लोक टुडे न्यूज नेटवर्क
हेमराज तिवारी
आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ ज्ञान और सूचना की उपलब्धता पहले कभी इतनी व्यापक नहीं रही। इंटरनेट, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) और चैटजीपीटी जैसे अत्याधुनिक साधनों ने जानकारी को हमारी उंगलियों पर ला दिया है। किसी भी विषय पर तथ्य, आंकड़े और शोध कुछ ही सेकंड में हमारे सामने आ जाते हैं। लेकिन इस असीम सूचना के युग में एक महत्वपूर्ण प्रश्न और भी गहरा हो गया है—क्या मात्र जानकारी ही शिक्षा है? क्या जानकारी का ढेर ही समझ और विवेक का प्रतीक है? इसका उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
शिक्षा का असली अर्थ
शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ़ ज्ञानार्जन या डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि मनुष्य को सोचने, परखने और सही निर्णय लेने की क्षमता देना है। महज़ तथ्यों को याद कर लेना या परीक्षा में अच्छे अंक ला लेना किसी व्यक्ति की शिक्षा का मापदंड नहीं हो सकता।
असली शिक्षा का अर्थ है—ज्ञान + विवेक।
जब व्यक्ति अपने ज्ञान का रचनात्मक और नैतिक प्रयोग करने लगे, तभी वह शिक्षित कहलाता है। गहराई से सोचने, तर्क करने और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने की क्षमता ही असली समझ है।
समझ को परखने के संकेत
किसी व्यक्ति की शिक्षा और समझ को परखने के लिए कुछ मूलभूत संकेत होते हैं:
आलोचनात्मक प्रश्न पूछने की आदत – शिक्षित व्यक्ति हर जानकारी को अंधविश्वास से स्वीकार नहीं करता। वह स्रोत, संदर्भ और तर्क की जांच करता है।
नैतिक और संवेदनशील निर्णय – कठिन परिस्थितियों में संतुलित और न्यायपूर्ण निर्णय लेना ही सच्ची शिक्षा का संकेत है।
निरंतर सीखने की प्रवृत्ति – सच में शिक्षित वही है जो यह नहीं मानता कि सीखने की प्रक्रिया कभी पूरी हो गई है।
एआई और सूचना की बाढ़
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने सूचना तक पहुँच को आसान बना दिया है। आज कोई भी छात्र, पत्रकार या आम नागरिक कुछ ही क्लिक में विस्तृत डेटा पा सकता है। परंतु यही सुविधा एक नई चुनौती भी है—सही और गलत में अंतर करने की क्षमता।
AI हमें उत्तर तो दे सकता है, लेकिन यह तय करना कि कौन-सा डेटा प्रामाणिक है और किस संदर्भ में उसका क्या अर्थ है, यह निर्णय इंसान को ही लेना होगा। यदि हम सिर्फ़ तकनीक पर निर्भर हो जाएँ और सोचने की क्षमता को न विकसित करें तो गलत सूचना और भ्रामक प्रचार का शिकार होना आसान है।
पत्रकारिता में संवैधानिकता और कानून की समझ
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इसका काम केवल खबरें देना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना भी है।
आज जब सोशल मीडिया और ऑनलाइन पोर्टलों पर खबरें पलभर में वायरल होती हैं, तब संविधान और कानून की गहरी समझ के बिना पत्रकारिता करना बेहद खतरनाक हो सकता है।
पत्रकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह जो भी जानकारी दे रहा है, वह सटीक और निष्पक्ष हो।
किसी घटना या बयान को बिना संदर्भ के प्रस्तुत करना समाज को गुमराह कर सकता है।
प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि बिना जिम्मेदारी के कोई भी सामग्री प्रसारित की जाए।
एआई युग में पत्रकारों के लिए यह और भी जरूरी हो गया है कि वे तकनीक को सिर्फ़ सहायक उपकरण मानें, न कि अंतिम निर्णायक। खबरों की गति से ज्यादा उनका संतुलन और गहराई महत्वपूर्ण है।
शिक्षा का नया दृष्टिकोण
अब शिक्षा संस्थानों और पाठ्यक्रमों को भी अपनी सोच बदलनी होगी।
आलोचनात्मक और रचनात्मक सोच पर ज़ोर – बच्चों को केवल जानकारी देने की बजाय यह सिखाना जरूरी है कि वे जानकारी का उपयोग कैसे करें, उसका विश्लेषण कैसे करें।
नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों की शिक्षा – विद्यार्थियों को अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए।
इंटरनेट और एआई के दौर में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सत्य और असत्य को पहचानने का प्रशिक्षण अनिवार्य है।
नागरिकों की जिम्मेदारी
केवल पत्रकार या छात्र ही नहीं, हर नागरिक के लिए यह जरूरी है कि वह जानकारी को आँख मूंदकर न माने।
तथ्य-जांच की आदत डालें।
सामाजिक या राजनीतिक विषयों पर अपनी राय बनाने से पहले विभिन्न स्रोतों को देखें।
संवैधानिक अधिकारों और कानून की बुनियादी समझ रखें।
एक जागरूक नागरिक ही लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है।
शिक्षा से नेतृत्व की ओर
असली शिक्षा हमें केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं देती, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी जगाती है।
शिक्षित व्यक्ति अपने ज्ञान का उपयोग समाज की भलाई के लिए करता है।
वह कठिन परिस्थितियों में भी नैतिक मार्ग पर चलता है।
वह दूसरों को भी सीखने और जागरूक होने के लिए प्रेरित करता है।
यही कारण है कि शिक्षा को हमेशा जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया माना गया है।
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और चैटजीपीटी ने सूचना की दुनिया को क्रांतिकारी रूप से बदल दिया है। लेकिन इस बदलाव के बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सही मायने में शिक्षित वही है, जो गहराई से समझता है, आलोचनात्मक सोचता है और जिम्मेदारी से कार्य करता है।
तकनीक हमारे लिए सहायक हो सकती है, पर नैतिक विवेक और संवैधानिक समझ सिर्फ़ इंसान ही विकसित कर सकता है।
इसलिए आज का सबसे बड़ा संदेश यही है:
सीखना कभी न रोकें।
जिज्ञासा को जीवित रखें।
हर जानकारी को परखने की आदत डालें।
जब तकनीक और मानवीय विवेक साथ चलते हैं, तब जानकारी बुद्धि में बदलती है और बुद्धि समाज में सकारात्मक बदलाव लाती है। यही असली शिक्षा है—जो केवल अधिक जानने तक सीमित नहीं, बल्कि गहराई से समझने और जिम्मेदारी से जीवन जीने की प्रेरणा देती है।











































