लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
75 साल बाद भी शव जलाने के लिए SC वर्ग श्मशान में करना पड़ा संघर्ष
टोंक के मोर में दलित महिला का अंतिम संस्कार बना संघर्ष
यह खबर दिल दहला देने वाली है और उन दावों की पोल खोलती है, जिनमें कहा जाता है कि देश से जातिवाद खत्म हो चुका है।
टोंक। राजस्थान के टोंक जिले की टोडारायसिंह तहसील के मोर क्षेत्र के श्रीनगर गांव में एक अनुसूचित जाति (बैरवा समाज) की महिला की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार करना भी आसान नहीं था। श्मशान घाट पर कुछ असामाजिक और तथाकथित “ऊंची जाति” के लोगों ने शव जलाने से रोकने की कोशिश की।
आजादी के 75 साल बाद भी दलितों को श्मशान का हक नहीं?
बैरवा समाज के लोगों का कहना है कि वे वर्षों से उसी श्मशान घाट में अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं, लेकिन इस बार कुछ लोगों ने खुद को ऊंचा बताकर अमानवीय हरकत की। विरोध हुआ, माहौल तनावपूर्ण हुआ और सवाल उठा—
क्या संविधान सिर्फ किताबों तक सीमित है?
जब सब्र टूटा, तो महिलाएं सड़क पर उतर आईं
जैसे ही यह खबर गांव में फैली कि दलित महिला का अंतिम संस्कार रोका जा रहा है, घरों में विलाप कर रहीं बैरवा समाज की महिलाएं श्मशान घाट की ओर दौड़ पड़ीं।
इन महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विरोध किया, डटकर मुकाबला किया और विरोध करने वालों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
यह दृश्य बताता है कि
सम्मान भीख में नहीं मिलता, उसे छीनना पड़ता है।
पुलिस मौजूद, लेकिन मूकदर्शक क्यों?
घटना के दौरान पुलिस भी मौके पर पहुंची, लेकिन सवाल यह है कि—
पुलिस कानून लागू करने आई थी या तमाशा देखने?
अगर समाज की महिलाएं आगे न आतीं, तो क्या अंतिम संस्कार हो पाता?
एक पनघट, एक मरघट, एक मंदिर—सिर्फ नारे?
एक तरफ संघ परिवार “एक पनघट, एक मरघट, एक मंदिर” की बात करता है, दूसरी तरफ जमीनी सच्चाई यह है कि दलितों को श्मशान तक में अपमानित किया जा रहा है।
अगर हिंदू एकता की बात की जाती है, तो फिर
दलितों को मंदिर, श्मशान और सम्मान से क्यों रोका जाता है?
आज भी दलितों पर वही जुल्म क्यों?
श्मशान में रोक, मंदिर में प्रवेश पर पाबंदी,
शादी में घोड़ी चढ़ने से मनाही,
नाई की दुकान पर बाल काटने से इनकार—
ये सब 1947 से पहले की बातें नहीं, आज के भारत की हकीकत हैं जो आए दिन सामने आती रहती है तो पता लगता है कि क्या अभी भी is घटिया मानसिकता के लोग है जो कमजोर वर्ग के लोगों को कीड़ा मकोड़ा समझते हैं।
संविधान में समानता है, लेकिन सोच में नहीं?
जब संविधान सबको बराबरी का हक देता है, तो फिर कुछ लोगों का अहंकार खुद को कानून से ऊपर क्यों समझता है?
हिंदू धर्म के ठेकेदार ऐसे मामलों पर क्यों साधते हैं चुप्पी?
बड़ा सवाल यह है कि आए दिन हिंदू धर्म के ठेकेदार इस बात का डिंडोरा पीटते हैं कि एससी वर्ग के लोग धर्म छोड़ रहे हैं या परिवर्तन कर रहे हैं वे वहां जाकर हंगामा करते हैं ।मारपीट करते हैं लेकिन जब इस तरह का मामला सामने आता है तब वह कहां और कि बिल में घुस जाते हैं ?वह क्यों नहीं इस तरह की घटनाओं का विरोध करते आज ततक इस तरह की घटनाओं का किसी हिंदू संगठन ने विरोध करना तो दूर है खुलकर बयान भी नहीं जारी किया। लोग ऐसे ही नहीं करते धर्म परिवर्तन की बात उसके पीछे छुपी होती है मजबूरियां, दमन, शोषण!
क्यों आज भी दलितों को इंसान नहीं, दोयम दर्जे का समझा जाता है?
सरकार और प्रशासन से सीधा सवाल
क्या हर बार किसी दलित परिवार को अपने मृतक के सम्मान के लिए लड़ना पड़ेगा?
क्या सरकार और प्रशासन सिर्फ बयान देने के लिए हैं?
टोडारायसिंह की इस घटना में दोषियों पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं?
सरकार निकाले आदेश इस तरह की घटनाक्रम होने पर सीधी हो कार्यवाही, गिरफ्तार कर मिले सजा तो रुके ऐसी घटनाएं, क्योंकि आधुनिक समाज में इस तरह की सोच और इस तरह की घटनाएं पूरी समाज के लिए नहीं प्रदेश के लिए भी बदनुमा दाग के समान है।









































