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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क
सुनील निगम की रिपोर्ट
डग -झालावाड़। मकर संक्रांति पर डग झालावाड के युवाओं ने गिल्ली डंडा, सितोलिया, खो -खो खेल कर पुराने बचपन के दोनों को याद किया । दरअसल राजस्थान के अलग-अलग गांव में अलग-अलग चलन है। जयपुर में जहां भरपूर पतंगबाजी का चलन है तो कई स्थान पर कंचे, मारदड़ी, कपड़े की गेंद बनाकर खेलने की तो कहीं पर गुल्ली डंडा खेलने का भी शौक है ।
गंगधार कस्बे में और आसपास के गांव में मकर संक्रांति के दिन लोग मोबाइल और ऑनलाइन गेम खेलना छोड़कर गुल्ली डंडा, सितोलिया, रस्सी खींच, गुलामडाली, खो खो जैसे पारंपरिक खेलों को खेलते हुए नजर आए, तो इनको खेलते देखकर लोगों को आनंद आ गया । लोगों ने इन बच्चों और युवाओं की जमकर हौसला बढ़ाया। बुजुर्गों को अपने पुराने दिन याद आ गए क्योंकि पुराने समय में यह सब पारंपरिक खेल ही होते थे। गांव ढाणी में ,खेत खलियान में हो या फिर स्कूलों में भी इसी तरह के पारंपरिक खेल छात्र छात्राएं खेलते थे ।
आज जब संक्रांति के दिन स्थानीय स्तर पर छात्रों और युवाओं ने पारंपरिक खेलों को मुकाबला के जरिए खेला तो लोगों में देखने और खेलने की होड मच गई । वाकई में पुराने खेलों से बच्चों की दौड़ने- भागने की, स्टैमिना पावर बढ़ती थी, मोटापा नहीं बढ़ता था और बच्चे स्वस्थ रहते थे । इन पारंपरिक खेलों में बच्चों के साथ युवा भी बढ़ चढ़कर शामिल हुए। स्थानीय लोगों का कहना था गिल्ली डंडा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि सालों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत है, जो सामाजिक समरसता और पारंपरिक मूल्यों को सहजने का काम करती है।

संक्रांति के दिन चौपाल ,खेतों की मेड और खुले मैदाने और स्कूलों में युवा गिल्ली डंडा खेलते नजर आए । इसके लिए खास तौर पर लकड़ी की गिल्ली और डंडा खुद तैयार करते हैं। खेल के दौरान खिलाड़ी अपनी फुर्ती, संतुलन और निशानी बाजी का प्रदर्शन करते हैं। आसपास खड़े लोग तालियां से खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाते हैं । कई गांव में इस मौके पर आपसी मुकाबले भी आयोजित हुए । इसे उत्सव का माहौल और अधिक रंगीन हो गया । त्यौहार के साथ खेल का यह विशेष दिन रहा। डग निवासी सुरेश कुमावत काका ने बताया कि गुल्ली डंडा जैसे खेल शारीरिक फुर्ती के साथ-साथ टीम भावना धैर्य और अनुशासन भी सिखाते हैं। मकर संक्रांति का धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टि से विशेष महत्व है । इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इससे मौसम में धीरे-धीरे गर्माहट आती है और बड़े दिन भी हो जाते हैं ।उसके साथी दान पुण्य कभी महत्व माना जाता है। गिल्ली डंडा जिसे पारंपरिक खेल खेले जाते हैं। उन्होंने युवाओं से मोबाइल से दूर रहने और अपने पारंपरिक खेलों को अपनाने की अपील की। जिससे शारीरिक क्षमता भी बढ़ती है और स्पूर्ति भी आती है और मोटापा जैसी बीमारियों से भी आदमी dur3 रहता है। वाकई में इन पारंपरिक खेलों को देखकर लोगों ने भरपूर आनंद लिया।
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