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भंवरलाल शर्मा ने हिला दी थी शेखावत और गहलोत सरकार

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लोक टुडे न्यूज़ नेटवर्क

सरपंच से सात बार विधायक तक का सफर, भंवरलाल शर्मा

एक ऐसा नेता जिसने गांव की चौपाल से विधानसभा तक बनाई अलग पहचान

नीरज मेहरा वरिष्ठ पत्रकार

जयपुर। राजस्थान की राजनीति में कुछ ऐसे नेता हुए हैं जिनकी पहचान केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखने वाले नेताओं में गिने गए। सरदारशहर के वरिष्ठ नेता भंवरलाल शर्मा उन्हीं नेताओं में शामिल थे। चार बार सरपंच, पंचायत समिति प्रधान, सात बार विधायक, मंत्री और ब्राह्मण समाज के प्रभावशाली चेहरे के रूप में उन्होंने राजस्थान की राजनीति में अपनी अलग छाप छोड़ी।

जातिगत आरक्षण के मुखर विरोधी और आर्थिक आधार पर आरक्षण के पैरोकार रहे भंवरलाल शर्मा का राजनीतिक जीवन जितना लंबा रहा, उतना ही विवादों और सियासी घटनाक्रमों से भी भरा रहा। उन पर दो अलग-अलग दौर में सरकारों को अस्थिर करने के आरोप लगे, लेकिन इसके बावजूद उनकी राजनीतिक पकड़ कभी कमजोर नहीं हुई।

18 साल की उम्र में बने सरपंच

भंवरलाल शर्मा का जन्म 17 अप्रैल 1945 को चूरू जिले के सरदारशहर क्षेत्र के जैतसीसर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय माणकराम शर्मा था।

राजनीति में उनकी एंट्री बेहद कम उम्र में हो गई। मात्र 18 वर्ष की आयु में वे वर्ष 1962 में जैतसीसर ग्राम पंचायत के सरपंच चुने गए। इसके बाद लगातार चार बार सरपंच बने और 1982 तक इस पद पर रहे।

ग्रामीण राजनीति में मजबूत आधार बनाने के बाद उन्होंने पंचायत समिति की राजनीति में कदम रखा और वर्ष 1982 में सरदारशहर पंचायत समिति के प्रधान निर्वाचित हुए।

लोकदल से विधानसभा पहुंचने की शुरुआत

भंवरलाल शर्मा ने 1985 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। लोकदल के टिकट पर चुनाव जीतकर वे पहली बार राजस्थान विधानसभा पहुंचे।

इसके बाद उन्होंने जनता दल का दामन थामा और 1990 में दूसरी बार विधायक बने। 1993 और 1996 के राजनीतिक दौर में भी उन्होंने अपनी पकड़ बरकरार रखी। जनता दल के प्रभावशाली नेताओं में उनकी गिनती होने लगी।

शेखावत सरकार में मंत्री बने

भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व वाली सरकार में भंवरलाल शर्मा को मंत्री बनाया गया। उन्हें इंदिरा गांधी नहर परियोजना जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई।

यह वह दौर था जब राजस्थान की राजनीति में जोड़-तोड़ और सत्ता संतुलन की चर्चाएं अक्सर होती थीं। भंवरलाल शर्मा को भी ऐसे नेताओं में माना जाता था जिनकी राजनीतिक सक्रियता सत्ता के समीकरणों को प्रभावित कर सकती थी।

जब शेखावत सरकार को लेकर उठे सवाल

1990 के दशक में भैरोंसिंह शेखावत के विदेश में उपचार के दौरान राजस्थान की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया। उस समय शेखावत सरकार को अस्थिर करने की चर्चाएं तेज हुईं।

राजनीतिक हलकों में भंवरलाल शर्मा का नाम भी उन नेताओं में लिया गया जिन पर सरकार के खिलाफ रणनीति बनाने के आरोप लगे। हालांकि यह आरोप राजनीतिक विवाद का विषय रहे, लेकिन इस घटनाक्रम ने उन्हें राज्य की राजनीति के सबसे चर्चित नेताओं में ला खड़ा किया।ॉ

कांग्रेस में आए और लगातार जीतते रहे चुनाव

भंवरलाल शर्मा बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। 1998 और 2003 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की।

इसके बाद भी उन्होंने सरदारशहर क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी और कुल सात बार विधायक बनने का रिकॉर्ड कायम किया। वे 2022 तक सक्रिय राजनीति में बने रहे।

2020 का सियासी संकट और फिर चर्चा में आए भंवरलाल शर्मा

वर्ष 2020 में राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार पर संकट के दौरान भंवरलाल शर्मा एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गए।

सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच चले राजनीतिक संघर्ष के दौरान उनका नाम भी चर्चा में रहा। कथित ऑडियो क्लिप्स और राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद कांग्रेस ने उन्हें निलंबित कर दिया था।

हालांकि बाद में वे फिर कांग्रेस खेमे में लौट आए और पार्टी ने उनका निलंबन भी समाप्त कर दिया। यह घटनाक्रम राजस्थान की राजनीति के सबसे बड़े सत्ता संघर्षों में से एक माना जाता है।

ब्राह्मण राजनीति का बड़ा चेहरा

भंवरलाल शर्मा केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहे। वे लंबे समय तक ब्राह्मण समाज के प्रभावशाली नेता रहे।

वे अखिल भारतीय ब्राह्मण महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। साथ ही राजस्थान ब्राह्मण महासभा का भी लंबे समय तक नेतृत्व किया। जयपुर के विद्याधर नगर क्षेत्र में परशुराम भवन के लिए भूमि आवंटन कराने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रबल समर्थक

भंवरलाल शर्मा की सबसे अलग राजनीतिक पहचान आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर रही।

वे जातिगत आरक्षण व्यवस्था के आलोचक थे और लगातार यह तर्क देते रहे कि गरीबी और आर्थिक पिछड़ापन किसी जाति विशेष तक सीमित नहीं होता। इसी कारण वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को आरक्षण देने की वकालत करते रहे।

उनके नेतृत्व में राजस्थान ब्राह्मण महासभा ने विभिन्न जिलों में बड़े जनजागरण अभियान और रैलियां आयोजित कीं। जयपुर के अमरूदों के बाग में आयोजित विशाल सम्मेलन उस दौर की चर्चित राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं में शामिल रहा।

77 वर्ष की उम्र में हुआ निधन

9 अक्टूबर 2022 को बीमारी के चलते भंवरलाल शर्मा का निधन हो गया। वे 77 वर्ष के थे।

उनके निधन के साथ राजस्थान की राजनीति का एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ जिसने गांव की पंचायत से लेकर विधानसभा और सत्ता के शीर्ष गलियारों तक अपना प्रभाव बनाए रखा। समर्थक उन्हें दबंग, बेबाक और जनाधार वाले नेता के रूप में याद करते हैं, जबकि राजनीतिक विश्लेषक उन्हें उन नेताओं में गिनते हैं जिन्होंने कई बार प्रदेश की सत्ता के समीकरणों को प्रभावित किया।

राजनीतिक विरासत आज भी कायम

भंवरलाल शर्मा भले आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन सरदारशहर और आसपास के क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक विरासत आज भी चर्चा का विषय है। उनके परिवार के सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं और क्षेत्र में उनके कार्यों को लेकर आज भी लोगों के बीच चर्चा होती है।

राजस्थान की राजनीति में भंवरलाल शर्मा का नाम एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिसने सत्ता के साथ भी संघर्ष किया, अपनी पार्टी से भी टकराव मोल लिया और अपने विचारों पर अंत तक कायम रहा।

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