लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
सोशल मीडिया की ज्योति मल्होत्रा की गिरफ्तारी, भारत-पाकिस्तान साइबर युद्ध, सोशल मीडिया की भूमिका, महिला एजेंटों की स्थिति, और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों की समीक्षा शामिल है:

हेमराज तिवाड़ी वरिष्ठ पत्रकार
जासूसी, सोशल मीडिया और राष्ट्रीय सुरक्षा:
21वीं सदी की दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है; यह अब डेटा, सोशल मीडिया, और पहचान की अदृश्य लड़ाई में तब्दील हो चुका है। हाल ही में सामने आया मामला, जिसमें यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करने का आरोप है, इस नये युद्ध का ताजा उदाहरण है। यह मामला न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक चुनौती है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे डिजिटल युग में नैतिकता, पहचान और राष्ट्रभक्ति को नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है।
ज्योति मल्होत्रा मामला: तथ्य और चिंता
पंजाब की एक यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा, जिन्हें सोशल मीडिया पर ‘जट्ट रंधावा’ के नाम से भी जाना जाता था, को भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया। जांच में सामने आया कि वह ISI एजेंट ‘दानिश’ के संपर्क में थीं, और पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस पर एक डिनर पार्टी में भी गई थीं।
इसके अतिरिक्त, उनकी कश्मीर के पहलगाम यात्रा, जो एक आतंकी हमले से ठीक पहले हुई थी, को संदिग्ध माना गया। मल्होत्रा पर हवाला चैनलों के माध्यम से पैसे लेने और संवेदनशील जानकारी लीक करने का आरोप है।
यह मामला गंभीर इसलिए भी है क्योंकि इसमें एक महिला सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को टूल की तरह इस्तेमाल किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जासूसी की रणनीतियाँ अब केवल गुप्तचर एजेंटों तक सीमित नहीं रहीं।
महिला एजेंट और डिजिटल युद्ध का नया चेहरा
इतिहास में महिला एजेंटों का उल्लेख सदैव रहा है — चाहे वह नोरा बेकर हो या माता हरि। लेकिन आधुनिक भारत में यह प्रवृत्ति एक नए रूप में उभर रही है। महिला एजेंट अब केवल ‘हनी ट्रैप’ तक सीमित नहीं हैं, वे अब सोशल मीडिया प्रभाव, डिजिटल मैसेजिंग और मनोवैज्ञानिक अभियानों का हिस्सा बन चुकी हैं।
ज्योति मल्होत्रा का मामला दर्शाता है कि कैसे डिजिटल स्वतंत्रता, जिसे हम “आज़ादी की अभिव्यक्ति” मानते हैं, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए भी उपयोग की जा सकती है। पाकिस्तान की ISI वर्षों से भारतीय समाज के अंदर गहराई तक पहुंचने के लिए महिला प्रोफाइल्स, यूट्यूब चैनल्स, और सोशल नेटवर्क्स का इस्तेमाल करती रही है।
भारत-पाकिस्तान साइबर वॉर और सोशल मीडिया का युद्धक्षेत्र
पारंपरिक युद्धों की जगह अब साइबर युद्ध और डिजिटल दुष्प्रचार ने ले ली है। पाकिस्तान और भारत के बीच यह युद्ध सिर्फ LOC पर नहीं, बल्कि ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर भी लड़ा जा रहा है।
पाकिस्तान की साइबर विंग, जिसमें ISPR (Inter-Services Public Relations) शामिल है, सोशल मीडिया पर लगातार दुष्प्रचार, फर्जी वीडियो, और प्रोपेगेंडा फैलाने में लगी रहती है। दूसरी ओर, भारत की सुरक्षा एजेंसियों और थिंकटैंक्स को रक्षात्मक मोड में काम करना पड़ता है।
ज्योति मल्होत्रा जैसा मामला इसी युद्ध का हिस्सा है, जिसमें व्यक्ति को विचारधारा, प्रलोभन और प्रसिद्धि के जरिए राष्ट्रविरोधी दिशा में मोड़ा जाता है।
भारत के सुरक्षा कानून: पर्याप्त या कमजोर?
मल्होत्रा पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है, जो देश की सुरक्षा को खतरे में डालने और शत्रु के लिए जासूसी करने से संबंधित है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे वर्तमान कानून डिजिटल युग के खतरों के लिए पर्याप्त हैं?
भारत में आधुनिक साइबर अपराध और अंतर्राष्ट्रीय जासूसी नेटवर्क से निपटने के लिए एक समर्पित और विशिष्ट राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा कानून की आवश्यकता है।
वर्तमान में:
IT Act 2000 पुराना हो चुका है।
राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के पास सर्विलांस के अधिकार तो हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर उभरते खतरे से निपटने के लिए स्पष्ट गाइडलाइन नहीं है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही, जैसे कि यूट्यूब और फेसबुक, अभी भी अस्पष्ट है।
यह जरूरी हो गया है कि संसद में एक Digital Espionage Control Act या Cyber National Security Bill लाया जाए, जो न केवल जासूसी को रोक सके, बल्कि इसके पीछे काम करने वाले नेटवर्क को भी नष्ट कर सके।
सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव: विश्वास और भ्रम के बीच
इस तरह के मामलों से समाज में एक संदेह का माहौल बनता है। जब एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, जो देशभक्ति और कला के नाम पर वीडियो बनाता है, उसी मंच पर जासूसी करता है, तो यह लोगों के विश्वास को गंभीर क्षति पहुंचाता है।
यह युवाओं के लिए एक चेतावनी है कि डिजिटल प्रसिद्धि के पीछे छिपे लालच से सावधान रहें।
सरकार और न्यायपालिका को भी अब इस ओर ध्यान देना होगा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का दुरुपयोग कैसे रोका जाए।
राष्ट्रीय चेतना और सार्वजनिक सतर्कता की आवश्यकता
देश की सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह सतर्क रहे, जागरूक रहे और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को लेकर प्रश्न और विरोध करने का साहस रखे।
मल्होत्रा प्रकरण भारत के युवाओं के लिए एक सबक है — सोशल मीडिया पर पहचान बनाना अच्छा है, लेकिन उस पहचान को राष्ट्रविरोधी ताकतों को बेचना, विश्वासघात है।
संकट में अवसर
ज्योति मल्होत्रा की गिरफ्तारी एक संकट है, लेकिन यह अवसर भी है — राष्ट्र की साइबर सुरक्षा नीति को पुनः परिभाषित करने का, नए कानून लाने का, और सामाजिक चेतना जगाने का।
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले युद्ध केवल बंदूकों और बमों से नहीं लड़े जाएंगे, बल्कि कुर्सी पर बैठे कीबोर्ड योद्धाओं, सोशल मीडिया एक्टिविस्टों और डिजिटल एजेंटों के माध्यम से लड़े जाएंगे।
भारत को यदि 21वीं सदी में सुरक्षित और संप्रभु रहना है, तो उसे न केवल बॉर्डर की सुरक्षा करनी होगी, बल्कि ब्रॉडबैंड और ब्रेन की रक्षा भी करनी होगी।










































