लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
वार्ड 42 बनी हॉट सीट; रिश्तों पर भारी पड़ी राजनीति
पूर्व राज्यमंत्री मेघराज लोहिया बनाम कांग्रेस जिलाध्यक्ष ओमकार वर्मा—वार्ड 42 में महामुकाबला; चार बड़े चेहरों की जीत-हार तय करेगी मेयर की रेस
राजस्थान से वरिष्ठ संवाददाता : नितिन मेहरा
जोधपुर। जोधपुर नगर निगम के आगामी बोर्ड पर कब्जे को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सियासी शह-मात का खेल अब खुलकर सामने आ गया है। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनावी तस्वीर साफ हो चुकी है और इस बार मुकाबला केवल वार्डों में पार्षद चुनने तक सीमित नहीं दिख रहा। असली लड़ाई नगर निगम की सत्ता और आने वाले महापौर की कुर्सी के लिए है।
नामांकन के बाद जोधपुर की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा वार्ड नंबर 42 की हो रही है। इस सीट पर भाजपा और कांग्रेस ने अपने ऐसे दिग्गज उतारे हैं, जिनकी हार-जीत का असर केवल एक वार्ड तक सीमित नहीं रहेगा।
वार्ड 42: पूर्व राज्यमंत्री बनाम कांग्रेस जिलाध्यक्ष
वार्ड 42 को इस चुनाव की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट माना जा रहा है।
भाजपा ने अनारक्षित सीट पर अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यमंत्री मेघराज लोहिया को मैदान में उतारा है। लोहिया का संगठन और स्थानीय राजनीति में लंबा अनुभव है। भाजपा को उम्मीद है कि उनका राजनीतिक नेटवर्क और जमीनी पकड़ पार्टी के लिए यह सीट निकालने में मददगार साबित होगी।
वहीं कांग्रेस ने मुकाबले को सीधा और हाई-वोल्टेज बनाने के लिए अपने शहर जिलाध्यक्ष ओमकार वर्मा को टिकट दिया है।
वर्मा तीन बार पार्षद रह चुके हैं और स्थानीय निकाय की राजनीति का लंबा अनुभव रखते हैं। शहर जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद उनका खुद चुनावी मैदान में उतरना कांग्रेस की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
यानी वार्ड 42 में मुकाबला प्रत्याशियों का ही नहीं, बल्कि दोनों दलों की प्रतिष्ठा का भी है।
चार चेहरे, एक महापौर की कुर्सी
जोधपुर नगर निगम चुनाव का सबसे बड़ा सियासी खेल पर्दे के पीछे चल रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच महापौर पद के लिए संभावित चेहरों की लड़ाई अभी से शुरू हो गई है।
कांग्रेस के खेमे में
कांग्रेस की ओर से निवर्तमान महापौर कुंती देवड़ा, जो वार्ड 99 से चुनाव मैदान में हैं, और शहर जिलाध्यक्ष ओमकार वर्मा, वार्ड 42 से प्रत्याशी हैं।
दोनों की जीत पार्टी के भीतर महापौर पद के समीकरणों को मजबूत कर सकती है।
भाजपा के खेमे में
भाजपा में पूर्व राज्यमंत्री मेघराज लोहिया और पूर्व यूआईटी ट्रस्टी कमलेश पुरोहित, जो वार्ड 25 से मैदान में हैं, को संभावित महापौर चेहरों में गिना जा रहा है।
ऐसे में इन चारों चेहरों की चुनावी किस्मत केवल उनके वार्ड का परिणाम तय नहीं करेगी, बल्कि मेयर की कुर्सी के लिए पार्टी के भीतर बनने वाले समीकरणों पर भी असर डाल सकती है।
रिश्ते हुए पीछे, सियासत आई आगे
जोधपुर नगर निगम चुनाव में इस बार एक और दिलचस्प तस्वीर सामने आई है।
टिकट वितरण के बाद शहर के कई वार्डों में रिश्तेदार ही आमने-सामने आ गए हैं। कहीं चचेरे भाई-बहन चुनावी मैदान में एक-दूसरे को चुनौती दे रहे हैं तो कहीं टिकट नहीं मिलने की नाराजगी ने परिवार के भीतर राजनीतिक खाई पैदा कर दी है।
जिन परिवारों में कभी साथ बैठकर चुनावी रणनीति बनाई जाती थी, उन्हीं परिवारों के सदस्य अब अलग-अलग राजनीतिक झंडों के साथ वोट मांगते नजर आ रहे हैं।
नगर निगम चुनाव ने कई जगह यह सवाल खड़ा कर दिया है—रिश्ता बड़ा या राजनीति?
