लोक टुडे न्युज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी में आयोजित Berlin Global Dialogue सम्मेलन में ब्रिटेन के ट्रेड मंत्री डगलस अलेक्ज़ेंडर से तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि भारत को रूस से तेल खरीदने को लेकर “विशेष रूप से निशाना” क्यों बनाया जा रहा है, जबकि यूरोपीय देश खुद रूस से ऊर्जा लेन-देन जारी रखे हुए हैं।
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भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि India को विशेष रूप से क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जबकि पश्चिमी देश — जैसे United Kingdom व Germany — रूस से तेल के लेन-देने में छूट या मोड़ पा रहे हैं।
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यह बातचीत Berlin Global Dialogue में हुई, जहाँ Goyal ने UK ट्रेड मंत्री से सर्क़ारी तौर पर पूछा:
“तो फिर भारत को क्यों अलग-अलग तरह से देखा जा रहा है?”
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UK मंत्री ने जवाब दिया कि मामला “विशेष रूप से Rosneft की एक सहायक कंपनी” से जुड़ा था। Goyal ने कहा: “हमारे पास भी Rosneft की एक सहायक कंपनी है भारत में।”
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पृष्ठभूमि में है कि अमेरिका ने Lukoil व Rosneft जैसी रूस की बड़ी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं, और भारत, चीन जैसे देश अब रूस से सस्ते कच्चे तेल के आयात के चलते निदान दबाव में हैं।
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Goyal ने यह भी कहा कि भारत “शट-अप” व्यापार समझौतों में नहीं आएगा — निर्णय अपनी sovereign (स्वायत्त) नीति के आधार पर लेगा।
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रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के तेल व गैस पर पश्चिमी देशों का कड़ा रुख है — उनसे जुड़ी कंपनियों और लेन-देनों पर प्रतिबंध बढ़ाए गए हैं। इस प्रवृत्ति में भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय दबाव देखा जा रहा है।
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भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के दृष्टिकोण से विश्व-परिस्थितियों को देखते हुए निर्णय ले रहा है।
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Goyal की टिप्पणी “दोहरे मानदंड” (double standards) की ओर इंगित करती है — जहाँ कुछ देशों को छूट मिल रही है और कुछ को नहीं।
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इस मुद्दे का व्यापार समझौतों, आयात-निर्यात, कच्चे तेल की आपूर्ति एवं रणनीतिक सहयोग पर भी असर पड़ सकता है।
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रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध (sanctions) लगाए हैं — खासकर तेल और गैस निर्यात पर।
भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना जारी रखा, जिससे उसे आर्थिक लाभ हुआ।
अब पश्चिमी देश भारत से सवाल पूछ रहे हैं कि वह “प्रतिबंधों का पालन क्यों नहीं कर रहा।”
⚖️ 2. पीयूष गोयल का रुख
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गोयल ने स्पष्ट कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों (national interests) के आधार पर निर्णय लेता है।
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उन्होंने पश्चिमी दोहरे मानदंडों (double standards) पर सवाल उठाया:
“जब यूरोपीय देश रूस से तेल ले सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं?”
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भारत का यह रुख “ऊर्जा आत्मनिर्भरता (energy sovereignty)” की दिशा में एक मजबूत संदेश है।
3. आर्थिक प्रभाव
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रूस से सस्ता तेल मिलने से भारत को तेल आयात बिल में राहत मिली — जिससे महंगाई कुछ हद तक नियंत्रित रही।
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यदि पश्चिम का दबाव बढ़ता है और भारत रूस से तेल कम करता है, तो
→ तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं
→ पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं
→ व्यापार घाटा बढ़ने की संभावना है।
4. कूटनीतिक पहलू
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भारत एक संतुलित विदेश नीति अपना रहा है —
अमेरिका और यूरोप से साझेदारी भी जारी रखी है, और रूस से संबंध भी बनाए रखे हैं। -
गोयल का बयान दिखाता है कि भारत अब “अनुयायी नहीं, बल्कि नीति-निर्माता” बन रहा है।
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यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्वायत्त पहचान को और मज़बूत करता है।
5. भविष्य की दिशा
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भारत शायद रूस से तेल खरीद कम नहीं करेगा, बल्कि विकल्प स्रोतों (जैसे मध्य-पूर्व या अफ्रीका) को जोड़ सकता है।
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साथ ही, भारत नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू उत्पादन पर ध्यान बढ़ाएगा ताकि विदेशी दबाव कम हो।
पीयूष गोयल का यह बयान सिर्फ़ तेल या व्यापार तक सीमित नहीं है — यह भारत के वैश्विक आत्मविश्वास (global confidence) का प्रतीक है।
भारत अब “नैतिक रूप से स्वतंत्र” नीति की ओर बढ़ रहा है, जहाँ अपने लोगों की ज़रूरतें किसी भी बाहरी दबाव से ऊपर रखी जा रही हैं। -











































