घर के पट्टे के लिए 70 साल का संघर्ष खत्म, नागपाल परिवार को मिला अपना हक

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

रिपोर्ट: Lok Today News | जयपुर

भारत-पाक विभाजन के बाद जब लाखों परिवार उजड़कर भारत आए, तब सरकार ने उन्हें बसाने का वादा किया था।

इसी क्रम में जयपुर के राजा पार्क स्थित गुरु नानकपुरा में विस्थापित परिवारों को भूखंड आवंटित किए गए। वर्ष 1955 में पाकिस्तान से आए नारायण दास नागपाल को भी प्लॉट नंबर 254 आवंटित हुआ।

पर किस्मत देखिए — जिस जमीन पर परिवार 70 साल से रह रहा था, उसका पट्टा पाने के लिए तीन पीढ़ियों को संघर्ष करना पड़ा।

पिता-माँ  का संघर्ष, अधूरा सपना

नारायण दास नागपाल ने पट्टे के लिए आवेदन किया, लेकिन उन्हें जीवनकाल में स्वामित्व पत्र नहीं मिल पाया। 1962 में उनका निधन हो गया।

इसके बाद उनकी धर्मपत्नी ने भी वर्षों तक दर-दर दस्तक दी, परंतु 2011 में वह भी बिना पट्टा देखे ही इस दुनिया से चली गईं।

एक सवाल प्रशासन से—

जिस जमीन पर सरकार ने खुद बसाया, उसी का कागज़ पाने में 70 साल क्यों लगे?

बेटे ने पूरा किया माता-पिता का सपना

आज 70 वर्ष की आयु में उनके बेटे राजेश कुमार नागपाल ने वह लड़ाई जीत ली, जो उनके माता-पिता अधूरी छोड़ गए थे।

भजन लाल  के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान और नगर निगम जयपुर की टीम—आयुक्त अशोक शर्मा, श्याम जांगिड़ व मनीष शर्मा—की पहल से आखिरकार पट्टा जारी हुआ।

जब राजेश नागपाल पट्टा लेकर घर पहुंचे, तो पूरा परिवार भावुक हो उठा।

उन्होंने अपने माता-पिता की तस्वीर के सामने पट्टा रखकर कहा—

“यह आपको समर्पित है। जिस कागज़ के लिए आप जीवनभर तरसे, वह आज मिला है।”

उनकी आंखों से बहते आंसू सिर्फ खुशी के नहीं, बल्कि 70 साल के इंतजार की कहानी कह रहे थे।

प्रशासन पर सवाल भी

यह खुशी का क्षण जरूर है, लेकिन यह कहानी एक सच्चाई भी उजागर करती है—

सरकारी सिस्टम की धीमी रफ्तार ने एक परिवार को अपने ही घर का मालिक बनने के लिए तीन पीढ़ियों तक इंतजार कराया।

अगर इच्छाशक्ति हो तो समाधान संभव है।

नागपाल परिवार की यह जीत सिर्फ एक पट्टे की नहीं, बल्कि विश्वास की बहाली है।

भावनात्मक संदेश

विस्थापन का दर्द झेलकर बसे परिवारों के लिए यह सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनकी पहचान, सुरक्षा और सम्मान का प्रतीक है।

आज राजा पार्क की उस गली में सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि 70 साल पुराना सपना रोशनी में नहा रहा है।

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