फिलहाल चुनावी मैदान में जवाब साफ है—राजनीतिक वफादारी रिश्तों पर भारी पड़ रही है।
गहलोत के गढ़ में कांग्रेस की साख का सवाल
जोधपुर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह क्षेत्र रहा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए नगर निगम चुनाव केवल स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक साख से जुड़ा मुकाबला भी है।
कांग्रेस अपने पुराने कामकाज, स्थानीय संगठन और परंपरागत जनाधार के सहारे नगर निगम में दोबारा पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
दूसरी ओर प्रदेश में सत्ता में बैठी भाजपा के सामने जोधपुर नगर निगम पर कब्जा जमाने का मौका है।
भाजपा अपने संगठनात्मक नेटवर्क, मजबूत कैडर और प्रदेश सरकार की सत्ता के प्रभाव के सहारे कांग्रेस के इस मजबूत गढ़ में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रही है।
भाजपा के लिए चुनौती: गहलोत के गढ़ में भगवा
भाजपा के लिए यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जोधपुर लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति का मजबूत केंद्र रहा है।
यदि भाजपा नगर निगम में बहुमत हासिल करती है तो इसे जोधपुर की स्थानीय राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा।
लेकिन भाजपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। टिकट वितरण के बाद बागियों की नाराजगी और स्थानीय समीकरण कई सीटों पर पार्टी का गणित बिगाड़ सकते हैं।
RLP और बागी बन सकते हैं ‘गेम चेंजर’
इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस तक सीमित रहने की संभावना नहीं है।
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) और दोनों प्रमुख दलों से टिकट नहीं मिलने के बाद मैदान में उतरे बागी उम्मीदवार कई वार्डों में मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की स्थिति में हैं।
जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होगा, वहां बागी और तीसरे दल के उम्मीदवार वोटों का मामूली अंतर भी बदल सकते हैं।
यही उम्मीदवार कई वार्डों में हार-जीत का अंतर तय करने वाले ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकते हैं।
वार्ड 42 का नतीजा क्यों होगा खास?
वार्ड 42 पर पूरे जोधपुर की नजर रहने के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं—
पहली— भाजपा ने यहां पूर्व राज्यमंत्री जैसे अनुभवी नेता को मैदान में उतारा है।
दूसरी— कांग्रेस ने अपने शहर जिलाध्यक्ष को सीधे चुनावी मुकाबले में उतारकर इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है।
तीसरी— दोनों ही नेताओं की जीत का असर आगे महापौर पद के समीकरणों पर पड़ सकता है।
इसलिए वार्ड 42 का चुनाव परिणाम महज एक पार्षद का परिणाम नहीं होगा। यह दोनों दलों के लिए सियासी ताकत का टेस्ट भी होगा।
मेयर की कुर्सी पर किसका कब्जा?
जोधपुर नगर निगम चुनाव में असली सवाल अब यही है कि बोर्ड किसका बनेगा और महापौर की कुर्सी किसके हिस्से आएगी।
कांग्रेस के पास अनुभव और स्थानीय राजनीतिक पकड़ का दावा है।
भाजपा के पास सत्ता, संगठन और मजबूत कैडर की ताकत है।
वहीं RLP और बागी उम्मीदवार कई सीटों पर दोनों दलों के समीकरण बिगाड़ने की तैयारी में हैं।
ऐसे में चुनावी मुकाबला कई स्तरों पर दिखाई दे रहा है—पार्टी बनाम पार्टी, नेता बनाम नेता, गढ़ बनाम गढ़ और कहीं-कहीं परिवार बनाम परिवार।
सबसे बड़ा सवाल
क्या गहलोत के गृह शहर में कांग्रेस अपना दबदबा कायम रख पाएगी?
क्या भाजपा पहली बार नगर निगम की सत्ता पर मजबूत कब्जा जमाकर जोधपुर की स्थानीय राजनीति का समीकरण बदल देगी?
या फिर RLP और बागी उम्मीदवार दोनों प्रमुख दलों के खेल को बिगाड़ देंगे?
इन सवालों का पहला जवाब वार्ड 42 के महामुकाबले में तलाशा जाएगा, जहां मेघराज लोहिया और ओमकार वर्मा की टक्कर ने पूरे चुनाव की सियासी गर्मी बढ़ा दी है।
अब नजरें सिर्फ इस बात पर नहीं हैं कि वार्ड 42 कौन जीतेगा—बल्कि इस पर भी हैं कि इस जीत के साथ जोधपुर नगर निगम की मेयर की कुर्सी की दौड़ में किसका कद सबसे बड़ा होकर उभरेगा।
