लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
सीकर | रिपोर्टर: योगेश ऋषिका
अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA) जिला सचिव रेखा जांगिड़ ने कामकाजी महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश की मांग पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि न्यायालय की नकारात्मक और भेदभावपूर्ण टिप्पणियां महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी वास्तविक आवश्यकताओं को अनदेखा करती हैं और समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक सोच को और मजबूत बनाती हैं।
रेखा जांगिड़ ने कहा कि यह तर्क कि मासिक धर्म अवकाश से महिलाओं को नौकरी से वंचित किया जा सकता है, पूरी तरह अनुचित और असंवेदनशील है। इसका असर महिलाओं को समान अवसर देने के बजाय कार्यस्थलों से दूर करने की मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और अधिकारों को उत्पादन या मुनाफे के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने बताया कि मासिक धर्म एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें कई महिलाएं दर्द, थकान, कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं, बावजूद इसके उन्हें बिना सहूलियत काम करना पड़ता है। रेखा जांगिड़ ने कहा कि महिलाओं को उनकी इच्छा अनुसार मासिक धर्म के दौरान अवकाश देने से उनके स्वास्थ्य, आत्मसम्मान और कार्यक्षमता तीनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि कई देशों और कुछ संस्थानों में पहले से लागू मासिक धर्म अवकाश से कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी और उत्पादकता दोनों बेहतर हुई हैं। आज भी समाज में मासिक धर्म को लेकर कई तरह की वर्जनाएं और चुप्पी मौजूद हैं, और इस पर खुलकर चर्चा और नीतिगत पहल करना समय की मांग है।
रेखा जांगिड़ ने मांग की कि मासिक धर्म अवकाश को कामकाजी महिलाओं के अधिकारों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए और केंद्र व राज्य सरकारें इस संबंध में प्रभावी कानून बनाएं। साथ ही सभी कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और स्वास्थ्य के अनुकूल कार्य वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
रेखा जांगिड़
महासचिव एवं जिला परिषद सदस्य,
अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA), सीकर
