लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
मजदूर नेता से बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष तक का सफर: संघर्ष, सादगी और संगठन के पर्याय थे मदन लाल सैनी
किसान परिवार में जन्मे, मजदूरों की लड़ाई से बनाई पहचान, कई चुनाव हारे लेकिन संगठन में कभी नहीं हारे; आज भी कार्यकर्ता उन्हें ‘मदन जी भाईसाहब’ के नाम से याद करते हैं।
राजनीति में अक्सर नेताओं की पहचान सत्ता, पद और काफिलों से होती है। लेकिन कुछ ऐसे भी नेता होते हैं जिनकी पहचान उनकी सादगी, संगठन के प्रति समर्पण और कार्यकर्ताओं के बीच सहज उपलब्धता से बनती है। राजस्थान बीजेपी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद स्वर्गीय मदन लाल सैनी ऐसे ही नेताओं में शामिल थे।
वे किसान के बेटे थे, पेशे से वकील रहे, मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए राजनीति में आए, आपातकाल में जेल गए, कई चुनाव लड़े, कई बार हार का सामना किया, लेकिन संगठन ने उनके समर्पण को कभी नजरअंदाज नहीं किया। यही वजह रही कि अंततः वे राजस्थान बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष बने और उनके नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और सहयोगी दल ने प्रदेश की सभी 25 सीटों पर जीत दर्ज की।

- लोगों के दिलों में बसने वाले नेता थे मदन लाल सैनी
- किसान परिवार से निकलकर बने राज्यसभा सांसद
- मजदूर आंदोलन से बनाई अलग पहचान
- सादगी उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी
- बसों में सफर करना कभी नहीं छोड़ा
- संगठन सर्वोपरि, पद हमेशा दूसरे नंबर पर रखा
किसान परिवार से शुरू हुआ सफर
मदन लाल सैनी का जन्म 13 जुलाई 1943 (यदि आधिकारिक रिकॉर्ड यही हो तो उसी के अनुसार) सीकर जिले की पुरोहितों की ढाणी में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। पिता बालूराम सैनी और माता मोहनी देवी ने उन्हें शिक्षा और संस्कार दिए।
प्रारंभिक शिक्षा सीकर में हुई, जबकि राजस्थान विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने वकालत को पेशा बनाया। लेकिन अदालत से ज्यादा उनका मन समाज और संगठन के काम में लगता था।
1952 में संघ से जुड़े, मजदूरों की आवाज बने
बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मदन लाल सैनी ने संघ के तृतीय वर्ष तक का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ और किसान संगठनों में सक्रिय हो गए।
मजदूरों और किसानों के हक की लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने अनेक आंदोलन किए। कई बार धरने दिए, गिरफ्तार हुए और आपातकाल के दौरान जेल भी गए।
यहीं से उनकी पहचान एक जुझारू और जमीनी नेता के रूप में बनने लगी।
चुनाव कम जीते, दिल ज्यादा जीते
राजनीति में उनका सफर आसान नहीं रहा।
प्रमुख चुनाव
- 1990 : उदयपुरवाटी से विधायक निर्वाचित
- 1991 : झुंझुनूं लोकसभा चुनाव में हार
- 1996 : लोकसभा चुनाव में फिर हार
- 1998 : विधानसभा चुनाव में हार
- 2008 : उदयपुरवाटी से फिर हार
लगातार चुनाव हारने के बावजूद उन्होंने कभी संगठन नहीं छोड़ा। न नाराज हुए और न ही सक्रिय राजनीति से दूरी बनाई।
यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत थी।
संगठन ने हर बार भरोसा जताया
चुनावी हार के बावजूद बीजेपी नेतृत्व ने उन्हें लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी।
वे—
- तीन बार प्रदेश महामंत्री रहे।
- किसान मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री बने।
- अनुशासन समिति के अध्यक्ष रहे।
- पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाभियान के प्रदेश प्रभारी रहे।
- प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण दायित्व संभाले।
वे जिस काम की जिम्मेदारी लेते, उसे बिना प्रचार के पूरा करने के लिए जाने जाते थे।
बस से पार्टी कार्यालय पहुंचने वाला प्रदेशाध्यक्ष
मदन लाल सैनी की सबसे बड़ी पहचान उनकी सादगी थी।
कहा जाता है कि जिस दिन उन्हें बीजेपी का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया, उससे एक दिन पहले तक वे जयपुर में सरकारी बस से पार्टी कार्यालय पहुंचे थे।
प्रदेशाध्यक्ष बनने के बाद भी उनका व्यवहार नहीं बदला। वे अक्सर पार्टी कार्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर चाय पीते थे।
उनके पास पद था, लेकिन पद का अहंकार कभी नहीं था।
भैरोंसिंह से लेकर वसुंधरा तक सबके विश्वासपात्र
मदन लाल सैनी ने राजस्थान बीजेपी के कई दौर देखे।
उन्होंने भैरोंसिंह शेखावत, ओम माथुर, गुलाबचंद कटारिया और वसुंधरा राजे जैसे नेताओं के साथ लंबे समय तक संगठन में काम किया।
बताया जाता है कि जब नए प्रदेशाध्यक्ष के नाम पर चर्चा चल रही थी, तब ओम माथुर और वसुंधरा राजे—दोनों की पहली पसंद मदन लाल सैनी ही थे। वजह थी उनका निष्पक्ष, शांत और संगठननिष्ठ व्यक्तित्व।
राज्यसभा से प्रदेशाध्यक्ष तक
साल 2017 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया।
इसके बाद जून 2018 में बीजेपी ने उन्हें राजस्थान का प्रदेशाध्यक्ष बनाया।
उनके नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 24 सीटें जीतीं और सहयोगी आरएलपी ने एक सीट जीती। यानी प्रदेश की सभी 25 सीटें एनडीए के खाते में गईं।
यह उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।
मदन जी भाईसाहब क्यों कहलाते थे?
राजस्थान बीजेपी में शायद ही कोई कार्यकर्ता होगा जिसने उन्हें “मदन जी भाईसाहब” कहकर संबोधित न किया हो।
वे हर कार्यकर्ता का नाम याद रखते थे, छोटे कार्यकर्ताओं से भी उसी आत्मीयता से मिलते थे जैसे बड़े नेताओं से।
उनके लिए संगठन का कार्यकर्ता ही सबसे बड़ी ताकत था।
24 जून 2019 को थम गया सफर
24 जून 2019 को दिल्ली के एम्स अस्पताल में फेफड़ों के संक्रमण के कारण उनका निधन हो गया।
उनके जाने के बाद बीजेपी ने एक ऐसा संगठनकर्ता खो दिया, जिसकी पहचान पद से नहीं बल्कि व्यवहार से थी।
इनसाइड स्टोरी का निष्कर्ष
आज राजनीति में चमक-दमक, सुरक्षा घेरा और बड़े काफिले नेताओं की पहचान बन चुके हैं। ऐसे दौर में मदन लाल सैनी का जीवन याद दिलाता है कि राजनीति का असली आधार संगठन, कार्यकर्ता और सादगी होती है।
वे उन नेताओं में थे जिन्होंने सत्ता से ज्यादा संगठन को महत्व दिया, चुनावी हार से ज्यादा कार्यकर्ता का विश्वास जीता और पद से ज्यादा अपने व्यवहार के कारण लोगों के दिलों में जगह बनाई।
शायद यही वजह है कि आज भी राजस्थान बीजेपी के पुराने कार्यकर्ता उन्हें सम्मान से सिर्फ एक नाम से याद करते हैं—“मदन जी भाईसाहब।”