज से जोड़कर देखा। यही कारण है कि उनके निधन के दशकों बाद भी नागौर और मारवाड़ की किसान राजनीति में उनका नाम संदर्भ के तौर पर लिया जाता है।
2023 में फिर सामने आई विरासत
नाथूराम मिर्धा के निधन के वर्षों बाद भी उनकी स्मृति सार्वजनिक जीवन में बनी रही। 2023 में मेड़ता सिटी में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया।
यह सिर्फ एक प्रतिमा का अनावरण नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक दौर की याद को फिर सामने लाने वाला अवसर था, जब राजस्थान की राजनीति में किसान नेता सत्ता के गलियारों तक अपनी मजबूत आवाज लेकर पहुंचते थे।
असली सवाल—क्या मिर्धा की किसान राजनीति आज भी जिंदा है?
नाथूराम मिर्धा की कहानी को सिर्फ एक नेता की जीवनी मानना शायद उनके राजनीतिक प्रभाव को छोटा करना होगा।
उन्होंने जिस दौर में राजनीति की, उस समय किसान आंदोलन, भूमि सुधार, सहकारिता और ग्रामीण अधिकार बड़े राजनीतिक सवाल थे। उन्होंने इन्हीं मुद्दों को अपनी ताकत बनाया और नागौर से निकलकर दिल्ली तक अपनी पहचान कायम की।
उनके बाद बेटे भानु प्रकाश मिर्धा, पौत्री ज्योति मिर्धा,(भाजपा) और मनीष मिर्धा (कांग्रेस) और परिवार की अगली पीढ़ी के राजनीतिक चेहरे सक्रिय हुए।
लेकिन आज भी सबसे बड़ा सवाल यही है—
मिर्धा परिवार की राजनीतिक विरासत कितनी आगे जाएगी और नाथूराम मिर्धा की सबसे बड़ी पहचान—किसान राजनीति—क्या आने वाली पीढ़ियों की सियासत का भी आधार बनेगी?
क्योंकि नाथूराम मिर्धा ने जो राजनीति छोड़ी, वह सिर्फ कुर्सी की विरासत नहीं थी… वह खेत, किसान और गांव की आवाज की विरासत थी।
और शायद यही वजह है कि नागौर की सियासत में नाथूराम मिर्धा का नाम आज भी सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदर्भ है।