लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
माघ पूर्णिमा पर संपन्न हुआ 47वां जैसलमेर मरू महोत्सव
चार दिवसीय आयोजन | शुरुआत पोकरण से | देश-विदेश के हजारों सैलानी पहुंचे
जयपुर/जैसलमेर। (आर. एन. सांवरिया) थार मरुस्थल की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले जैसलमेर मरू महोत्सव का परंपरागत रूप से माघ पूर्णिमा के दिन समापन हुआ। वर्ष 2026 में आयोजित 47वां मरू महोत्सव पर्यटन और संस्कृति—दोनों ही दृष्टियों से विशेष रूप से सफल और महत्वपूर्ण रहा।
राजस्थान पर्यटन आयुक्त रूकमणी रियाड़ ने बताया कि बीते तीन वर्षों से पोकरण को महोत्सव से जोड़ा गया है और अब इसका स्वरूप चार दिवसीय हो चुका है। इससे आयोजन केवल जैसलमेर तक सीमित न रहकर पूरे मरुक्षेत्र तक विस्तारित हुआ है। उन्होंने कहा कि मरू महोत्सव का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियां नहीं, बल्कि मरुस्थलीय विरासत के संरक्षण के साथ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन को बढ़ावा देना है।
पोकरण से हुई शुरुआत, जैसलमेर में भव्य आयोजन
इस वर्ष भी मरू महोत्सव की शुरुआत पोकरण से की गई, जहां धार्मिक अनुष्ठान, शोभायात्रा और स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियों के साथ कार्यक्रमों का शुभारंभ हुआ। इसके पश्चात आयोजन जैसलमेर पहुंचा, जहां गड़ीसर झील, शहीद पूनम सिंह स्टेडियम, डेडानसर स्टेडियम, सम, लाखमणा और खुड़ी सैंड ड्यून्स सहित विभिन्न स्थलों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए।
चार दिवसीय आयोजन के दौरान लोकगीत-लोकनृत्य, ऊँट दौड़, ऊँट सजावट, ऊँट पोलो, पगड़ी बांधना व मूंछ प्रतियोगिता, ग्रामीण खेल, हस्तशिल्प प्रदर्शनी और फूड फेस्टिवल जैसे कार्यक्रमों ने सैलानियों को खासा आकर्षित किया।
पोकरण को जोड़ने से बढ़ा सांस्कृतिक दायरा: कमलेश्वर सिंह
पर्यटन विभाग के सहायक निदेशक, जैसलमेर कमलेश्वर सिंह ने बताया कि पोकरण को मरू महोत्सव से जोड़ने का उद्देश्य मरुस्थलीय सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच देना और पर्यटन गतिविधियों को आसपास के क्षेत्रों तक विस्तारित करना है। इससे स्थानीय कलाकारों, ग्रामीण खेलों और क्षेत्रीय परंपराओं को नई पहचान मिली है।
उन्होंने बताया कि मरू महोत्सव की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1979 में हुई थी, जब राजस्थान सरकार ने मरुस्थलीय जिलों को पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की नीति अपनाई थी। समय के साथ ऊँट इस महोत्सव का केंद्रीय प्रतीक बन गया और ऊँट दौड़, ऊँट नृत्य तथा सुसज्जित ऊँट प्रतियोगिताओं ने इसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
कमलेश्वर सिंह ने यह भी उल्लेख किया कि गुजरात में आए विनाशकारी भूकंप के दौरान राष्ट्रीय शोक को देखते हुए मरू महोत्सव का आयोजन नहीं किया गया था, जो सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का उदाहरण है।
विदेशी सैलानियों की मजबूत मौजूदगी
47वें मरू महोत्सव में बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक जैसलमेर पहुंचे। पर्यटन विभाग के अनुसार जर्मनी, फ्रांस और हॉलैंड सहित कई यूरोपीय देशों से सैलानी महोत्सव देखने आए। रेगिस्तान में लोकनृत्य, ऊँट प्रतियोगिताएं और खुले आकाश के नीचे सांस्कृतिक संध्याएं विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण रहीं।
30 से 40 हजार घरेलू पर्यटक पहुंचे
महोत्सव के दौरान 30 से 40 हजार तक घरेलू पर्यटकों की उपस्थिति दर्ज की गई। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल से बड़ी संख्या में पर्यटक जैसलमेर पहुंचे। होटल, रिसॉर्ट, होम-स्टे और डेजर्ट कैंपों में लगभग पूर्ण बुकिंग रही। पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों के अनुसार स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प विक्रेताओं, लोक कलाकारों और परिवहन सेवाओं को सीधा लाभ मिला।
माघ पूर्णिमा पर पारंपरिक समापन
माघ पूर्णिमा के दिन धार्मिक अनुष्ठानों और अंतिम सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ मरू महोत्सव का पारंपरिक समापन हुआ। जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग ने आयोजन को सफल बताते हुए कहा कि मरू महोत्सव अब राजस्थान के पर्यटन कैलेंडर का स्थायी और प्रमुख आयोजन बन चुका है।
मरू महोत्सव: 47 वर्षों की यात्रा
(संयुक्त निदेशक, पर्यटन – दलीप सिंह राठौड़ के अनुसार)
आरंभिक चरण (1979–1985):
मरुस्थलीय लोकसंस्कृति के संरक्षण और ऑफ-सीजन पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु शुरुआत।
पहचान का विस्तार (1986–1995):
ऊँट नृत्य, ऊँट दौड़ और सुसज्जित ऊँट प्रतियोगिताओं से राष्ट्रीय पहचान।
लोक प्रतिस्पर्धाओं का दौर (1996–2005):
पगड़ी बांधना, मूंछ प्रतियोगिता, ग्रामीण खेल और मिस्टर डेजर्ट।
पर्यटन-केंद्रित विस्तार (2006–2012):
सम सैंड ड्यून्स, कालबेलिया नृत्य और सनसेट इवेंट्स।
अंतरराष्ट्रीयकरण (2013–2019):
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया कवरेज और सोशल मीडिया से वैश्विक पहचान।
पुनरुत्थान और जिम्मेदार पर्यटन (2022–वर्तमान):
सस्टेनेबल टूरिज्म, प्लास्टिक-फ्री आयोजन और स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता।
मरू महोत्सव केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जैसलमेर की आत्मा का सार्वजनिक उत्सव है, जो रेगिस्तान को विश्व सांस्कृतिक मानचित्र पर स्थापित करता है।








































