लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली / वैश्विक। ग्लोबल स्तर पर कई देशों ने अब “क्लाइमेट-स्मार्ट” कृषि, आपदा-प्रबंधन और नवीनीकृत ऊर्जा पर जोर बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव पर्यावरण संरक्षण, जलवायु लचीलापन (climate resilience) एवं टिकाऊ विकास (sustainable development) की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
✅ क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि: खेती को बदल रही रणनीतियाँ
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हाल ही में भारत में NABARD और CEEW ने एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किया है, ताकि ग्रामीण भारत में जलवायु अनुकूल खेती और सतत् आजीविका (sustainable livelihoods) को बढ़ावा दिया जाए।
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इसी तरह, कई राज्यों और संस्थानों ने “क्लाइमेट-रिसिलिएंट” फसलें, बदलते मौसम अनुसार खेती व सिंचाई तकनीकों, तथा जैविक / टिकाऊ खेती की ओर कदम बढ़ाया है।
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इन प्रगतिशील कदमों का उद्देश्य है — बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच खाद्य सुरक्षा बनाए रखना, किसानों की स्थिर आजीविका सुनिश्चित करना, और प्राकृतिक संसाधनों — जैसे पानी — का संरक्षण।

आपदा प्रबंधन और जलवायु प्रभावित इलाकों में तैयारी
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कई एशियाई और अन्य देशों में जलवायु-परिवर्तन, असामयिक बारिश, बाढ़ और तूफानों जैसी घटनाओं की तीव्रता बढ़ी है। इन खतरों से निपटने के लिए सरकारें और समुदाय मिलकर आपदा-प्रबंधन, पूर्व चेतावनी (early warning), पुनर्वास (relief & rehabilitation) और लचीला बुनियादी ढांचा तैयार कर रही हैं।
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साथ ही, यह स्पष्ट हो रहा है कि सिर्फ “मिटिगेशन” (प्रदूषण कम करना) नहीं, बल्कि “एडैप्टेशन” (परिस्थितियों के अनुसार ढलना) भी जरूरी है — जिससे सामान्य नागरिक और संवेदनशील समूह सुरक्षित रह सकें।
नवीनीकृत ऊर्जा — सिर्फ पर्यावरण नहीं, आजीविका व टिकाऊ विकास
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दुनिया के कई हिस्सों में अब नवीनीकृत ऊर्जा (Renewable Energy) — जैसे सोलर, पवन ऊर्जा — पर जोर बढ़ा है: इससे ऊर्जा की जरूरत का तेज़ी से, स्वच्छ और अधिक किफायती स्रोत मिल रहा है।
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ऐसे ऊर्जा स्रोतों का उपयोग सिर्फ बिजली के लिए नहीं बल्कि सिंचाई पंप, ग्रामीण जलापूर्ति, सड़क संपर्क और छोटे उद्योगों के संचालन के लिए किया जा रहा है — जिससे किसानों और ग्रामीणों को स्थिर लाभ मिलता है।
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इस बदलाव से न सिर्फ पर्यावरणीय दबाव (emissions) कम होगा, बल्कि विकास की दिशा में — खासकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में — स्थायित्व आएगा।

⚠️ चुनौतियाँ — फंड, नीति और तत्परता
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हालांकि कई देशों और संस्थाओं ने नीतिगत व तकनीकी पहल शुरू की है, परंतु वित्तीय संसाधनों (funding) की कमी अभी भी प्रमुख समस्या बनी हुई है।
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इसके अलावा, जलवायु-अनुकूल खेती, नए ऊर्जा मॉडल, आपदा-प्रबंधन जैसी पहलों को अपनाने के लिए स्थानीय जागरूकता, प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और नीति-गत समर्थन आवश्यक है।
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अगर समय रहते ये तैयारियाँ नहीं की गईं, तो बढ़ती तूफानी, बाढ़ और अन्य जलवायु-विषम परिस्थितियाँ — खासकर कमजोर व गरीब समुदायों को — ज्यादा प्रभावित कर सकती हैं।

निष्कर्ष — टिकाऊ भविष्य की ओर
इन प्रयासों से यह स्पष्ट होता है कि अब “क्लाइमेट एक्शन” सिर्फ पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रह गया — बल्कि यह कृषि, ऊर्जा, समुदाय, और विकास को एक साथ जोड़ने वाला एक व्यापक मॉडल बन गया है।
अगर पूरी मंजिल हासिल हो — तो भविष्य में हम एक ऐसा विश्व देख सकते हैं जहाँ खेती, ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और आजीविका — सबको साथ लेकर चलकर — पर्यावरण व मानवता दोनों को सुरक्षित रखा जाए।
अगर आप चाहें — मैं 2025–26 के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का विस्तृत संग्राह (case studies) हमारे लिए तैयार कर सकता हूँ — जिससे यह दिखे कि कौन-कौन से देश, किस तरह जलवायु-अनुकूल नीति अपना रहे हैं।








































